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मां बनने के बाद महिलाओं की मानसिक सेहत क्यों हो रही प्रभावित

मां बनने के बाद महिलाओं की मानसिक सेहत क्यों हो रही प्रभावित

मां बनना किसी भी महिला के जीवन का सबसे खूबसूरत और भावनात्मक अनुभव माना जाता है। बच्चे के जन्म के साथ एक महिला की जिंदगी में नई खुशियां, नई जिम्मेदारियां और कई नए एहसास शामिल हो जाते हैं। हालांकि मातृत्व का यह सफर हमेशा उतना आसान नहीं होता, जितना बाहर से दिखाई देता है। बच्चे की देखभाल, परिवार की जिम्मेदारियां, बदलती दिनचर्या और खुद को नए जीवन के अनुसार ढालने की प्रक्रिया कई बार महिलाओं की मानसिक और भावनात्मक सेहत पर गहरा असर डालती है। यही कारण है कि आज दुनियाभर में नई मांओं के बीच पोस्टपार्टम डिप्रेशन, मेटरनल एंग्जायटी, मॉम गिल्ट और पेरेंटल बर्नआउट जैसी समस्याएं तेजी से सामने आ रही हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, मातृत्व के बाद महिलाओं में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं बेहद आम हैं, लेकिन इनके बारे में खुलकर बातचीत अभी भी बहुत कम होती है। समाज में अक्सर यह धारणा बनी रहती है कि मां बनने के बाद महिला को केवल खुशी महसूस होनी चाहिए, जबकि वास्तविकता इससे काफी अलग हो सकती है। कई महिलाएं अंदर ही अंदर तनाव, डर, अकेलापन और भावनात्मक थकान से गुजरती हैं, लेकिन वे अपनी परेशानी व्यक्त नहीं कर पातीं। यही चुप्पी धीरे-धीरे गंभीर मानसिक समस्याओं का रूप ले लेती है।

ग्लोबल हेल्थ एस्टिमेट के अनुसार, हर पांच में से एक महिला को गर्भावस्था या बच्चे के जन्म के बाद किसी न किसी प्रकार की मानसिक स्वास्थ्य समस्या का सामना करना पड़ता है। इनमें से अधिकांश मामलों की पहचान तक नहीं हो पाती। कई महिलाएं यह समझ ही नहीं पातीं कि वे मानसिक तनाव या डिप्रेशन जैसी स्थिति से गुजर रही हैं। वहीं कुछ महिलाएं सामाजिक दबाव या शर्म के कारण मदद लेने से बचती हैं।

मातृत्व के बाद सामने आने वाली सबसे गंभीर समस्याओं में पोस्टपार्टम डिप्रेशन प्रमुख माना जाता है। अक्सर बच्चे के जन्म के बाद महिलाओं में भावनात्मक उतार-चढ़ाव दिखाई देते हैं, जिसे सामान्य रूप से “बेबी ब्लूस” कहा जाता है। लेकिन जब उदासी, निराशा और मानसिक थकान लंबे समय तक बनी रहे और महिला के रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करने लगे, तब यह पोस्टपार्टम डिप्रेशन का संकेत हो सकता है। इस स्थिति में मां खुद को बेहद अकेला महसूस करने लगती है। उसे बिना कारण रोना आ सकता है, शरीर हमेशा थका हुआ महसूस होता है और कई बार वह अपने बच्चे से भावनात्मक रूप से जुड़ाव भी महसूस नहीं कर पाती।

विशेषज्ञ मानते हैं कि हार्मोनल बदलाव, नींद की कमी, शारीरिक थकान और मातृत्व की नई जिम्मेदारियों का दबाव पोस्टपार्टम डिप्रेशन को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। अगर समय रहते इस स्थिति को पहचाना न जाए, तो इसका असर केवल मां पर ही नहीं बल्कि बच्चे के मानसिक और भावनात्मक विकास पर भी पड़ सकता है। ऐसे मामलों में परिवार का सहयोग, भावनात्मक समर्थन, विशेषज्ञ काउंसलिंग और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय उपचार काफी मददगार साबित होते हैं।

इसके अलावा लगातार तनाव और चिंता भी नई मांओं की मानसिक सेहत को प्रभावित करने वाली बड़ी समस्या बन चुकी है। बच्चे की देखभाल, घर के काम, करियर और परिवार के बीच संतुलन बनाने की कोशिश महिलाओं को मानसिक रूप से थका देती है। कई बार महिलाओं को ऐसा महसूस होने लगता है कि वे हर समय किसी न किसी जिम्मेदारी में उलझी हुई हैं और उन्हें खुद के लिए समय ही नहीं मिल पा रहा। धीरे-धीरे यह स्थिति चिड़चिड़ापन, सिरदर्द, लगातार थकान और ध्यान केंद्रित करने में परेशानी जैसी समस्याओं को जन्म देती है।

अगर यह तनाव लंबे समय तक बना रहे तो यह एंग्जायटी और डिप्रेशन जैसी गंभीर मानसिक स्थितियों का रूप ले सकता है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि महिलाओं को अपनी सीमाओं को समझना चाहिए और हर काम को अकेले संभालने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। परिवार और करीबी लोगों से मदद लेना मानसिक दबाव को काफी कम कर सकता है। इसके अलावा दिनभर की व्यस्तता के बीच खुद के लिए थोड़ा समय निकालना भी जरूरी माना जाता है।

मेटरनल एंग्जायटी भी आज के समय में तेजी से बढ़ती समस्या बन चुकी है। इसमें मां हर समय अपने बच्चे की सुरक्षा, सेहत और भविष्य को लेकर अत्यधिक चिंता में रहती है। उसके मन में हमेशा किसी अनहोनी का डर बना रहता है। कई बार यह चिंता इतनी बढ़ जाती है कि महिला सामान्य निर्णय लेने में भी घबराने लगती है। लगातार बेचैनी, नींद की कमी और अचानक धड़कन तेज हो जाना इसके सामान्य लक्षण माने जाते हैं।

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, अगर इस स्थिति का समय पर उपचार न किया जाए तो यह महिला के भावनात्मक संतुलन को प्रभावित कर सकती है। ऐसे मामलों में बातचीत, भावनात्मक सहयोग, माइंडफुलनेस, ब्रीदिंग एक्सरसाइज और कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी जैसी तकनीकें काफी लाभकारी साबित होती हैं।

मॉम गिल्ट यानी मातृत्व से जुड़ा अपराधबोध भी महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य को गहराई से प्रभावित करता है। कई महिलाएं यह महसूस करती हैं कि वे अपने बच्चे के लिए पर्याप्त नहीं कर पा रही हैं। नौकरी करने वाली महिलाओं में यह भावना और अधिक देखी जाती है। उन्हें अक्सर लगता है कि वे बच्चे को पूरा समय नहीं दे पा रही हैं। वहीं घर पर रहने वाली महिलाओं को करियर छोड़ने का दुख परेशान करता है। समाज और आसपास के लोगों की अपेक्षाएं भी इस अपराधबोध को बढ़ा देती हैं।

धीरे-धीरे महिलाएं खुद के लिए समय निकालना बंद कर देती हैं और हर छोटी बात के लिए खुद को दोष देने लगती हैं। इससे उनका आत्मविश्वास कमजोर होने लगता है और तनाव बढ़ने लगता है। विशेषज्ञों का मानना है कि महिलाओं को यह समझना जरूरी है कि परफेक्ट पेरेंटिंग जैसी कोई चीज नहीं होती। हर मां अपनी परिस्थितियों के अनुसार अपना सर्वश्रेष्ठ देने की कोशिश करती है और यही सबसे महत्वपूर्ण है।

लगातार मानसिक और शारीरिक थकान आखिरकार पेरेंटल बर्नआउट का रूप ले सकती है। इसमें महिला खुद को पूरी तरह से थका हुआ महसूस करती है। पेरेंटिंग उसे खुशी के बजाय बोझ लगने लगती है। बच्चे के साथ भावनात्मक जुड़ाव कमजोर होने लगता है और महिला अपनी भूमिका पर सवाल उठाने लगती है। अगर इस स्थिति को नजरअंदाज किया जाए तो यह गंभीर मानसिक बीमारियों को जन्म दे सकती है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि मातृत्व केवल मां की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि परिवार की सामूहिक जिम्मेदारी होनी चाहिए। महिलाओं पर अकेले सभी जिम्मेदारियों का बोझ डालना उनकी मानसिक सेहत को नुकसान पहुंचाता है। ऐसे में परिवार, साथी और समाज की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। महिलाओं को भावनात्मक सहयोग देने, उनकी बात सुनने और जरूरत पड़ने पर पेशेवर मदद लेने के लिए प्रेरित करना जरूरी है।

आज सबसे ज्यादा जरूरत इस बात की है कि मातृत्व से जुड़ी मानसिक समस्याओं को सामान्य स्वास्थ्य चर्चा का हिस्सा बनाया जाए। नई मांओं को यह एहसास होना चाहिए कि मदद मांगना कमजोरी नहीं बल्कि खुद की देखभाल करने की दिशा में एक जरूरी कदम है। जब महिलाएं अपनी मानसिक और भावनात्मक सेहत को प्राथमिकता देंगी, तभी वे खुद और अपने बच्चे दोनों के लिए स्वस्थ और खुशहाल जीवन सुनिश्चित कर पाएंगी।

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