अरावली पर्वतमाला की शांत वादियों में सिरोही स्थित टोकरा बांध अपनी अनूठी विशेषताओं के कारण हर वर्ष लोगों का ध्यान आकर्षित करता है। चारों ओर पहाड़ियों से घिरा यह बांध केवल जल संरक्षण का साधन भर नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान का भी अहम हिस्सा बन चुका है। यहां की सबसे खास पहचान बांध के बीचोंबीच स्थित सोनाधारी महादेव मंदिर है, जो अपनी अद्वितीय स्थिति के कारण श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
इस मंदिर की सबसे रोचक विशेषता यह है कि यह वर्ष भर दर्शन के लिए उपलब्ध नहीं रहता। गर्मी के मौसम में जब बांध का जलस्तर कम होता है, तब यह मंदिर पानी से बाहर आता है और श्रद्धालु यहां पहुंचकर पूजा-अर्चना कर पाते हैं। आमतौर पर अप्रैल के अंत या मई की शुरुआत में यह मंदिर जलमुक्त होता है और लगभग तीन महीने तक दर्शन के लिए खुला रहता है। जैसे ही मानसून का दौर शुरू होता है और पानी का स्तर बढ़ने लगता है, यह मंदिर फिर से जलमग्न हो जाता है और अगले कई महीनों तक दिखाई नहीं देता। इस अनोखी परंपरा के चलते यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह एक विशेष आध्यात्मिक अनुभव बन जाता है।
श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए बांध के किनारे एक वैकल्पिक मंदिर का निर्माण भी किया गया है, जहां पूरे वर्ष नियमित पूजा-पाठ होता रहता है। इससे स्थानीय लोगों और भक्तों को पूजा करने में किसी प्रकार की बाधा नहीं आती, भले ही मुख्य मंदिर पानी में डूबा हुआ हो।
धार्मिक महत्व के साथ-साथ यह बांध कृषि के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसकी कुल भराव क्षमता 31 फीट है, जिसमें से 7 फीट पानी पेयजल के लिए सुरक्षित रखा जाता है। यह निर्णय जलदाय विभाग द्वारा गर्मी के मौसम में आसपास के गांवों में पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से लिया गया था। प्रारंभिक दौर में किसानों ने इसका विरोध भी किया, क्योंकि इससे सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी कम हो सकता था, लेकिन बाद में आपसी सहमति से इस व्यवस्था को स्वीकार कर लिया गया।
यह बांध करीब 1042 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई करता है, जो आसपास के किसानों के लिए जीवनरेखा साबित होता है। यहां से निकलने वाली लगभग 8 किलोमीटर लंबी नहर पीथापुरा, पामेरा, पोसितरा, मालगांव, हाथल और गुलाबगंज जैसे गांवों तक पानी पहुंचाती है। सिंचाई व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिए किसानों से प्रति बीघा 25 रुपए का शुल्क लिया जाता है, जिससे रखरखाव और संचालन में सहायता मिलती है। जल वितरण समिति द्वारा समय-समय पर बैठक कर फसलों के अनुसार पानी वितरण की योजना बनाई जाती है। रबी सीजन में गेहूं की फसल के लिए चार-चार बार पानी देने का निर्णय लिया गया था, जिससे फसल को पर्याप्त नमी मिल सके। किसानों ने भी नहरों की समय पर सफाई कर इस व्यवस्था को सफल बनाने में सहयोग दिया।
टोकरा बांध की एक और विशेषता यह है कि यह लगभग हर वर्ष ओवरफ्लो हो जाता है। अरावली क्षेत्र में अच्छी बारिश होने पर पहाड़ियों से बहकर आने वाला पानी झरनों के माध्यम से तेजी से बांध में पहुंचता है, जिससे यह जल्दी भर जाता है। पिछले कई वर्षों से यह सिलसिला जारी है, जिससे किसानों को रबी फसलों के लिए पर्याप्त पानी मिलता है और उत्पादन में भी वृद्धि होती है।
हालांकि, इस बांध की उपयोगिता जितनी महत्वपूर्ण है, इसके रखरखाव को लेकर उतनी ही चिंताएं भी सामने आती हैं। बांध के निर्माण को करीब छह दशक का समय बीत चुका है, लेकिन नहरों की स्थिति अब भी पूरी तरह संतोषजनक नहीं है। कई स्थानों पर नहरें जर्जर हो चुकी हैं और उनमें टूट-फूट भी देखी जाती है, जिससे पानी के प्रवाह में बाधा आती है। हर साल नहर किनारे बबूल की झाड़ियां उग जाती हैं, जिन्हें हटाने के लिए अतिरिक्त श्रम और संसाधनों की आवश्यकता पड़ती है।
स्थानीय जल वितरण समिति के अध्यक्ष भरत सिंह देवड़ा ने भी इस समस्या की ओर ध्यान आकर्षित किया है। उनके अनुसार, मालगांव और पीथापुरा क्षेत्रों में पुलिया निर्माण की मांग लंबे समय से लंबित है, जिससे किसानों को आवागमन में परेशानी होती है। यदि इन समस्याओं का समय पर समाधान किया जाए, तो सिंचाई व्यवस्था और अधिक प्रभावी हो सकती है और किसानों को इसका पूरा लाभ मिल सकता है।
कुल मिलाकर, टोकरा बांध एक ऐसा स्थल है जहां आस्था और उपयोगिता का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। एक ओर यह धार्मिक दृष्टि से लोगों को आकर्षित करता है, तो दूसरी ओर यह हजारों किसानों के जीवन को सीधे प्रभावित करता है। हालांकि इसके रखरखाव और बुनियादी ढांचे में सुधार की आवश्यकता स्पष्ट रूप से महसूस की जा रही है। यदि इस दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं, तो यह बांध न केवल अपनी वर्तमान उपयोगिता बनाए रखेगा, बल्कि आने वाले समय में और भी अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकेगा।


