राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर तीखी बहस छिड़ गई है। इस बार विवाद की जड़ बनी है भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी CAG की वह ताजा रिपोर्ट, जिसने राज्य की भाजपा सरकार के वित्तीय प्रबंधन पर गंभीर सवालिया निशान खड़े कर दिए हैं। राजस्थान विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने सीएजी रिपोर्ट के आंकड़ों को आधार बनाते हुए भाजपा सरकार पर जोरदार हमला बोला है और कहा है कि राजस्थान विकास में नहीं, कर्ज में आगे है। जूली ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा से मांग की है कि सरकार तत्काल एक श्वेत पत्र जारी करे और जनता को बताए कि आखिर प्रदेश का पैसा कहां गया और इतना भारी कर्ज क्यों लिया गया।
जूली ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि वे राजस्थान विधानसभा में जिस सच को लगातार उठाते रहे, आज उस पर सीएजी की रिपोर्ट ने मुहर लगा दी है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार कांग्रेस के पांच वर्षों के शासन की तुलना में अपने दो वर्षों को बेहतर बताने का झूठा माहौल बना रही थी, जो अब पूरी तरह उजागर हो गया है।
CAG के प्रोविजनल आंकड़ों ने जो तस्वीर पेश की है, वह भाजपा सरकार के “विकास” के दावों को खोखला साबित करती दिखती है। रिपोर्ट के अनुसार, राजस्थान ने पूंजीगत खर्च के मामले में बेहद कमजोर प्रदर्शन किया। राज्य ने 56,327 करोड़ रुपए के बजट के मुकाबले केवल 29,190 करोड़ रुपए खर्च किए, जो कुल बजट का 51.82 प्रतिशत है। सरल शब्दों में कहें तो राज्य सरकार ने जितने पैसे का विकास कार्यों के लिए बजट बनाया था, उसका आधे से भी कम खर्च कर पाई। जबकि यही सरकार जनता के सामने विकास की लंबी-चौड़ी फेहरिस्त गिनाती है।
टीकाराम जूली ने कहा कि जब प्रदेश में अस्पताल, सड़कें और स्कूल नहीं बनेंगे तो युवाओं को रोजगार कैसे मिलेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में विकास कार्य ठप हैं, लेकिन सरकार कर्ज लेने में रिकॉर्ड बना रही है। यह बयान राजस्थान सरकार की प्राथमिकताओं पर सीधा प्रहार है। एक तरफ जहां विद्यालय, अस्पताल और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं का निर्माण बजट के अनुसार नहीं हो रहा, वहीं दूसरी ओर सरकार का कर्ज तेजी से बढ़ता जा रहा है।
रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार, राज्य सरकार ने बजट में 42,972 करोड़ रुपए उधार और देनदारी का लक्ष्य रखा था, लेकिन वित्तीय वर्ष समाप्त होने तक यह आंकड़ा बढ़कर 71,261 करोड़ रुपए तक पहुंच गया, यानी सरकार ने तय सीमा से करीब 65 प्रतिशत अधिक कर्ज लिया। यह आंकड़ा न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि राज्य की वित्तीय सेहत को लेकर गहरी चिंता पैदा करने वाला भी है। एक ओर विकास खर्च आधे से कम, दूसरी ओर कर्ज बजट से 65 फीसदी ज्यादा — यही विरोधाभास कांग्रेस के हमले की धार बन गया है।
जूली ने कहा कि कांग्रेस शासित तेलंगाना और कर्नाटक विकास खर्च में आगे हैं, जबकि राजस्थान कर्ज के बोझ में दबता जा रहा है। रिपोर्ट में सबसे खास बात यह रही कि कांग्रेस शासित कर्नाटक और तेलंगाना विकास खर्च के मामले में सबसे आगे रहे, जबकि भाजपा शासित राजस्थान और छत्तीसगढ़ सबसे पीछे नजर आए। इसी तुलना को जूली ने अपने राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हुए यह सवाल उठाया कि अगर भाजपा के शासन में विकास बेहतर होता, तो फिर आंकड़े इस तरह क्यों बोल रहे हैं?
नेता प्रतिपक्ष ने श्वेत पत्र की मांग करते हुए मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को सीधे घेरा और कहा कि सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि विकास खर्च कम और कर्ज लगातार ज्यादा क्यों बढ़ रहा है। श्वेत पत्र एक सरकारी दस्तावेज होता है जिसमें किसी विशेष विषय पर सरकार अपनी नीतियां, खर्च और उपलब्धियां विस्तार से सामने रखती है। जूली की मांग है कि सरकार जनता को पारदर्शी तरीके से बताए कि पिछले दो वर्षों में राजस्थान के विकास के नाम पर आखिर क्या हुआ और इतना भारी कर्ज किन मदों में लिया गया।
बजट के विश्लेषण के संदर्भ में विपक्षी नेताओं ने बजट प्रस्तुति के समय भी कहा था कि राजस्थान का कर्ज स्तर एफआरबीएम की 37 प्रतिशत सीमा के करीब पहुंच चुका है और पिछले तीन वर्षों में लिया गया कर्ज पिछले दशकों के संचित उधार से भी अधिक है, जो राज्य को कर्ज के जाल में धकेल सकता है। सीएजी रिपोर्ट ने इन्हीं आशंकाओं को अब आधिकारिक आंकड़ों से सिद्ध कर दिया है।
इस पूरे विवाद का राजनीतिक पहलू भी महत्वपूर्ण है। दिसंबर 2023 में सत्ता में आई भाजपा सरकार ने कांग्रेस के कार्यकाल को वित्तीय अव्यवस्था का दौर बताया था और वादा किया था कि वह राजस्थान को विकास की नई ऊंचाई पर ले जाएगी। लेकिन सीएजी की रिपोर्ट के आने के बाद अब कांग्रेस पलटवार करते हुए कह रही है कि दो साल बाद भी भाजपा सरकार विकास की बात तो करती है, पर आंकड़े उसकी असलियत सामने ला देते हैं।
टीकाराम जूली का यह आक्रामक रुख और श्वेत पत्र की मांग विधानसभा के अगले सत्र से पहले राजस्थान की राजनीतिक बहस को और तेज करने वाला है। फिलहाल भजनलाल सरकार की ओर से इस मांग पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर सरगर्मी जरूर बढ़ गई है।


