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गोल्ड मेडल विवाद में NLU जोधपुर को राजस्थान हाईकोर्ट का नोटिस

गोल्ड मेडल विवाद में NLU जोधपुर को राजस्थान हाईकोर्ट का नोटिस

राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ में नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (NLU) जोधपुर से जुड़ा एक मामला इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। यह विवाद एक छात्र को मिलने वाले दो गोल्ड मेडल और उसकी मार्कशीट से संबंधित है, जिसे लेकर अदालत ने विश्वविद्यालय प्रशासन से जवाब मांगा है। हाईकोर्ट ने मामले को गंभीरता से लेते हुए यूनिवर्सिटी को नोटिस जारी किया है और अगली सुनवाई तक छात्र की मार्कशीट जारी करने के संबंध में अपना स्पष्ट रुख प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। इस प्रकरण ने विश्वविद्यालयों में पुरस्कार वितरण प्रक्रिया, मूल्यांकन प्रणाली और प्रशासनिक पारदर्शिता को लेकर कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं।

मामला भीलवाड़ा निवासी अनुज शुक्ला से जुड़ा है, जिन्होंने अपनी याचिका में आरोप लगाया है कि उन्हें मिलने वाले दो गोल्ड मेडल अंतिम समय में बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए किसी अन्य छात्रा को दे दिए गए। अनुज स्वयं एक न्यायिक अभ्यर्थी हैं और उन्होंने अपने वरिष्ठ निखिल अजमेरा के सहयोग से अदालत में स्वयं ही पैरवी की है। उनका दावा है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने न केवल उनके साथ अन्याय किया, बल्कि नियमों और प्रक्रियाओं की भी अनदेखी की।

अनुज शुक्ला की शैक्षणिक पृष्ठभूमि भी उल्लेखनीय रही है। उन्होंने वर्ष 2018 से 2023 तक एनएलयू ओडिशा से एलएलबी की पढ़ाई की थी। उत्कृष्ट प्रदर्शन के कारण उन्हें वर्ष 2023 में आयोजित दीक्षांत समारोह में कुल आठ गोल्ड मेडल प्राप्त हुए थे। उस समय उन्हें राष्ट्रपति के हाथों सम्मानित किया गया था, जिससे उनकी शैक्षणिक उपलब्धियां राष्ट्रीय स्तर पर भी चर्चा में रही थीं। एलएलबी के बाद उन्होंने एनएलयू जोधपुर में एलएलएम (आईपीआर लॉ) पाठ्यक्रम में प्रवेश लिया और वर्ष 2023-24 बैच के छात्र बने।

विवाद की शुरुआत एनएलयू जोधपुर के 17वें दीक्षांत समारोह से हुई, जो 23 फरवरी 2025 को आयोजित किया गया था। विश्वविद्यालय की विभिन्न समितियों द्वारा पहले ही अनुज शुक्ला को दो गोल्ड मेडल के लिए चयनित किया जा चुका था। 8 फरवरी 2025 को हुई एक बैठक में संबंधित समिति ने उनके नाम की सिफारिश की थी, जिसे बाद में 15 फरवरी को अकादमिक परिषद द्वारा भी मंजूरी दे दी गई। इतना ही नहीं, दीक्षांत समारोह के लिए प्रकाशित आधिकारिक ब्रोशर में भी अनुज का नाम गोल्ड मेडल विजेता के रूप में दर्ज था और तैयार किए गए मेडल पर उनका नाम अंकित किया जा चुका था।

हालांकि समारोह के दिन घटनाक्रम ने अचानक नया मोड़ ले लिया। अनुज के अनुसार दीक्षांत जुलूस शुरू होने से मात्र पांच मिनट पहले उन्हें परीक्षा नियंत्रक द्वारा रोक दिया गया। उन्हें बताया गया कि एक विषय के पुनर्मूल्यांकन के बाद उनकी स्थिति बदल गई है और अब वे गोल्ड मेडल के पात्र नहीं रहे। इसके बाद बिना किसी पूर्व सूचना या सुनवाई का अवसर दिए दोनों गोल्ड मेडल उसी कक्षा की एक अन्य छात्रा को प्रदान कर दिए गए। इस फैसले ने अनुज को हैरान कर दिया और उन्होंने इसे मनमाना तथा नियमों के विपरीत बताया।

पूरा विवाद एलएलएम प्रथम सेमेस्टर के ‘रिसर्च मेथोडोलॉजी’ विषय के अंकों से जुड़ा हुआ है। अनुज को इस विषय में मूल रूप से 82 अंक प्राप्त हुए थे। बाद में पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया में यह अंक घटाकर 65 कर दिए गए। अनुज का कहना है कि उन्होंने इस बदलाव को लेकर विश्वविद्यालय से स्पष्टीकरण मांगा था, लेकिन उन्हें कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला। महत्वपूर्ण बात यह भी है कि विश्वविद्यालय ने उन्हें जो ग्रेड शीट जारी की थी, उसमें 82 अंक ही दर्ज थे और उसी आधार पर उनका कुल स्कोर तथा सीजीपीए निर्धारित किया गया था।

उसी आधिकारिक रिकॉर्ड के आधार पर गोल्ड मेडल चयन समिति ने अनुज को सर्वाधिक अंक प्राप्त छात्र मानते हुए दो गोल्ड मेडल के लिए योग्य घोषित किया था। लेकिन दीक्षांत समारोह के दिन अचानक बदले गए अंकों को आधार बनाकर पूरा निर्णय बदल दिया गया। अनुज का आरोप है कि इस प्रक्रिया में न तो उन्हें कोई सुनवाई का अवसर दिया गया और न ही अकादमिक परिषद से दोबारा कोई औपचारिक स्वीकृति ली गई।

हाईकोर्ट में दायर याचिका में अनुज ने यह महत्वपूर्ण कानूनी तर्क भी रखा है कि विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार गोल्ड मेडल देने या वापस लेने का अधिकार केवल अकादमिक परिषद के पास है। परीक्षा नियंत्रक को ऐसा निर्णय लेने का अधिकार नहीं है। याचिका में यह भी कहा गया है कि जिस निर्णय के आधार पर गोल्ड मेडल किसी अन्य छात्रा को दिए गए, उस पर कुलपति की स्वीकृति भी दो दिन बाद प्राप्त हुई। अर्थात जिस समय मेडल वितरित किए गए, उस समय संबंधित प्रशासनिक प्रक्रिया पूरी नहीं हुई थी।

मामले ने तब और गंभीर रूप ले लिया जब अनुज ने सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत दस्तावेज मांगे। प्राप्त दस्तावेजों से यह जानकारी सामने आई कि दीक्षांत समारोह के दिन एक बैठक आयोजित कर अंतिम समय में निर्णय बदला गया था। हालांकि उस बैठक के रिकॉर्ड और दस्तावेजों में कई प्रक्रियात्मक सवाल सामने आए। याचिकाकर्ता का दावा है कि उपलब्ध दस्तावेजों में आवश्यक विवरण और तिथियों का अभाव है, जिससे पूरे निर्णय की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगते हैं।

एक अन्य विवादित पहलू मार्कशीट से जुड़ा हुआ है। अनुज के अनुसार विश्वविद्यालय ने बाद में उन्हें एक नई मार्कशीट देने का प्रयास किया, जिसे पूर्व तिथि से प्रमाणित बताया गया था। उन्होंने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। उनका कहना है कि तब से लेकर अब तक उन्हें सही और अंतिम मार्कशीट उपलब्ध नहीं कराई गई है, जिससे उनके शैक्षणिक और पेशेवर भविष्य पर असर पड़ रहा है।

मामले की सुनवाई के दौरान राजस्थान हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय प्रशासन से स्पष्ट जवाब मांगा है। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया है कि मार्कशीट से संबंधित स्थिति को अगली सुनवाई तक पूरी तरह स्पष्ट किया जाए। अदालत ने संकेत दिया है कि इस मामले में प्रक्रिया, अधिकार क्षेत्र और प्रशासनिक निर्णयों की वैधता जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं की जांच आवश्यक है।

यह मामला केवल एक छात्र और दो गोल्ड मेडल तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि उच्च शिक्षण संस्थानों में पारदर्शिता, मूल्यांकन प्रक्रिया की विश्वसनीयता और छात्रों के अधिकारों से जुड़े व्यापक सवालों को भी सामने ला रहा है। अब सभी की निगाहें जुलाई 2026 में होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां अदालत विश्वविद्यालय प्रशासन से प्राप्त जवाबों और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर आगे की दिशा तय करेगी। यह मामला आने वाले समय में उच्च शिक्षा संस्थानों की जवाबदेही और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकता है।

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