राजस्थान सहित पूरे देश में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में हुई ताजा बढ़ोतरी के बाद राजनीतिक माहौल भी गर्म हो गया है। ईंधन के दाम बढ़ने से जहां आम लोगों की चिंता बढ़ गई है, वहीं विपक्ष ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला शुरू कर दिया है। कांग्रेस महासचिव और राजस्थान के पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट ने पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी को लेकर केंद्र की बीजेपी सरकार को घेरते हुए बड़ा बयान दिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि पांच राज्यों के चुनाव खत्म होने का इंतजार किया गया और उसके तुरंत बाद जनता पर महंगाई का बोझ डाल दिया गया।
देशभर में शुक्रवार को पेट्रोल और डीजल की कीमतों में लगभग तीन रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी दर्ज की गई। राजस्थान में पेट्रोल की कीमत बढ़कर 107.97 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई, जबकि डीजल 93.23 रुपये प्रति लीटर हो गया। लगातार बढ़ती महंगाई के बीच ईंधन की कीमतों में यह उछाल आम उपभोक्ताओं के लिए नई चिंता लेकर आया है। इसका असर केवल वाहन चालकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि परिवहन, खाद्य पदार्थों, रोजमर्रा की वस्तुओं और अन्य सेवाओं की लागत पर भी दिखाई देने की संभावना है।
ईंधन मूल्य वृद्धि पर प्रतिक्रिया देते हुए सचिन पायलट ने कहा कि यह फैसला पहले से तय था। उन्होंने तंज कसते हुए कहा, “वोट लो, फिर कीमत बढ़ाओ।” पायलट ने आरोप लगाया कि चुनावी राज्यों में मतदान समाप्त होने तक सरकार ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखा, लेकिन जैसे ही चुनाव खत्म हुए, कंपनियों ने दाम बढ़ा दिए। उनके अनुसार यह कदम जनता के साथ छल जैसा है क्योंकि चुनाव के दौरान महंगाई को मुद्दा बनने से रोकने की कोशिश की गई।
सचिन पायलट ने कहा कि पहले ही देश में महंगाई का दबाव लगातार बढ़ रहा है। रसोई गैस, खाद्य पदार्थों और दैनिक जरूरतों की चीजों के दाम पहले से लोगों की जेब पर असर डाल रहे हैं। ऐसे समय में पेट्रोल और डीजल महंगा होना आम आदमी के लिए अतिरिक्त आर्थिक बोझ लेकर आया है। उन्होंने कहा कि ईंधन की कीमत बढ़ने से हर क्षेत्र प्रभावित होता है क्योंकि परिवहन लागत बढ़ने के साथ बाजार में लगभग हर वस्तु की कीमत बढ़ जाती है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतें हमेशा से देश की राजनीति में बड़ा मुद्दा रही हैं। विपक्ष अक्सर इसे आम जनता से जुड़ा संवेदनशील विषय मानकर सरकार को घेरता रहा है। इस बार भी कांग्रेस ने इसे जनता की आर्थिक परेशानियों से जोड़ते हुए केंद्र सरकार की नीतियों पर सवाल उठाए हैं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कम होती हैं तब आम लोगों को राहत नहीं मिलती, लेकिन जैसे ही वैश्विक बाजार में थोड़ी बढ़ोतरी होती है, उसका बोझ सीधे उपभोक्ताओं पर डाल दिया जाता है।
जानकारी के अनुसार यह बढ़ोतरी पिछले चार वर्षों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में पहली बड़ी वृद्धि मानी जा रही है। तेल विपणन कंपनियों का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी आने से उन्हें नुकसान उठाना पड़ रहा था, जिसके चलते कीमतों में संशोधन करना जरूरी हो गया। वैश्विक स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और सप्लाई से जुड़ी चुनौतियों का असर भी कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है।
ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी के साथ-साथ सीएनजी दरों में भी इजाफा किया गया है। दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में सीएनजी दो रुपये प्रति किलोग्राम तक महंगी हो गई है। इसका असर सार्वजनिक परिवहन और कमर्शियल वाहनों पर भी पड़ सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईंधन कीमतों में लगातार बढ़ोतरी जारी रहती है तो आने वाले समय में महंगाई दर और बढ़ सकती है।
उद्योग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में पेट्रोल की कीमत 94.77 रुपये से बढ़कर 97.77 रुपये प्रति लीटर हो गई है। वहीं डीजल 87.67 रुपये से बढ़कर 90.67 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गया। अलग-अलग राज्यों में वैट यानी मूल्य वर्धित कर की दरें अलग होने के कारण पेट्रोल और डीजल के रेट भी अलग-अलग दिखाई देते हैं। राजस्थान जैसे राज्यों में वैट अधिक होने के कारण यहां ईंधन कीमतें कई अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा रहती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि पेट्रोल और डीजल की कीमतों का सीधा संबंध देश की अर्थव्यवस्था से होता है। ईंधन महंगा होने से माल ढुलाई की लागत बढ़ती है, जिसका असर बाजार में बिकने वाले सामानों पर पड़ता है। कृषि क्षेत्र में भी डीजल का व्यापक उपयोग होने के कारण किसानों की लागत बढ़ सकती है। इससे खाद्यान्न और अन्य कृषि उत्पादों की कीमतों में भी असर देखने को मिल सकता है।
सचिन पायलट के बयान के बाद राजस्थान की राजनीति में भी इस मुद्दे को लेकर बहस तेज हो गई है। कांग्रेस इसे जनता से जुड़ा बड़ा मुद्दा बनाकर सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही है, जबकि केंद्र सरकार का तर्क है कि वैश्विक परिस्थितियों और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण यह फैसला लेना जरूरी हो गया था।


