रेगिस्तानी जिले बाड़मेर के सनावड़ा गांव में धुलंडी के अवसर पर लोक संस्कृति का अद्भुत नजारा देखने को मिला। होलिका दहन के अगले दिन आयोजित पारंपरिक गैर नृत्य में सैकड़ों कलाकारों ने लाल-सफेद ‘आंगी’ वेशभूषा पहन ढोल-नगाड़ों और थालियों की थाप पर सामूहिक प्रस्तुति दी। लगभग 185 वर्ष पुरानी इस परंपरा ने एक बार फिर यह साबित किया कि पश्चिमी राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत आज भी जीवंत और सशक्त है।
इस वर्ष के आयोजन की सबसे खास झलक तीन पीढ़ियों का एक साथ मंच पर उतरना रहा। एक ही परिवार के दादा, पिता और पुत्र ने एक साथ कदमताल कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। यह दृश्य केवल नृत्य नहीं, बल्कि परंपरा के निरंतर प्रवाह और सांस्कृतिक उत्तराधिकार का प्रतीक बन गया।
धुलंडी पर हर वर्ष होता है आयोजन
जिला मुख्यालय से करीब 33 किलोमीटर दूर स्थित सनावड़ा गांव में हर साल धुलंडी पर गैर नृत्य का भव्य आयोजन किया जाता है। इस आयोजन को देखने के लिए दूर-दराज के इलाकों से हजारों लोग पहुंचते हैं। जैसे ही ढोल-नगाड़ों की गूंज और थालियों की खनक शुरू होती है, पूरा गांव उत्सव के रंग में रंग जाता है।
गैरियों के समूह जब गोल घेरे में डंडों के साथ लयबद्ध नृत्य करते हैं, तो वह दृश्य दर्शकों के लिए अद्भुत अनुभव बन जाता है। पारंपरिक आंगी-बांगी परिधान में सजे कलाकारों की सामूहिक प्रस्तुति गांव की गलियों को जीवंत मंच में बदल देती है।
सुरक्षा से शुरू हुई परंपरा
इतिहासकारों और स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, गैर नृत्य की शुरुआत महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ी थी। खेती-किसानी के कार्यों के बाद जब महिलाएं घर लौटती थीं, तब पुरुष डंडों के साथ उनकी पहरेदारी करते थे। समय के साथ इन डंडों को ताल और लय के साथ जोड़ा गया और यही परंपरा गैर नृत्य के रूप में विकसित हुई।
धीरे-धीरे यह नृत्य सामाजिक आयोजन और उत्सव का हिस्सा बन गया। आज गैर केवल एक लोकनृत्य नहीं, बल्कि पश्चिमी राजस्थान की पहचान और गौरव का प्रतीक है।
एशियाड 1982 में मिली राष्ट्रीय पहचान
गैर नृत्य की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1982 में दिल्ली में आयोजित 1982 एशियाई खेल के उद्घाटन समारोह में बाड़मेर के गैर कलाकारों ने प्रस्तुति दी थी। उस मंच पर मिली सराहना ने इस लोकनृत्य को राष्ट्रीय पहचान दिलाई। तब से यह परंपरा देश-विदेश में राजस्थान की सांस्कृतिक धरोहर के रूप में जानी जाती है।
पीढ़ियों को जोड़ता सांस्कृतिक सेतु
सनावड़ा का गैर आयोजन केवल होली का उत्सव नहीं, बल्कि पीढ़ियों को जोड़ने वाला सांस्कृतिक सेतु है। तीन पीढ़ियों की साझा प्रस्तुति ने यह संदेश दिया कि आधुनिकता के दौर में भी परंपराएं जीवित रह सकती हैं, यदि उन्हें सहेजने और आगे बढ़ाने का संकल्प हो।
धुलंडी के इस आयोजन ने एक बार फिर साबित किया कि बाड़मेर की 185 साल पुरानी गैर नृत्य परंपरा आज भी उतनी ही प्रभावशाली और प्रेरणादायक है, जितनी अपने आरंभिक दिनों में थी।


