मनीषा शर्मा। राजस्थान हाईकोर्ट मुख्यपीठ जोधपुर में वकीलों का आंदोलन तेज हो गया है। हाईकोर्ट प्रशासन द्वारा वर्ष 2026 में हर महीने के दो शनिवार को कार्यदिवस घोषित करने और रात्रिकालीन न्यायालयों के संचालन के निर्णय के खिलाफ अधिवक्ताओं ने खुलकर नाराजगी जताई। सोमवार को बड़ी संख्या में वकील डोम एरिया में एकत्र हुए और नारेबाजी करते हुए फैसले को वापस लेने की मांग उठाई।
हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन और हाईकोर्ट लॉयर्स एसोसिएशन जोधपुर के पदाधिकारियों ने विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया और इसे वकीलों की पेशेवर और पारिवारिक जिम्मेदारियों के विरुद्ध बताया। उनका कहना है कि लगातार कामकाज के दबाव से अधिवक्ताओं के आराम और तैयारी का समय प्रभावित होता है, जिससे न्याय प्रक्रिया पर भी असर पड़ सकता है।
सुनवाई ठप, अदालती कामकाज प्रभावित
निर्णय के विरोध में 5 जनवरी को जोधपुर हाईकोर्ट और अधीनस्थ न्यायालयों में अधिवक्ता स्वेच्छा से उपस्थित नहीं हुए। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में मामलों की सुनवाई नहीं हो सकी और अदालती कामकाज लगभग ठप रहा। कई पक्षकारों और वादकारियों को अपने मामलों की अगली तारीख लेकर लौटना पड़ा।
यह फैसला 3 जनवरी को हुई संयुक्त बैठक के बाद लिया गया था, जिसमें दोनों अधिवक्ता संगठनों की कार्यकारिणी और वरिष्ठ अधिवक्ता मौजूद थे। बैठक में तय किया गया कि शनिवार कार्यदिवस और नाइट कोर्ट दोनों फैसलों का सामूहिक रूप से विरोध किया जाएगा।
“शनिवार-रविवार की परंपरा टूटेगी”
हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष रणजीत जोशी, लॉयर्स एसोसिएशन के निवर्तमान अध्यक्ष आनंद पुरोहित और नव निर्वाचित अध्यक्ष दिलीपसिंह उदावत के नेतृत्व में अधिवक्ताओं ने कहा कि शनिवार को कार्यदिवस बनाना हड़बड़ी में लिया गया कदम दिखता है।
उनका तर्क है कि शनिवार-रविवार की साप्ताहिक छुट्टी केवल आराम के लिए नहीं, बल्कि केस की तैयारी, क्लाइंट मीटिंग और निजी जिम्मेदारियों के संतुलन के लिए भी आवश्यक है। इस परंपरा में बदलाव से पेशेवर जीवन पर अनावश्यक दबाव बढ़ जाएगा।
जयपुर में मुलाकात से उम्मीद
नवनिर्वाचित अध्यक्ष उदावत ने बताया कि प्रतिनिधिमंडल जयपुर जाकर राजस्थान उच्च न्यायालय के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश से मुलाकात करेगा। अधिवक्ता संगठनों का विश्वास है कि संवाद के माध्यम से इस विवाद का समाधान संभव है।
उन्होंने कहा कि जयपुर बैठक के परिणाम के बाद ही यह तय होगा कि आंदोलन जारी रहेगा या नहीं, और क्या अधिवक्ता अगले दिनों में अदालतों में काम करेंगे। सभी सदस्यों से अपील की गई है कि वे एकजुट रहकर बातचीत के निष्कर्ष का इंतजार करें।
पांच दिन कार्यदिवस की मांग
बैठक में अधिवक्ताओं ने एक और अहम मांग रखी—अधीनस्थ न्यायालयों में सप्ताह में केवल पांच दिन कामकाज का प्रावधान लागू किया जाए। उनका कहना है कि जिला मुख्यालयों पर अधिकांश अधिकरण और प्रशासनिक अदालतें पहले से ही पाँच दिन कार्यरत रहती हैं, ऐसे में न्यायालयों में भी समान व्यवस्था लागू होनी चाहिए। इससे न्यायिक व्यवस्था अधिक संतुलित और व्यावहारिक बनेगी।
नाइट कोर्ट पर भी आपत्ति
दोनों एसोसिएशन ने रात्रिकालीन न्यायालयों के प्रस्ताव का भी विरोध किया। वकीलों का कहना है कि रात में अदालत चलाने से सुरक्षा, यात्रा, केस तैयारी और स्टाफ उपलब्धता जैसे सवाल खड़े होते हैं। उनके मुताबिक संवेदनशील मामलों में जल्दबाजी न्यायिक गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है, इसलिए नाइट कोर्ट की योजना पर पुनर्विचार जरूरी है।
आगे की रणनीति पर नजर
फिलहाल सभी की निगाहें जयपुर में होने वाली चर्चा पर टिकी हैं। अगर बातचीत से समाधान नहीं निकलता, तो आंदोलन लंबा चल सकता है और अदालतों के नियमित कामकाज पर असर पड़ सकता है। दूसरी ओर, अगर प्रशासन अधिवक्ताओं की चिंताओं पर सकारात्मक रुख अपनाता है, तो विवाद शांत भी हो सकता है।


