भारत की अत्यंत दुर्लभ और विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी गोडावण प्रजाति को बचाने की कोशिशों के बीच एक चिंताजनक खबर सामने आई है। जैसलमेर से गुजरात के नलिया क्षेत्र में भेजे गए अंडे से निकला गोडावण का चूजा रहस्यमय परिस्थितियों में गायब हो गया है। यह चूजा कच्छ क्षेत्र में संरक्षण प्रयासों की बड़ी सफलता माना जा रहा था, लेकिन अब उसके लापता होने से वन्यजीव संरक्षण तंत्र पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। हालांकि अधिकारियों ने अब तक औपचारिक रूप से इसके गायब होने की पुष्टि नहीं की है, लेकिन सूत्रों और विशेषज्ञों के अनुसार स्थिति बेहद गंभीर है।
गोडावण, जिसे अंग्रेजी में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड कहा जाता है, भारत की सबसे संकटग्रस्त पक्षी प्रजातियों में शामिल है। राजस्थान इसका प्रमुख प्राकृतिक आवास माना जाता है। गुजरात के कच्छ क्षेत्र में भी कभी इसकी अच्छी संख्या थी, लेकिन समय के साथ वहां इनकी आबादी बेहद कम रह गई। वर्तमान में कच्छ क्षेत्र में केवल तीन मादा गोडावण शेष बताई जाती हैं। नर पक्षियों की अनुपस्थिति के कारण वहां प्राकृतिक प्रजनन लगभग पूरी तरह रुक चुका था। यही कारण था कि वैज्ञानिकों ने कृत्रिम संरक्षण और प्रजनन तकनीकों का सहारा लिया।
गुजरात में गोडावण की संख्या बढ़ाने के लिए विशेषज्ञों ने राजस्थान के जैसलमेर स्थित सम गोडावण ब्रीडिंग सेंटर से एक फर्टाइल अंडा चुना। यह अंडा सफल प्रजनन की संभावना वाला माना गया था। इसके बाद इसे विशेष पोर्टेबल इनक्यूबेटर में सुरक्षित रखा गया और 21 मार्च 2026 को जैसलमेर से गुजरात के नलिया क्षेत्र के लिए रवाना किया गया। करीब 770 किलोमीटर की यह यात्रा लगभग 19 घंटे में बिना रुके पूरी की गई। इस अभियान को वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया था।
नलिया पहुंचने के बाद इस अंडे को वहां मौजूद मादा गोडावण के घोंसले में रखा गया। इस तकनीक को ‘सेरोगेसी’ या ‘जंपस्टार्ट’ मॉडल कहा जाता है, जिसमें दूसरे स्थान से लाए गए अंडे को मादा पक्षी की देखरेख में प्राकृतिक रूप से विकसित कराया जाता है। 26 मार्च 2026 को जब इस अंडे से चूजा बाहर निकला, तो इसे संरक्षण की बड़ी उपलब्धि माना गया। विशेषज्ञों को उम्मीद थी कि इससे कच्छ क्षेत्र में गोडावण प्रजाति के पुनर्जीवन का रास्ता खुलेगा।
चूजे के जन्म के बाद गुजरात सरकार और वन विभाग ने इसे अत्यधिक प्राथमिकता दी। बताया गया कि घोंसले के आसपास 24 घंटे निगरानी के लिए 50 से अधिक गार्ड तैनात किए गए थे। पूरे इलाके की सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई थी। जिस क्षेत्र में चूजा था, वहां जाने वाले रास्तों को भी सीमित कर दिया गया था। वॉच टावरों से दूरबीन के जरिए लगातार निगरानी रखी जा रही थी। इतने व्यापक सुरक्षा इंतजामों के बीच यह माना जा रहा था कि चूजा पूरी तरह सुरक्षित है।
लेकिन 18 अप्रैल के बाद से स्थिति बदल गई। निगरानी टीमों को मादा गोडावण, जिस पर जीपीएस टैग लगा हुआ था, तो दिखाई दी, लेकिन उसके साथ चूजा नजर नहीं आया। लगातार कई दिनों तक चूजे का कोई पता नहीं चला। इसके बाद वन विभाग के भीतर चिंता बढ़ गई। सूत्रों के अनुसार अब आशंका जताई जा रही है कि चूजा किसी जंगली शिकारी का शिकार हो गया।
वन विभाग से जुड़े सूत्रों का कहना है कि सुरक्षा घेरे में कुछ स्थानों पर खाली जगह रह गई थी। संभव है कि उन्हीं हिस्सों से कोई कुत्ता, सियार या जंगली बिल्ली भीतर घुस गई हो और 26 दिन के इस नन्हे चूजे को नुकसान पहुंचाया हो। अभी तक कोई अवशेष नहीं मिला है, लेकिन इतने लंबे समय तक चूजे के नहीं दिखने से उसके जीवित होने की संभावना बहुत कम मानी जा रही है।
गोडावण संरक्षण से जुड़े वाइल्ड लाइफ बायोलॉजिस्ट सुमित डूकिया ने भी इस मामले पर चिंता जताई है। उनका कहना है कि स्थानीय विशेषज्ञों से पुष्टि हुई है कि चूजा लापता है। उन्होंने बताया कि जैसलमेर क्षेत्र में भी यह देखा गया है कि गोडावण के चूजों की मृत्यु दर अधिक होती है, जबकि वयस्क पक्षियों की जीवित रहने की संभावना ज्यादा होती है। उन्होंने कहा कि इतनी कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद यदि चूजा गायब हो जाता है तो इसकी गंभीर जांच होनी चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि गोडावण को बचाना केवल एक पक्षी प्रजाति को बचाना नहीं, बल्कि पूरे घासभूमि पारिस्थितिकी तंत्र को सुरक्षित रखना है। गोडावण राजस्थान का राज्य पक्षी है और इसकी संख्या अब 150 से भी कम बताई जाती है। बिजली की हाईटेंशन लाइनों से टकराव, अवैध शिकार, प्राकृतिक आवास का नष्ट होना और जंगली शिकारियों का खतरा इसके अस्तित्व के लिए सबसे बड़ी चुनौतियां हैं।
यह घटना संरक्षण परियोजनाओं की जमीनी चुनौतियों को भी सामने लाती है। केवल तकनीक, बजट और सुरक्षा बल पर्याप्त नहीं होते, बल्कि निरंतर निगरानी, वैज्ञानिक योजना और जोखिम प्रबंधन भी जरूरी होता है। यदि इतनी महत्वपूर्ण परियोजना में पैदा हुआ चूजा सुरक्षित नहीं रह सका, तो भविष्य की योजनाओं में सुधार की आवश्यकता स्पष्ट है।
गोडावण भारत की प्राकृतिक धरोहर है और इसके संरक्षण के लिए राजस्थान तथा गुजरात जैसे राज्यों की संयुक्त जिम्मेदारी बनती है। कच्छ में चूजे के गायब होने की घटना ने चिंता जरूर बढ़ाई है, लेकिन यह प्रयासों को रोकने का कारण नहीं बनना चाहिए। बल्कि इससे सीख लेकर और मजबूत रणनीति तैयार करनी होगी, ताकि आने वाली पीढ़ियां इस दुर्लभ पक्षी को केवल तस्वीरों में नहीं, प्रकृति में देख सकें।


