भारतीय संस्कृति और सनातन परंपरा में समय की गणना केवल अंग्रेजी कैलेंडर तक सीमित नहीं रही है। हिंदू धर्म में सदियों से विक्रम संवत और हिंदू पंचांग के आधार पर तिथियों, पर्वों और धार्मिक आयोजनों का निर्धारण किया जाता है। जहां अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार हर वर्ष 1 जनवरी को नए साल की शुरुआत मानी जाती है, वहीं हिंदू पंचांग में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से नववर्ष प्रारंभ होता है। वर्तमान समय में विक्रम संवत 2082 चल रहा है और आने वाला वर्ष 2083 धार्मिक दृष्टि से बेहद विशेष माना जा रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि वर्ष 2026 में अधिकमास पड़ने जा रहा है, जिसके कारण हिंदू पंचांग में सामान्य 12 महीनों की जगह 13 महीने होंगे।
धार्मिक गणना के अनुसार वर्ष 2026 में ज्येष्ठ मास दो बार आएगा। इसमें एक सामान्य ज्येष्ठ महीना होगा, जबकि दूसरा अधिक ज्येष्ठ मास कहलाएगा। अधिकमास को ही पुरुषोत्तम मास या मलमास भी कहा जाता है। इस कारण वर्ष 2026 में ज्येष्ठ मास की अवधि लगभग 58 से 59 दिनों तक रहेगी। हिंदू धर्म में अधिकमास को विशेष धार्मिक महत्व दिया जाता है और इसे भगवान विष्णु को समर्पित महीना माना जाता है। यही कारण है कि इस पूरे महीने में पूजा-पाठ, जप, तप, दान और धार्मिक अनुष्ठानों का विशेष महत्व बढ़ जाता है।
पंचांग के अनुसार अधिकमास की शुरुआत 17 मई 2026 से होगी और यह 15 जून 2026 तक चलेगा। इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, नामकरण, भूमि पूजन और अन्य मांगलिक कार्यों पर रोक रहेगी। धार्मिक मान्यता के अनुसार अधिकमास का उद्देश्य चंद्र वर्ष और सूर्य वर्ष के बीच बनने वाले समय के अंतर को संतुलित करना होता है, इसलिए इसे शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता। हालांकि आध्यात्मिक साधना और भगवान की भक्ति के लिए यह महीना अत्यंत शुभ माना जाता है।
भारतीय ज्योतिष और पंचांग गणना पद्धति के अनुसार सूर्य वर्ष और चंद्र वर्ष की अवधि में अंतर होता है। सूर्य वर्ष लगभग 365 दिनों का माना जाता है, जबकि चंद्र वर्ष करीब 354 दिनों का होता है। इस प्रकार दोनों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर आ जाता है। यदि इस अंतर को लगातार अनदेखा किया जाए तो समय के साथ हिंदू पर्व और ऋतुएं अपने निर्धारित समय से हटने लगेंगी। इसी संतुलन को बनाए रखने के लिए लगभग हर तीन वर्ष में एक अतिरिक्त महीना जोड़ा जाता है, जिसे अधिकमास कहा जाता है।
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार अधिकमास हर 32 माह, 16 दिन और 8 घटी के अंतराल पर आता है। यह गणना पूरी तरह खगोलीय स्थिति और ग्रह-नक्षत्रों के आधार पर निर्धारित की जाती है। जब किसी चंद्र मास में सूर्य संक्रांति नहीं होती, तब उस महीने को अधिकमास घोषित किया जाता है। इसी वजह से अधिकमास का संबंध केवल धार्मिक मान्यताओं से नहीं बल्कि वैज्ञानिक और खगोलीय गणनाओं से भी जुड़ा हुआ है।
सनातन धर्म में अधिकमास को भगवान विष्णु का प्रिय महीना माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पहले इस महीने को मलमास कहा जाता था और इसे शुभ कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं माना जाता था। बाद में भगवान विष्णु ने इस महीने को अपना नाम देकर इसे पुरुषोत्तम मास का दर्जा दिया। तभी से यह महीना विशेष रूप से भगवान विष्णु की आराधना के लिए समर्पित माना जाता है। इस दौरान भागवत कथा, रामायण पाठ, गीता पाठ, भजन-कीर्तन, व्रत और दान-पुण्य का विशेष महत्व बताया गया है।
धार्मिक विद्वानों का मानना है कि अधिकमास आत्मशुद्धि और आध्यात्मिक उन्नति का समय होता है। इस महीने में किए गए दान, तप और जप का फल सामान्य दिनों की तुलना में कई गुना अधिक माना जाता है। कई श्रद्धालु इस दौरान तीर्थ यात्रा, सत्संग और धार्मिक आयोजनों में भाग लेते हैं। मंदिरों में विशेष पूजा और धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन भी किया जाता है। खासतौर पर भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की आराधना को इस महीने में अत्यंत फलदायी माना गया है।
हालांकि अधिकमास में शुभ और मांगलिक कार्यों को निषिद्ध माना जाता है। विवाह, सगाई, गृह प्रवेश, मुंडन, नामकरण और नए व्यापार की शुरुआत जैसे कार्य इस अवधि में नहीं किए जाते। धार्मिक मान्यता है कि अधिकमास का उद्देश्य केवल समय संतुलन बनाना है, इसलिए इसे सांसारिक उत्सवों की बजाय आध्यात्मिक साधना के लिए उपयुक्त माना गया है। यही वजह है कि इस महीने को कई लोग ‘निष्क्रिय महीना’ भी कहते हैं।
वर्ष 2026 में अधिकमास पड़ने के कारण पंचांग और धार्मिक आयोजनों के कार्यक्रमों में भी बदलाव देखने को मिलेगा। मंदिरों, ज्योतिषाचार्यों और धार्मिक संस्थाओं ने अभी से पंचांग तैयारियों और तिथियों के निर्धारण पर काम शुरू कर दिया है। आने वाले वर्ष में श्रद्धालुओं के लिए यह समय धार्मिक साधना, पूजा-पाठ और आत्मिक चिंतन का विशेष अवसर लेकर आएगा। अधिकमास केवल एक अतिरिक्त महीना नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, खगोलीय ज्ञान और आध्यात्मिक परंपराओं का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।


