राजस्थान हाईकोर्ट ने वरिष्ठ अध्यापक पदोन्नति से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में राज्य सरकार को बड़ी राहत देते हुए राजस्थान शैक्षणिक (राज्य एवं अधीनस्थ) सेवा प्रथम संशोधन नियम-2024 को वैध ठहराया है। अदालत ने इस संशोधन के खिलाफ दायर कई याचिकाओं को खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि राज्य सरकार द्वारा किया गया संशोधन न तो मनमाना है और न ही संविधान के किसी प्रावधान का उल्लंघन करता है। हाईकोर्ट ने माना कि सरकार का यह कदम लंबे समय से पदोन्नति से वंचित वरिष्ठ अध्यापक (सामान्य) वर्ग के हितों की रक्षा करने के उद्देश्य से उठाया गया था।
यह फैसला न्यायाधीश अरुण मोंगा और न्यायाधीश संदीप शाह की खंडपीठ ने सुनाया। अदालत में यह मामला नवीन कुमार बाबेल सहित कई शिक्षकों द्वारा दायर याचिकाओं के माध्यम से पहुंचा था। याचिकाकर्ताओं ने राजस्थान शैक्षणिक (राज्य एवं अधीनस्थ) सेवा प्रथम संशोधन नियम-2024 के नियम 5 उपनियम (2) के कुछ प्रावधानों की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी थी। उनका कहना था कि राज्य सरकार ने 7 फरवरी 2024 को जारी संशोधन के माध्यम से वरिष्ठ अध्यापक की जगह “वरिष्ठ अध्यापक (सामान्य)” शब्द जोड़कर पदोन्नति प्रक्रिया में असमानता पैदा कर दी है।
याचिकाकर्ताओं का मुख्य तर्क था कि लेक्चरर पद पर पदोन्नति के लिए निर्धारित 50 प्रतिशत कोटा अब केवल वरिष्ठ अध्यापक (सामान्य) वर्ग तक सीमित कर दिया गया है। इससे विषय विशेष के वरिष्ठ अध्यापकों के लिए पदोन्नति के अवसर कम हो गए हैं। शिक्षकों की ओर से अदालत में यह भी कहा गया कि इस संशोधन के कारण कई योग्य शिक्षकों को उनके अनुभव और वरिष्ठता के बावजूद पदोन्नति से वंचित होना पड़ सकता है। उन्होंने सरकार द्वारा तय की गई 3 अगस्त 2021 की कट-ऑफ तारीख को भी चुनौती दी और कहा कि इस तारीख को निर्धारित करने का कोई स्पष्ट और तार्किक आधार नहीं है।
याचिकाओं में यह भी कहा गया कि संशोधन के तहत उन शिक्षकों को भी पदोन्नति के लिए पात्र माना गया है जिन्होंने स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई अलग-अलग विषयों में की है, बशर्ते उन्होंने यह योग्यता निर्धारित अवधि से पहले प्राप्त की हो। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह प्रावधान समान अवसर के सिद्धांत के विपरीत है और इससे विषय विशेष के शिक्षकों के अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
सुनवाई के दौरान राजस्थान सरकार की ओर से अदालत में विस्तृत पक्ष रखा गया। सरकार ने बताया कि वर्ष 2021 में लागू नियमों के बाद बड़ी संख्या में वरिष्ठ अध्यापक (सामान्य) ऐसे रह गए थे जिनके लिए आगे पदोन्नति का कोई स्पष्ट रास्ता नहीं बचा था। सरकार के अनुसार करीब दस हजार शिक्षक लंबे समय से पदोन्नति से वंचित थे और उनके हितों की सुरक्षा के लिए ही 2024 का संशोधन लाया गया। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था स्थायी नहीं है, बल्कि एक अस्थाई कदम के रूप में लागू की गई है ताकि पात्र वरिष्ठ अध्यापक (सामान्य) को पदोन्नति का अवसर मिल सके।
राज्य सरकार ने अदालत को यह भी बताया कि जब तक पात्र वरिष्ठ अध्यापक (सामान्य) पदोन्नत नहीं हो जाते, तब तक यह व्यवस्था लागू रहेगी। इसके बाद संबंधित पदों को सीधी भर्ती के माध्यम से भरा जाएगा। सरकार ने कहा कि संशोधन का उद्देश्य किसी अन्य वर्ग के शिक्षकों के अधिकारों को समाप्त करना नहीं, बल्कि लंबे समय से लंबित पदोन्नति संबंधी समस्या का समाधान करना है।
खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि वरिष्ठ अध्यापक और वरिष्ठ अध्यापक (सामान्य) प्रारंभ से ही अलग-अलग वर्गों के रूप में कार्यरत रहे हैं। अदालत ने माना कि दोनों वर्गों की भर्ती प्रक्रिया, सेवा शर्तें और पदोन्नति व्यवस्था अलग-अलग रही है। ऐसे में सरकार द्वारा किया गया वर्गीकरण तार्किक और प्रशासनिक दृष्टि से उचित माना जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि सरकार ने जो संशोधन किया है उसका सीधा संबंध उस उद्देश्य से है जिसे हासिल करने के लिए यह कदम उठाया गया था।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता यह साबित नहीं कर पाए कि संशोधन संविधान के किसी प्रावधान का उल्लंघन करता है। अदालत ने माना कि राज्य सरकार को सेवा नियमों में आवश्यक संशोधन करने का अधिकार है और इस मामले में सरकार ने अपनी विधायी शक्तियों की सीमा के भीतर रहकर ही निर्णय लिया है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि केवल किसी वर्ग को लाभ मिलने भर से संशोधन को असंवैधानिक नहीं माना जा सकता, जब तक वह निर्णय तार्किक और सार्वजनिक हित में हो।
अदालत ने अपने फैसले में यह भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि याचिकाकर्ताओं के पदोन्नति के अवसर पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। कोर्ट के अनुसार विषय विशेष के वरिष्ठ अध्यापक अभी भी अपने विषय के अनुसार उपलब्ध रिक्तियों और वरिष्ठता के आधार पर पदोन्नति के लिए विचारणीय रहेंगे। इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि संशोधन के कारण उनके अधिकार पूरी तरह खत्म हो गए हैं।
राजस्थान हाईकोर्ट के इस फैसले को राज्य के शिक्षा विभाग और हजारों शिक्षकों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। लंबे समय से लंबित पदोन्नति विवाद पर अदालत की मुहर लगने के बाद अब सरकार को संशोधित नियमों के तहत आगे की प्रक्रिया पूरी करने का रास्ता साफ हो गया है। वहीं दूसरी ओर यह फैसला उन शिक्षकों के लिए राहत लेकर आया है जो कई वर्षों से पदोन्नति का इंतजार कर रहे थे। शिक्षा विभाग में अब इस निर्णय के बाद पदोन्नति प्रक्रिया में तेजी आने की संभावना जताई जा रही है।


