जयपुर में वर्षों से विवादों में रही बहुमूल्य सरकारी जमीन को लेकर शनिवार को एक बड़ी प्रशासनिक कार्रवाई देखने को मिली। राजस्थान हाउसिंग बोर्ड ने बीटू बाइपास से द्रव्यवती नदी तक फैली लगभग 42 बीघा अवाप्तशुदा भूमि पर कब्जा लेने की प्रक्रिया शुरू करते हुए मौके पर व्यापक अभियान चलाया। करीब 2200 करोड़ रुपये मूल्य की इस जमीन पर लंबे समय से विवाद बना हुआ था और इसे लेकर कई कानूनी एवं प्रशासनिक प्रक्रियाएं चल रही थीं। हाईकोर्ट से राहत मिलने के बाद हाउसिंग बोर्ड की टीम ने पुलिस प्रशासन के सहयोग से मौके पर पहुंचकर अवैध निर्माणों को हटाने और भूमि को अपने नियंत्रण में लेने की कार्रवाई शुरू की।
कार्रवाई के दौरान हाउसिंग बोर्ड के अधिकारी भारी पुलिस बल और प्रशासनिक टीम के साथ मौके पर पहुंचे। बुल्डोजर और अन्य मशीनों की सहायता से जमीन पर बनी बाउंड्री वॉल, कच्चे-पक्के मकानों तथा अन्य अस्थायी निर्माणों को हटाया गया। इसके साथ ही भूमि पर हाउसिंग बोर्ड के स्वामित्व को दर्शाने वाले साइनेज भी लगाए गए, ताकि भविष्य में किसी प्रकार के अवैध कब्जे की संभावना को रोका जा सके। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यह अभियान केवल प्रारंभिक चरण है और आगामी दिनों में भी कार्रवाई जारी रहेगी। रविवार को भी इस भूमि पर बने कई बड़े निर्माणों को हटाने की योजना बनाई गई है।
इस अभियान का नेतृत्व हाउसिंग बोर्ड के उप आवासन आयुक्त संजय शर्मा ने किया। उनके साथ राजस्थान आवासन बोर्ड कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष मोहन सिंह, महामंत्री रमेश शर्मा और वरिष्ठ उपाध्यक्ष गोविंद नाटाणी सहित कई अधिकारी और कर्मचारी मौजूद रहे। पूरी कार्रवाई पुलिस प्रशासन की निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था के बीच संपन्न हुई ताकि किसी प्रकार की अप्रिय स्थिति उत्पन्न न हो।
यह मामला केवल वर्तमान कार्रवाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी पृष्ठभूमि कई दशक पुरानी है। हाउसिंग बोर्ड ने इस भूमि के अधिग्रहण की प्रक्रिया वर्ष 1989 में शुरू की थी। निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत वर्ष 1991 तक भूमि अवाप्ति की कार्रवाई पूरी भी कर ली गई थी। हालांकि उस समय बोर्ड ने जमीन का वास्तविक कब्जा नहीं लिया, जिसके कारण बाद के वर्षों में यह विवाद गहराता चला गया। प्रशासनिक स्तर पर समय रहते कब्जा नहीं लेने का फायदा उठाकर कुछ लोगों ने इस भूमि पर अपने अधिकार जताने शुरू कर दिए।
बताया जाता है कि समय के साथ कुछ भूमाफियाओं ने इस जमीन पर जवाहरपुरी भवन निर्माण सहकारी समिति के नाम पर कॉलोनी विकसित कर दी। कथित तौर पर सहकारी समिति के पट्टों और पुराने दस्तावेजों के आधार पर भूखंडों का विक्रय भी किया गया। दावा किया गया कि जमीन की खरीद वर्ष 1981 में की गई थी और उसी आधार पर भूखंडों का आवंटन किया गया। धीरे-धीरे यहां आवासीय निर्माण शुरू हुए और एक कॉलोनी का स्वरूप विकसित हो गया। आरोप यह भी लगाए जाते रहे हैं कि इस प्रक्रिया में कई प्रभावशाली और रसूखदार लोगों को बेहद कम कीमत पर भूखंड उपलब्ध कराए गए।
जमीन के स्वामित्व और नियमन को लेकर वर्ष 2019 में भी महत्वपूर्ण घटनाक्रम सामने आया था। उस समय जयपुर विकास प्राधिकरण (जेडीए) ने कॉलोनी के नियमितीकरण की प्रक्रिया के तहत हाउसिंग बोर्ड से अनापत्ति प्रमाण पत्र (एनओसी) मांगा था। लेकिन तत्कालीन आवासन आयुक्त ने एनओसी देने से इनकार कर दिया। बोर्ड का स्पष्ट मत था कि जिस भूमि पर वैधानिक रूप से उसका अधिकार है और जहां निर्माण की स्थिति भी नियमन के मानकों के अनुरूप नहीं है, वहां नियमितीकरण का कोई आधार नहीं बनता।
हाउसिंग बोर्ड ने उस समय यह भी तर्क दिया था कि संबंधित क्षेत्र में 50 प्रतिशत से कम निर्माण हुआ है, इसलिए कॉलोनी को नियमित करने का सवाल ही नहीं उठता। इसके साथ ही सहकारी समिति के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज करवाई गई थी। मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) तक भी भेजा गया था, ताकि भूमि के आवंटन, विक्रय और स्वामित्व से जुड़े पहलुओं की जांच की जा सके।
इसी बीच जब हाउसिंग बोर्ड ने भूमि पर कब्जा लेने के प्रयास तेज किए तो स्थानीय निवासियों और कुछ अन्य पक्षों ने इसका विरोध किया। इसी वर्ष 16 अप्रैल को भी बोर्ड प्रशासन ने यहां कब्जा लेने की कार्रवाई शुरू की थी। उस समय प्रशासनिक दबाव, विरोध और विभिन्न स्तरों पर हस्तक्षेप के कारण अभियान को बीच में ही रोकना पड़ा था। इसके बाद कॉलोनी के कुछ निवासियों और संबंधित पक्षों ने राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कार्रवाई के खिलाफ याचिका दायर की।
प्रारंभिक सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने मामले में अंतरिम राहत देते हुए कार्रवाई पर रोक लगा दी थी। हालांकि बाद में विस्तृत सुनवाई के दौरान अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद पूर्व में दिए गए स्थगन आदेश को निरस्त कर दिया। न्यायालय ने हाउसिंग बोर्ड को भूमि पर कब्जा लेने और आवश्यक कानूनी कार्रवाई आगे बढ़ाने की अनुमति प्रदान कर दी। कोर्ट के इसी आदेश के बाद बोर्ड प्रशासन ने दोबारा अभियान शुरू करते हुए जमीन पर कब्जा लेने की कार्रवाई को अमलीजामा पहनाया।
विशेषज्ञों का मानना है कि जयपुर जैसे तेजी से विकसित हो रहे शहर में भूमि से जुड़े विवाद लगातार बढ़ रहे हैं और सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जे प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं। ऐसे मामलों में वर्षों तक कानूनी प्रक्रियाएं चलने के कारण स्थिति और जटिल हो जाती है। बीटू बाइपास और द्रव्यवती नदी के बीच स्थित यह भूमि भी शहर के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में गिनी जाती है, जिसके कारण इसकी बाजार कीमत हजारों करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है।
हाउसिंग बोर्ड की ताजा कार्रवाई को सरकारी संपत्तियों की सुरक्षा और भूमि प्रबंधन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। प्रशासन का कहना है कि भूमि पर पूर्ण कब्जा लेने और सभी अवैध निर्माणों को हटाने की प्रक्रिया नियमानुसार जारी रहेगी। आने वाले दिनों में इस क्षेत्र के भविष्य को लेकर भी महत्वपूर्ण निर्णय लिए जा सकते हैं, क्योंकि यह जमीन शहरी विकास और आवासीय योजनाओं के लिए रणनीतिक रूप से काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है।


