देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हुई ताजा बढ़ोतरी का असर अब केवल परिवहन और आम उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं रहने वाला है। बढ़ती ईंधन लागत का प्रभाव धीरे-धीरे कई अन्य क्षेत्रों पर भी दिखाई देने लगा है। अब संभावना जताई जा रही है कि आने वाले समय में मोबाइल रिचार्ज प्लान भी महंगे हो सकते हैं। टेलीकॉम सेक्टर से जुड़ी रिपोर्ट्स के अनुसार पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि के कारण मोबाइल टावरों के संचालन पर खर्च बढ़ेगा, जिसका असर सीधे टेलीकॉम कंपनियों की लागत पर पड़ेगा। ऐसे में कंपनियां अपने बढ़ते खर्च की भरपाई के लिए मोबाइल टैरिफ बढ़ाने पर विचार कर सकती हैं।
हाल ही में देशभर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तीन-तीन रुपये प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी की गई है। कई बड़े शहरों में पेट्रोल की कीमत 107 रुपये प्रति लीटर के करीब पहुंच गई है। मुंबई और बेंगलुरु जैसे शहरों में बढ़ी हुई कीमतों ने आम लोगों की चिंता और बढ़ा दी है। पहले ही महंगाई के दबाव से जूझ रहे उपभोक्ताओं के लिए यह नई बढ़ोतरी अतिरिक्त आर्थिक बोझ के रूप में देखी जा रही है। अब आशंका है कि इसका असर मोबाइल सेवाओं की कीमतों पर भी पड़ सकता है।
रिपोर्ट्स के अनुसार किसी भी मोबाइल टावर को चालू रखने में बिजली और ईंधन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। टेलीकॉम सेक्टर में काम करने वाली कंपनियों को अपने टावरों को लगातार सक्रिय रखने के लिए बड़ी मात्रा में बिजली और डीजल का उपयोग करना पड़ता है। खासतौर पर उन क्षेत्रों में जहां बिजली की सप्लाई स्थिर नहीं होती, वहां डीजल जनरेटर के जरिए टावरों को संचालित किया जाता है। यही कारण है कि ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर टेलीकॉम कंपनियों के संचालन खर्च पर पड़ता है।
टेलीकॉम सेक्टर से जुड़ी रिपोर्ट्स के मुताबिक किसी मोबाइल टावर को चलाने में कुल ऑपरेटिंग लागत का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा बिजली और ईंधन पर खर्च होता है। जब डीजल और पेट्रोल महंगे होते हैं तो टावरों को ऑपरेट करने की लागत भी तेजी से बढ़ जाती है। कंपनियों के लिए यह अतिरिक्त खर्च लंबे समय तक वहन करना आसान नहीं होता। ऐसे में वे अपने टैरिफ प्लान में बदलाव कर इस लागत को ग्राहकों तक पहुंचा सकती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि देश में तेजी से बढ़ते 5G नेटवर्क ने टेलीकॉम कंपनियों की लागत पहले ही बढ़ा दी है। 5G टावर पारंपरिक नेटवर्क की तुलना में अधिक बिजली की खपत करते हैं। इन्हें लगातार हाई-स्पीड डेटा ट्रांसमिशन के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ऐसे में डीजल और बिजली की बढ़ती कीमतें कंपनियों के लिए अतिरिक्त दबाव पैदा कर रही हैं। यदि ईंधन की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी जारी रहती है, तो टेलीकॉम कंपनियों को अपने कारोबार को लाभदायक बनाए रखने के लिए रिचार्ज प्लान महंगे करने पड़ सकते हैं।
देश की बड़ी टेलीकॉम कंपनियां जैसे Reliance Jio, Bharti Airtel और Vodafone Idea पहले से ही नेटवर्क विस्तार और 5G इंफ्रास्ट्रक्चर पर भारी निवेश कर रही हैं। रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि केवल डीजल खर्च में बढ़ोतरी के कारण इन कंपनियों की लागत सालाना सैकड़ों करोड़ रुपये तक बढ़ सकती है। यह अतिरिक्त बोझ कंपनियों के वित्तीय प्रदर्शन को प्रभावित कर सकता है।
इसके अलावा वैश्विक सप्लाई चेन में आ रही दिक्कतें भी टेलीकॉम सेक्टर की लागत बढ़ा रही हैं। नेटवर्क उपकरण, बैटरी, इलेक्ट्रॉनिक पार्ट्स और अन्य तकनीकी संसाधनों की कीमतों में भी वृद्धि देखने को मिल रही है। इससे कंपनियों के लिए नेटवर्क संचालन और विस्तार दोनों महंगे हो गए हैं। ऐसे में ईंधन कीमतों में बढ़ोतरी ने इस दबाव को और अधिक बढ़ा दिया है।
जानकारों का मानना है कि भारतीय टेलीकॉम बाजार लंबे समय तक कम कीमत वाले डेटा और सस्ते रिचार्ज प्लान के लिए जाना जाता रहा है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में कंपनियों ने धीरे-धीरे टैरिफ बढ़ाने शुरू किए हैं। इसका मुख्य कारण बढ़ती लागत और 5G नेटवर्क पर हो रहा भारी निवेश है। अब पेट्रोल-डीजल महंगा होने के बाद टैरिफ बढ़ोतरी की संभावना और तेज हो गई है।
हालांकि अभी तक किसी भी टेलीकॉम कंपनी ने आधिकारिक रूप से रिचार्ज प्लान महंगे करने की घोषणा नहीं की है, लेकिन उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले महीनों में कंपनियां इस दिशा में कदम उठा सकती हैं। यदि ऐसा होता है तो इसका सीधा असर करोड़ों मोबाइल उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। खासकर वे लोग जो पहले से महंगाई और बढ़ते घरेलू खर्चों से परेशान हैं, उनके लिए मोबाइल सेवाएं भी महंगी हो सकती हैं।
भारत में मोबाइल इंटरनेट और डिजिटल सेवाओं का उपयोग तेजी से बढ़ा है। ऑनलाइन शिक्षा, डिजिटल पेमेंट, मनोरंजन और कामकाज के लिए बड़ी संख्या में लोग मोबाइल डेटा पर निर्भर हैं। ऐसे में मोबाइल रिचार्ज प्लान की कीमतों में किसी भी प्रकार की बढ़ोतरी आम लोगों के मासिक बजट को प्रभावित कर सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि सरकार ईंधन कीमतों को नियंत्रित करने या टेलीकॉम सेक्टर को कुछ राहत देने के कदम उठाती है, तो कंपनियों पर दबाव कम हो सकता है। फिलहाल बढ़ती ईंधन लागत और ऑपरेटिंग खर्च को देखते हुए मोबाइल टैरिफ बढ़ने की आशंका लगातार मजबूत होती दिखाई दे रही है।


