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प्रेमानंद महाराज को चुनौती देना रामभद्राचार्य को पड़ा भारी

प्रेमानंद महाराज को चुनौती देना रामभद्राचार्य को पड़ा भारी

शोभना शर्मा।    वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज और जगतगुरु रामभद्राचार्य के बीच छिड़ा विवाद अब सोशल मीडिया पर बड़े बहस का मुद्दा बन गया है। दोनों संतों के अनुयायी अपने-अपने गुरु के पक्ष में खड़े हैं। विवाद की शुरुआत तब हुई जब रामभद्राचार्य ने एक इंटरव्यू के दौरान प्रेमानंद महाराज की विद्वता और चमत्कार पर सवाल उठाए। इसके बाद प्रेमानंद महाराज के समर्थकों ने इसे उनकी प्रतिष्ठा पर प्रहार मानते हुए कड़ी प्रतिक्रिया दी।

चमत्कार पर उठाए सवाल

एक इंटरव्यू में रामभद्राचार्य से पूछा गया कि लोग वृंदावन में प्रेमानंद महाराज को भगवान तुल्य क्यों मानते हैं। कई लोग मानते हैं कि वे बिना किडनी के भी जीवित हैं और यह किसी चमत्कार से कम नहीं है। खान सर जैसे लोकप्रिय चेहरे भी प्रेमानंद को चमत्कारी बताते हैं। इस पर रामभद्राचार्य ने कहा कि इसमें कोई चमत्कार नहीं है। उनका कहना था कि प्रेमानंद महाराज डायलिसिस पर जी रहे हैं और यह चिकित्सा का सहारा है, न कि कोई अलौकिक शक्ति।

उन्होंने यह भी कहा कि चमत्कार वही है, जब कोई व्यक्ति शास्त्रों का गहरा ज्ञान रखता हो और संस्कृत श्लोकों का अर्थ समझा सके। रामभद्राचार्य ने चुनौती देते हुए कहा कि यदि प्रेमानंद महाराज उनके सामने संस्कृत का कोई श्लोक बोलकर उसका अर्थ समझा दें, तभी इसे विद्वता या चमत्कार कहा जाएगा।

“लोकप्रियता कुछ समय के लिए होती है”

रामभद्राचार्य ने प्रेमानंद महाराज को व्यक्तिगत रूप से छोटा नहीं बताया, लेकिन उनकी विद्वता और लोकप्रियता पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा, “मैं उन्हें विद्वान या चमत्कारी नहीं कहता। उनकी लोकप्रियता अच्छी है लेकिन यह केवल क्षणिक है। चमत्कार वही है जो शास्त्रों की चर्चा कर सके और शास्त्रों का ज्ञान फैला सके।”

सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया

रामभद्राचार्य के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। कई यूजर्स ने कहा कि उन्होंने प्रेमानंद महाराज को कम पढ़ा-लिखा बताकर उनका अपमान किया है। कुछ ने लिखा कि यह ईर्ष्या का परिणाम है। कई लोग सवाल उठाने लगे कि जब कोई शक्ति नहीं है तो 20 साल से दोनों किडनी फेल होने के बाद वे कैसे जीवित हैं। भक्तों ने कहा कि यह किसी अलौकिक शक्ति के बिना संभव नहीं है। एक यूजर ने लिखा कि कोई संत दूसरे संत को चुनौती कैसे दे सकता है। संतों का धर्म केवल समाज को दिशा देना और भक्ति में लगाना है, न कि एक-दूसरे की आलोचना करना।

तुलना भी की जाने लगी

विवाद के बीच सोशल मीडिया पर दोनों संतों की तुलना भी शुरू हो गई। प्रेमानंद महाराज के समर्थकों ने कहा कि उन्होंने कभी भी किसी मंच पर जाकर स्वयं की लोकप्रियता बढ़ाने का प्रयास नहीं किया। वे केवल कथा के माध्यम से लोगों को शिक्षा और मार्गदर्शन देते हैं। उनका जीवन सादगी और भक्ति से जुड़ा हुआ है।

इसके विपरीत रामभद्राचार्य के बारे में लोगों ने आरोप लगाए कि वे अक्सर राजनीतिक मंचों पर दिखाई देते हैं और नेताओं के साथ मिलते-जुलते हैं। उनके कथनों में जातिगत भेदभाव की झलक भी मिलती है। आलोचकों ने याद दिलाया कि रामभद्राचार्य ने कई बार मंच से वंचित वर्गों के नेताओं जैसे मुलायम सिंह यादव और कांशीराम पर अभद्र टिप्पणियां की थीं।

गुरु दक्षिणा और राजनीति से जुड़ा आरोप

सोशल मीडिया पर लोगों ने यह भी याद दिलाया कि रामभद्राचार्य ने एक बार मंच से कहा था कि उन्होंने एक बड़े नेता के यहां कथा करवाई थी और बदले में अपने शिष्य को सरकारी अधिकारी बनवा दिया। इसे कई लोग धार्मिक आचरण के विपरीत और निजी लाभ के लिए धर्म का इस्तेमाल बताने लगे।

दूसरी ओर प्रेमानंद महाराज के बारे में उनके अनुयायियों ने कहा कि उन्होंने कभी किसी से कुछ नहीं मांगा। वे लोभ-मोह से दूर रहते हैं और केवल भक्ति व शिक्षा पर जोर देते हैं। यही कारण है कि उनके प्रति सवर्णों से लेकर पिछड़े वर्ग और दलितों तक सभी समुदायों में गहरी आस्था है।

जाति को लेकर विवाद

रामभद्राचार्य पर यह आरोप भी लगाया गया कि वे अक्सर अपने कथनों में ब्राह्मणों को ऊँचा और अन्य जातियों को नीचा बताते हैं। इस कारण पिछड़ी जातियों और दलितों में उनके प्रति आस्था कम है। इसके विपरीत प्रेमानंद महाराज ने कभी जातिगत दंभ नहीं दिखाया। वे स्वयं को केवल संत बताते हैं और किसी जातीय पहचान के साथ नहीं जोड़ते।

विवाद कहां तक जाएगा?

यह विवाद केवल दो संतों के बीच विचारों का टकराव नहीं रहा, बल्कि अब यह सोशल मीडिया पर समाज के विभिन्न वर्गों की बहस का मुद्दा बन गया है। प्रेमानंद महाराज के समर्थक उनकी लोकप्रियता को चमत्कार मानते हैं, वहीं रामभद्राचार्य इसे केवल क्षणिक मानकर नकारते हैं।

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