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नागौर के दासावास स्कूल में मिड-डे मील के दौरान बच्चों से मजदूरी

नागौर के दासावास स्कूल में मिड-डे मील के दौरान बच्चों से मजदूरी

नागौर  के रियांबड़ी क्षेत्र के दासावास गांव स्थित राजकीय उच्च प्राथमिक विद्यालय से शिक्षा व्यवस्था को सवालों के घेरे में खड़ा करने वाला मामला सामने आया है। सरकारी स्कूलों में बच्चों को बेहतर शिक्षा, सुरक्षित वातावरण और सम्मानजनक सुविधाएं देने के दावे किए जाते हैं, लेकिन इस विद्यालय में जो तस्वीर सामने आई है, उसने पूरे क्षेत्र में नाराजगी पैदा कर दी है। आरोप है कि मिड-डे मील के समय जहां बच्चों को भोजन करने और थोड़ी राहत मिलने का समय होना चाहिए, वहां उनसे भारी बर्तन उठवाए गए, जबकि शिक्षक आराम करते नजर आए।

जानकारी के अनुसार, स्कूल परिसर में मिड-डे मील वितरण के दौरान कुछ शिक्षक कक्षा कक्ष के भीतर सोते हुए दिखाई दिए। बताया जा रहा है कि चार शिक्षक उस समय आराम फरमा रहे थे, जबकि दूसरी ओर छोटे बच्चे स्टील के भारी बर्तन उठाकर इधर-उधर ले जाते दिखाई दिए। यह दृश्य न केवल शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठाता है, बल्कि बच्चों के अधिकारों और उनकी सुरक्षा को लेकर भी गंभीर चिंता पैदा करता है। स्कूलों में बच्चों से इस तरह का काम करवाना नियमों और नैतिक जिम्मेदारियों दोनों के खिलाफ माना जाता है।

सबसे गंभीर बात यह बताई जा रही है कि स्कूल के प्रधानाध्यापक सोहनलाल फड़ौदा इस पूरी स्थिति को देखते रहे, लेकिन उन्होंने बच्चों को रोकने या शिक्षकों को जिम्मेदारी निभाने के लिए कहने का कोई प्रयास नहीं किया। प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार प्रधानाध्यापक कुर्सी पर बैठे रहे और स्कूल परिसर में चल रही गतिविधियों पर कोई हस्तक्षेप नहीं किया। इससे विद्यालय प्रशासन की कार्यशैली पर गंभीर प्रश्न उठने लगे हैं।

इस मामले में बच्चों ने भी चौंकाने वाला खुलासा किया है। बच्चों का कहना है कि उनसे यह काम सिर्फ एक दिन नहीं, बल्कि नियमित रूप से करवाया जाता है। यानी मिड-डे मील के दौरान बर्तन उठाना, इधर-उधर रखना और अन्य छोटे-मोटे कार्य करना उनकी दिनचर्या का हिस्सा बना दिया गया है। यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं तो यह बेहद गंभीर मामला है, क्योंकि स्कूल बच्चों के सीखने और विकास का स्थान होता है, न कि श्रम करवाने का केंद्र।

विद्यालय में कुल आठ शिक्षक कार्यरत बताए गए हैं, जिनमें से सात उस समय स्कूल में मौजूद थे। इतनी संख्या में शिक्षकों की उपस्थिति के बावजूद बच्चों पर जिम्मेदारी डालना कई सवाल खड़े करता है। यदि स्टाफ पर्याप्त था तो फिर बच्चों से काम करवाने की जरूरत क्यों पड़ी। इससे यह भी संकेत मिलता है कि जिम्मेदारी निभाने के बजाय कुछ कर्मचारी अपनी ड्यूटी से बचते नजर आए।

जब इस पूरे मामले पर प्रधानाध्यापक से जवाब मांगा गया तो उनका बयान और अधिक विवाद का कारण बन गया। उन्होंने गंभीरता दिखाने के बजाय हल्के अंदाज में कहा कि बच्चों के बर्तन तो बच्चों को ही उठाने पड़ेंगे, शिक्षक थोड़ी ना उठाएंगे। इतना ही नहीं, उन्होंने व्यंग्यात्मक लहजे में यह भी कहा कि यदि आदेश दिया जाए तो अगले दिन से शिक्षक ही बर्तन उठाने लगेंगे। प्रधानाध्यापक के इस बयान को लेकर स्थानीय लोगों और अभिभावकों में नाराजगी देखी जा रही है। लोगों का कहना है कि एक जिम्मेदार पद पर बैठे अधिकारी से संवेदनशील और जवाबदेह व्यवहार की अपेक्षा होती है, लेकिन यहां उल्टा रवैया देखने को मिला।

मामला सामने आने के बाद जिला प्रशासन भी सक्रिय हो गया है। एसडीएम सूर्यकांत शर्मा ने कहा है कि शिकायत प्राप्त हुई है और पूरे मामले की जांच करवाई जाएगी। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि जांच में बच्चों से नियमित रूप से काम करवाने और शिक्षकों की लापरवाही की पुष्टि होती है, तो संबंधित लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। प्रशासन के इस बयान के बाद अब लोगों की नजर जांच रिपोर्ट पर टिकी हुई है।

वहीं बाल कल्याण समिति नागौर के अध्यक्ष मनोज सोनी ने भी मामले को गंभीर बताते हुए कहा कि इसे संज्ञान में लिया गया है। उन्होंने कहा कि जांच रिपोर्ट आने के बाद विधिक कार्रवाई की जाएगी और ऐसे मामलों को जिला स्तर पर भी उठाया जाएगा, ताकि भविष्य में किसी भी विद्यालय में बच्चों के साथ इस तरह की स्थिति दोबारा पैदा न हो।

यह मामला केवल एक स्कूल की लापरवाही तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी शिक्षा व्यवस्था में निगरानी और जवाबदेही की कमी को भी उजागर करता है। मिड-डे मील योजना बच्चों के पोषण और शिक्षा से जोड़ने के उद्देश्य से चलाई जाती है, लेकिन यदि इसी योजना के दौरान बच्चों से श्रम करवाया जाए तो योजना का मूल उद्देश्य ही प्रभावित होता है। बच्चों को सम्मानपूर्वक भोजन, स्वच्छ वातावरण और सुरक्षित माहौल मिलना चाहिए।

स्थानीय लोगों और अभिभावकों की मांग है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो, दोषियों पर कार्रवाई की जाए और विद्यालयों में नियमित निरीक्षण व्यवस्था मजबूत की जाए। यदि समय रहते ऐसे मामलों पर कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो शिक्षा व्यवस्था पर लोगों का भरोसा कमजोर हो सकता है। अब देखना होगा कि प्रशासन जांच के बाद क्या कदम उठाता है और क्या बच्चों को वास्तव में न्याय मिल पाता है।

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