अजमेर में सामने आए फर्जी डिग्री मामले ने एक बार फिर राजस्थान की भर्ती प्रक्रिया और शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस बहुचर्चित मामले में स्पेशल ऑपरेशन ग्रुप (SOG) ने बड़ी कार्रवाई करते हुए मेवाड़ यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रेसिडेंट कौशल किशोर चन्द्रूल को गिरफ्तार कर लिया है। यह गिरफ्तारी पहले से पकड़े गए आरोपियों से हुई पूछताछ के आधार पर की गई है, जिससे इस पूरे नेटवर्क की परतें लगातार खुलती जा रही हैं।
इस प्रकरण में इससे पहले यूनिवर्सिटी के पूर्व डीन ध्वज कीर्ति शर्मा को गिरफ्तार किया गया था। उनकी पूछताछ के दौरान कई अहम जानकारियां सामने आईं, जिनके आधार पर जांच एजेंसियों ने आगे की कार्रवाई को तेज किया। इसी कड़ी में कौशल किशोर चन्द्रूल की गिरफ्तारी को इस मामले में एक बड़ी सफलता माना जा रहा है। जांच अधिकारियों का मानना है कि इस गिरफ्तारी से फर्जी डिग्री रैकेट के संचालन से जुड़े कई अहम राज उजागर हो सकते हैं।
एसओजी के एडिशनल एसपी श्याम सुंदर विश्नोई के नेतृत्व में चल रही इस जांच में अब तक कुल 11 आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है। पुलिस सूत्रों के अनुसार, आरोपी को जयपुर से हिरासत में लिया गया और बाद में कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उसे दो दिन के रिमांड पर भेज दिया गया है। इस दौरान एसओजी उससे गहन पूछताछ कर रही है ताकि इस गिरोह के अन्य सदस्यों और इसके काम करने के तरीके के बारे में अधिक जानकारी जुटाई जा सके।
प्रारंभिक जांच में यह तथ्य सामने आया है कि फर्जी डिग्रियों पर अंतिम हस्ताक्षर करने की जिम्मेदारी भी आरोपी के पास ही थी। बताया जा रहा है कि यह पूरा नेटवर्क कमीशन के आधार पर संचालित होता था, जिसमें विभिन्न स्तरों पर लोग शामिल थे। यह गिरोह जरूरतमंद अभ्यर्थियों को फर्जी डिग्रियां उपलब्ध कराकर उन्हें सरकारी नौकरियों में चयनित करवाने का काम करता था। इस खुलासे के बाद यह मामला और भी गंभीर हो गया है, क्योंकि इसमें शिक्षा और भर्ती दोनों ही प्रणालियों की साख पर असर पड़ता है।
इस पूरे मामले की शुरुआत राजस्थान लोक सेवा आयोग (RPSC) की ओर से की गई शिकायत से हुई थी। आयोग ने जांच के दौरान पाया कि स्कूल लेक्चरर (हिंदी) प्रतियोगी परीक्षा-2022 में चयनित दो अभ्यर्थियों ने आवेदन के समय वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय की डिग्री का उल्लेख किया था, लेकिन बाद में उन्होंने मेवाड़ यूनिवर्सिटी की डिग्री प्रस्तुत की। इस विसंगति के बाद जब गहराई से जांच की गई, तो सामने आया कि दोनों अभ्यर्थियों ने एमए की फर्जी डिग्री के जरिए नौकरी हासिल की थी।
पूछताछ के दौरान यह भी खुलासा हुआ कि इन अभ्यर्थियों को फर्जी डिग्रियां उनके परिजनों के माध्यम से उपलब्ध कराई गई थीं। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह केवल व्यक्तिगत स्तर का मामला नहीं, बल्कि एक संगठित गिरोह का हिस्सा है, जो व्यवस्थित तरीके से इस तरह की गतिविधियों को अंजाम दे रहा था। इस खुलासे के बाद एसओजी ने कार्रवाई को और तेज करते हुए सरकारी शिक्षक दलपत सिंह और डॉक्टर सुरेश विश्नोई सहित कई अन्य लोगों को भी गिरफ्तार किया।
पुलिस का कहना है कि यह गिरोह लंबे समय से सक्रिय था और कई अभ्यर्थियों को फर्जी डिग्रियों के जरिए सरकारी नौकरियां दिलाने में सफल भी रहा है। इस मामले में शामिल लोगों की संख्या और नेटवर्क का दायरा काफी बड़ा हो सकता है, जिसकी जांच अभी जारी है। एसओजी अब इस पूरे नेटवर्क की कड़ियों को जोड़ने में जुटी है ताकि यह पता लगाया जा सके कि इसमें कौन-कौन लोग शामिल हैं और यह रैकेट कितने समय से संचालित हो रहा था।
इस मामले ने राज्य की भर्ती प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल खड़े किए हैं। यदि फर्जी डिग्रियों के आधार पर लोग सरकारी नौकरियां हासिल कर रहे हैं, तो इससे योग्य अभ्यर्थियों के साथ अन्याय होता है और सरकारी तंत्र की कार्यकुशलता पर भी असर पड़ता है। यही कारण है कि इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच एजेंसियां हर पहलू की गहराई से जांच कर रही हैं।
आने वाले दिनों में इस मामले में और भी गिरफ्तारियां होने की संभावना जताई जा रही है। एसओजी का फोकस अब उन लोगों तक पहुंचने पर है, जो इस नेटवर्क के संचालन में मुख्य भूमिका निभा रहे थे। साथ ही यह भी जांच की जा रही है कि इस गिरोह ने अब तक कितने लोगों को फर्जी डिग्रियां उपलब्ध कराई हैं और कितने लोग इनके जरिए सरकारी सेवाओं में पहुंच चुके हैं।


