राजस्थान की विधि विज्ञान प्रयोगशाला (FSL) में DNA जांच किट की खरीद को लेकर सामने आया कथित वित्तीय घोटाला इन दिनों राज्य की प्रशासनिक और न्यायिक व्यवस्था के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गया है। यह मामला केवल वित्तीय अनियमितताओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे फॉरेंसिक जांच की विश्वसनीयता और न्याय प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि जिन डीएनए किट्स का उपयोग रेप और हत्या जैसे संवेदनशील मामलों की जांच में किया जाता है, उन्हें बाजार दरों की तुलना में कई गुना अधिक कीमत पर खरीदा गया। इस खुलासे के बाद राज्य सरकार ने तत्काल सख्त रुख अपनाते हुए संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है।
सूत्रों के अनुसार, इस मामले में सबसे चौंकाने वाली बात एक ही कंपनी और एक ही प्रोडक्ट की कीमतों में भारी अंतर का सामने आना है। जांच में यह संकेत मिले हैं कि जिन किट्स को अन्य राज्यों में अपेक्षाकृत कम कीमत पर खरीदा गया, वही किट्स राजस्थान में अत्यधिक महंगे दामों पर खरीदी गईं। कुछ मामलों में यह अंतर 10 से 11 गुना तक पाया गया है, जिससे यह संदेह और गहरा हो गया है कि खरीद प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं।
अगर विशिष्ट उदाहरणों पर नजर डालें तो ऑटोसोमल एसटीआर डीएनए किट, जो अपराध जांच में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, राजस्थान में करीब 4 लाख रुपए से अधिक कीमत पर खरीदी गई। वहीं हरियाणा में यही किट लगभग 83 हजार रुपए में उपलब्ध थी। इस प्रकार प्रति यूनिट करीब 3.20 लाख रुपए का सीधा अंतर सामने आया है। इसी तरह वाई क्रोमोसोमल एसटीआर किट राजस्थान में लगभग 4.74 लाख रुपए में खरीदी गई, जबकि हरियाणा में इसकी कीमत करीब 1.25 लाख रुपए बताई गई। एसटीआर एम्प्लीफिकेशन किट के मामले में तो अंतर और भी चौंकाने वाला है, जहां राजस्थान में इसकी कीमत लगभग 4.30 लाख रुपए रही, जबकि हरियाणा में यही किट मात्र 37 हजार 700 रुपए में खरीदी गई। इस तरह प्रति यूनिट लगभग 3.92 लाख रुपए का अंतर सामने आया, जो खरीद प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
इस पूरे मामले में एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि इस अनियमितता की जानकारी समय रहते संबंधित अधिकारियों को दे दी गई थी, लेकिन इसके बावजूद खरीद प्रक्रिया को रोका नहीं गया। जानकारी के अनुसार, 22 मई 2024 को स्टोर प्रभारी डॉ. रमेश चौधरी ने ई-फाइल के माध्यम से सरकार को इस मामले की जानकारी दी थी। इसके बाद भी वर्ष 2023-24 के दौरान लगातार महंगे दामों पर किट्स की खरीद जारी रही। इतना ही नहीं, शिकायत दर्ज होने के बावजूद 25 जून 2024 को भी खरीद को मंजूरी दे दी गई, जिससे यह मामला और अधिक गंभीर हो गया है।
मामले के सार्वजनिक होने के बाद राज्य सरकार ने तत्काल प्रभाव से कार्रवाई करते हुए तत्कालीन डायरेक्टर डॉ. अजय शर्मा सहित चार अधिकारियों को एपीओ कर दिया है। यह कदम इस बात का संकेत है कि सरकार इस मामले को लेकर गंभीर है और किसी भी स्तर पर लापरवाही या भ्रष्टाचार को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। इसके साथ ही नए डायरेक्टर आर.के. मिश्रा को जिम्मेदारी सौंपी गई है, जिन्होंने पदभार संभालते ही पूरे मामले की जांच शुरू कर दी है।
नए डायरेक्टर आर.के. मिश्रा ने इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि उन्हें हाल ही में यह जिम्मेदारी मिली है और वे सभी तथ्यों की गहनता से जांच कर रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब तक जांच पूरी नहीं हो जाती, तब तक किसी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। उनका यह बयान दर्शाता है कि जांच प्रक्रिया को निष्पक्ष और पारदर्शी बनाए रखने का प्रयास किया जा रहा है।
यह मामला इसलिए भी अत्यंत संवेदनशील है क्योंकि फॉरेंसिक जांच को न्याय प्रणाली की रीढ़ माना जाता है। डीएनए जांच किट्स का उपयोग विशेष रूप से रेप, हत्या और अन्य गंभीर अपराधों की जांच में किया जाता है, जहां साक्ष्यों की शुद्धता और विश्वसनीयता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि इसी प्रणाली में भ्रष्टाचार या अनियमितता की आशंका उत्पन्न होती है, तो इसका सीधा असर न्याय की निष्पक्षता पर पड़ सकता है। ऐसे में यह केवल आर्थिक घोटाले का मामला नहीं रह जाता, बल्कि यह न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा मुद्दा बन जाता है।
राजस्थान में सामने आया यह प्रकरण सरकारी खरीद प्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता को भी उजागर करता है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों से निपटने के लिए मजबूत निगरानी तंत्र और सख्त नियमों का पालन आवश्यक है, ताकि भविष्य में इस प्रकार की घटनाओं को रोका जा सके। फिलहाल पूरे राज्य की नजर इस जांच पर टिकी हुई है और यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि जांच में क्या निष्कर्ष सामने आते हैं और दोषियों के खिलाफ क्या कार्रवाई की जाती है।


