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राजस्थान विधानसभा में कैमरे लगाने पर टीकाराम जूली की आपत्ति

राजस्थान विधानसभा में कैमरे लगाने पर टीकाराम जूली की आपत्ति

मनीषा शर्मा।  राजस्थान विधानसभा का मानसून सत्र अक्सर तीखी बहसों और आरोप-प्रत्यारोप के लिए सुर्खियों में रहता है। मंगलवार, 9 सितंबर 2025 को सदन की कार्यवाही के दौरान एक नया विवाद खड़ा हो गया जब विपक्ष के नेता टीकाराम जूली ने सदन में लगाए गए कैमरों पर कड़ी आपत्ति जताई। उनका आरोप था कि विपक्षी विधायकों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए जानबूझकर कैमरे लगाए गए हैं।

टीकाराम जूली की आपत्ति

सदन में बोलते हुए जूली ने कहा, “हमारे ऊपर कैमरे लगाए गए हैं। विधानसभा में पहले से ही कैमरे मौजूद हैं, लेकिन केवल विपक्षी विधायकों को टारगेट करने के लिए अलग से कैमरे लगाना गलत है। इधर वाले कैमरे भी हमारे ऊपर हैं और उधर वाले कैमरे भी हमारे ऊपर हैं।” उन्होंने सवाल उठाया कि ये कैमरे किसकी अनुमति से लगाए गए हैं और इनका खर्च किस फंड से किया गया है। साथ ही उन्होंने मांग की कि अगर ये रिकॉर्डिंग की जा रही है तो इसे यूट्यूब या अन्य सार्वजनिक मंचों पर जारी किया जाए, ताकि पारदर्शिता बनी रहे।

निजता के हनन का सवाल

टीकाराम जूली ने इसे निजता का उल्लंघन बताया। उनका कहना था कि सदन की कार्यवाही का सीधा प्रसारण पहले से ही हो रहा है, ऐसे में अतिरिक्त कैमरों की कोई जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा, “अब अगर सदन की कार्यवाही स्थगित है, तब भी हमारी गतिविधियों पर नज़र रखी जाएगी—हम किससे बात करते हैं, किससे मिलते हैं—क्या सरकार हर चीज पर निगरानी करेगी? यह लोकतांत्रिक परंपराओं के खिलाफ है।” जूली के इस बयान से सत्ता और विपक्ष के बीच बहस तेज हो गई।

सत्ता पक्ष का जवाब

विपक्ष के आरोपों पर संसदीय कार्य मंत्री जोगाराम पटेल ने प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि उन्हें कैमरे लगाने की जानकारी नहीं है, लेकिन सरकार कभी भी किसी के अधिकारों का हनन नहीं करना चाहती। उन्होंने विपक्ष से अपील की कि वे सदन की परंपराओं का सम्मान करते हुए सार्थक बहस करें और सरकार को रचनात्मक सुझाव दें। वहीं, मुख्य सचेतक जोगेश्वर गर्ग ने इस मुद्दे पर और भी तीखा जवाब दिया। उन्होंने कहा, “सदन कोई बेडरूम या बाथरूम नहीं है कि कैमरे लगाने से निजता का हनन हो जाए। यह किसी का व्यक्तिगत चैंबर नहीं है। यहां जो भी होता है वह जनता के बीच जाना चाहिए।”  उनका यह बयान विपक्षी विधायकों को और भी असहज कर गया, लेकिन सत्ता पक्ष ने स्पष्ट किया कि कैमरे लोकतांत्रिक पारदर्शिता के लिए लगाए गए हैं, न कि किसी की जासूसी करने के लिए।

विवाद का राजनीतिक महत्व

कैमरों का यह विवाद सिर्फ तकनीकी या प्रशासनिक मुद्दा नहीं रहा, बल्कि यह राजनीतिक रंग ले चुका है। विपक्ष इसे सरकार द्वारा निगरानी और दबाव की रणनीति बता रहा है, वहीं सत्ता पक्ष इसे पारदर्शिता और जवाबदेही से जोड़कर देख रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि यह विवाद राजस्थान की राजनीति में विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच विश्वास की कमी को उजागर करता है। एक ओर विपक्ष को लगता है कि उसकी गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है, वहीं सरकार इसे सामान्य व्यवस्था बता रही है।

लोकतंत्र और पारदर्शिता पर बहस

यह घटना एक बड़ा सवाल भी खड़ा करती है—क्या सदन में कैमरे लगाना पारदर्शिता बढ़ाने का कदम है या फिर यह विधायकों की स्वतंत्रता और निजता पर निगरानी का तरीका? विशेषज्ञों का कहना है कि विधानसभा जैसी जगह, जहां सारी कार्यवाही पहले से ही रिकॉर्ड और प्रसारित होती है, वहां अतिरिक्त कैमरों की जरूरत संदिग्ध है। विपक्ष की शंका स्वाभाविक है कि ये कैमरे केवल एक पक्ष को टारगेट करने के लिए लगाए गए हैं।

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