मनीषा शर्मा। अजमेर शरीफ दरगाह को लेकर दायर एक महत्वपूर्ण याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें दावा किया गया था कि दरगाह परिसर के भीतर पहले मंदिर मौजूद था और इसी आधार पर कुछ धार्मिक आयोजनों पर रोक लगाने की मांग की गई थी। यह याचिका विश्व वैदिक सनातन संघ के प्रमुख जितेंद्र सिंह और हिंदू सेना के अध्यक्ष विष्णु गुप्ता की ओर से दायर की गई थी।
न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि इस याचिका में किए गए दावे प्रथम दृष्टया विचारणीय नहीं हैं और इन पर न्यायिक हस्तक्षेप का कोई ठोस आधार प्रस्तुत नहीं किया गया। अदालत ने साफ किया कि केवल मान्यताओं और अनुमान के आधार पर इतनी बड़ी धार्मिक व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
उर्स और चादर पर रोक की मांग असंगत बताई
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से यह भी मांग की थी कि अजमेर दरगाह में हर साल होने वाले उर्स कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री सहित संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों द्वारा चादर भेजने की परंपरा पर रोक लगाई जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग को भी असंगत और अनुपयुक्त बताया। अदालत का कहना था कि धार्मिक परंपराओं और ऐतिहासिक आयोजनों में इस तरह का हस्तक्षेप न तो न्यायोचित है और न ही यह वर्तमान याचिका के दायरे में आता है। अदालत ने कहा कि याचिका न्यायिक प्रक्रिया का उपयोग कर धार्मिक मुद्दों को अनावश्यक रूप से विवादित बनाने का प्रयास प्रतीत होती है।
निचली अदालत में लंबित मुकदमों पर असर नहीं
अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि इस याचिका का खारिज होना उन मामलों पर प्रभाव नहीं डालेगा, जो निचली अदालतों में पहले से लंबित हैं। मंदिर और दरगाह से जुड़े अन्य दीवानी मामलों की सुनवाई स्थानीय अदालतें अपने नियमों के अनुसार जारी रखेंगी।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने भी इस याचिका का विरोध किया। सरकार का तर्क था कि यह याचिका धार्मिक भावनाएं भड़काने और राजनीतिक लाभ लेने के उद्देश्य से दायर की गई है। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क से सहमति जताते हुए कहा कि अदालत का समय ऐसे विवादों में नहीं लगाया जा सकता, जिनकी कोई ठोस कानूनी आधारशिला न हो।
ऐतिहासिक और आध्यात्मिक महत्व बरकरार
अजमेर शरीफ दरगाह सूफी संत ख्वाजा मोइनुद्दीन हसन चिश्ती की दरगाह है। यह स्थान देश-विदेश के करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र माना जाता है। हर वर्ष उर्स के दौरान यहां लाखों जायरीन पहुंचते हैं और विभिन्न समुदायों के लोग एक साथ मिलकर श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।


