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अप्रैल में बढ़ी बेरोजगारी दर, ग्रामीण भारत में ज्यादा असर

अप्रैल में बढ़ी बेरोजगारी दर, ग्रामीण भारत में ज्यादा असर

देश में रोजगार के मोर्चे पर चिंता बढ़ाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के अनुसार अप्रैल 2026 में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों की बेरोजगारी दर बढ़कर 5.2 फीसदी हो गई है। यह पिछले छह महीनों का सबसे ऊंचा स्तर माना जा रहा है। इससे पहले अक्तूबर 2025 में भी बेरोजगारी दर इसी स्तर पर दर्ज की गई थी। मार्च 2026 में यह दर 5.1 फीसदी थी, लेकिन अप्रैल में इसमें वृद्धि दर्ज की गई, जिसने रोजगार बाजार को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं।

सरकार की ओर से जारी इस रिपोर्ट में देशभर के 3 लाख 74 हजार 243 लोगों से प्राप्त आंकड़ों का विश्लेषण किया गया है। इन आंकड़ों के आधार पर तैयार रिपोर्ट यह संकेत देती है कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार की स्थिति कमजोर हुई है, जबकि शहरी क्षेत्रों में कुछ राहत देखने को मिली है। विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था में रोजगार के अवसर सीमित होने और कृषि आधारित कार्यों में अस्थिरता के कारण बेरोजगारी बढ़ी है।

रिपोर्ट के अनुसार शहरी क्षेत्रों में बेरोजगारी दर मार्च के 6.8 फीसदी से घटकर अप्रैल में 6.6 फीसदी रह गई। इसका मतलब है कि शहरों में रोजगार के अवसरों में मामूली सुधार देखने को मिला है। हालांकि इसके विपरीत ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी दर 4.3 फीसदी से बढ़कर 4.6 फीसदी हो गई, जो यह दर्शाती है कि गांवों में रोजगार का संकट लगातार गहरा रहा है। ग्रामीण इलाकों में खेती, निर्माण और छोटे व्यवसायों पर निर्भर लोगों को रोजगार की अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है।

पुरुषों और महिलाओं के आंकड़ों को अलग-अलग देखें तो स्थिति और अधिक स्पष्ट हो जाती है। अप्रैल 2026 में पुरुषों की बेरोजगारी दर 5.1 फीसदी रही, जबकि मार्च में यह 5 फीसदी थी। ग्रामीण पुरुष बेरोजगारी दर 4.4 फीसदी से बढ़कर 4.7 फीसदी हो गई। हालांकि शहरी पुरुषों के लिए कुछ राहत की खबर रही, जहां बेरोजगारी दर 6.1 फीसदी से घटकर 5.9 फीसदी पर पहुंच गई। इससे यह संकेत मिलता है कि शहरों में औद्योगिक और सेवा क्षेत्रों में रोजगार की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर बनी हुई है।

महिलाओं की बेरोजगारी दर में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। मार्च में महिलाओं की बेरोजगारी दर 5.3 फीसदी थी, जो अप्रैल में बढ़कर 5.4 फीसदी हो गई। ग्रामीण महिलाओं में रोजगार संकट ज्यादा गंभीर दिखाई दिया, जहां बेरोजगारी दर बढ़कर 4.4 फीसदी तक पहुंच गई। हालांकि शहरी महिलाओं के लिए स्थिति कुछ बेहतर रही और बेरोजगारी दर घटकर 8.5 फीसदी दर्ज की गई। यह पिछले वर्ष अप्रैल के बाद सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। इसके बावजूद महिला रोजगार भागीदारी अब भी पुरुषों की तुलना में काफी कम बनी हुई है।

रिपोर्ट में कार्यरत आबादी अनुपात यानी वर्कर पॉपुलेशन रेशियो (डब्ल्यूपीआर) के आंकड़े भी जारी किए गए हैं। अप्रैल 2026 में यह अनुपात 52.2 फीसदी दर्ज किया गया, जबकि मार्च में यह 52.6 फीसदी था। इसका अर्थ यह है कि कुल आबादी में काम करने वाले लोगों का प्रतिशत घटा है। शहरी क्षेत्रों में डब्ल्यूपीआर 46.8 फीसदी पर स्थिर बना रहा, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में यह घटकर 54.9 फीसदी रह गया। इससे साफ संकेत मिलता है कि ग्रामीण रोजगार बाजार में कमजोरी बनी हुई है।

श्रम बल भागीदारी दर यानी लेबर फोर्स पार्टिसिपेशन रेट (एलएफपीआर) में भी गिरावट दर्ज की गई है। अप्रैल में एलएफपीआर घटकर 55 फीसदी पर आ गया, जबकि मार्च में यह 55.4 फीसदी था। ग्रामीण क्षेत्रों में यह दर 57.5 फीसदी रही, जबकि शहरी क्षेत्रों में 50.1 फीसदी दर्ज की गई। यह आंकड़े बताते हैं कि रोजगार की तलाश करने वाले लोगों की संख्या में भी कमी आई है। विशेषज्ञों के अनुसार कई बार रोजगार के अवसर नहीं मिलने के कारण लोग नौकरी की तलाश ही छोड़ देते हैं, जिससे श्रम भागीदारी दर में गिरावट आती है।

महिलाओं की श्रम भागीदारी दर में आई कमी को लेकर भी चिंता व्यक्त की जा रही है। अप्रैल 2026 में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग की महिलाओं की श्रम बल भागीदारी दर घटकर 33.9 फीसदी रह गई, जबकि मार्च में यह 34.4 फीसदी थी। ग्रामीण महिलाओं का एलएफपीआर 38.2 फीसदी और शहरी महिलाओं का 25 फीसदी दर्ज किया गया। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि महिलाओं की बड़ी आबादी अभी भी रोजगार बाजार से दूर है।

आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि देश में रोजगार सृजन की गति बढ़ाने की आवश्यकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे उद्योग, कृषि आधारित रोजगार और स्वरोजगार योजनाओं को मजबूती देना जरूरी है। साथ ही महिलाओं के लिए सुरक्षित और स्थायी रोजगार अवसर बढ़ाने पर भी ध्यान देना होगा। देश की अर्थव्यवस्था की मजबूती काफी हद तक रोजगार की स्थिति पर निर्भर करती है और बेरोजगारी में लगातार बढ़ोतरी आर्थिक विकास की रफ्तार को प्रभावित कर सकती है।

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