उदयपुर में आदिवासी समाज ने अपनी अलग धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान को मान्यता देने की मांग को लेकर जोरदार प्रदर्शन किया। गुरुवार को सैकड़ों लोग संभागीय आयुक्त कार्यालय के बाहर एकत्र हुए और जनगणना में अलग ‘आदिवासी धर्म कोड’ दिए जाने की मांग उठाई। इस प्रदर्शन का नेतृत्व डूंगरपुर से कांग्रेस विधायक गणेश गोगरा ने किया। प्रदर्शन के दौरान उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को किसी अन्य धर्म की श्रेणी में रखना उचित नहीं है, क्योंकि उनकी जीवनशैली, परंपराएं और आस्था पद्धति पूरी तरह अलग है।
रैली में शामिल लोगों ने अपनी सांस्कृतिक पहचान, परंपराओं और अधिकारों की रक्षा के लिए नारे लगाए। प्रदर्शनकारियों का कहना था कि यदि जनगणना में उन्हें अलग धर्म कोड नहीं दिया गया, तो उनकी गिनती अन्य धर्मों में कर दी जाएगी, जिससे उनकी मूल पहचान कमजोर पड़ सकती है। समाज के लोगों ने इसे केवल प्रशासनिक मांग नहीं, बल्कि अस्तित्व और सम्मान से जुड़ा मुद्दा बताया।
विधायक गणेश गोगरा ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि आदिवासी समाज प्रकृति का पूजक है। उनकी आस्था जल, जंगल, जमीन, पहाड़, पेड़-पौधों और प्राकृतिक तत्वों से जुड़ी है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदाय की जड़ें धरती और परंपरा से जुड़ी हुई हैं, इसलिए उन्हें किसी अन्य धार्मिक पहचान के तहत रखना सामाजिक और ऐतिहासिक रूप से गलत है। उनके अनुसार आदिवासी समाज की पूजा-पद्धति, रीति-रिवाज और सामाजिक संरचना मुख्यधारा के धर्मों से अलग है।
उन्होंने यह भी कहा कि यदि सरकार ने समय रहते आदिवासी पहचान को संवैधानिक और प्रशासनिक स्तर पर मान्यता नहीं दी, तो भविष्य में उनकी संस्कृति, भाषा, लोक परंपराएं और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े अधिकार प्रभावित हो सकते हैं। गोगरा ने कहा कि यह केवल धार्मिक वर्गीकरण का प्रश्न नहीं है, बल्कि समुदाय के भविष्य और अधिकारों का सवाल है।
प्रदर्शन के दौरान विधायक ने ऐतिहासिक संदर्भ भी दिए। उन्होंने दावा किया कि वर्ष 1871 से 1951 तक आदिवासी समाज की गिनती अलग श्रेणी में की जाती थी। उनके अनुसार उस समय एक अलग कोड नंबर के माध्यम से आदिवासियों की पहचान दर्ज होती थी, लेकिन बाद में इसे समाप्त कर दिया गया। उन्होंने कहा कि यदि पहले यह व्यवस्था संभव थी, तो आज फिर से इसे लागू करने में कोई बाधा नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने सवाल उठाया कि जब देश में अन्य समुदायों और धर्मों को अलग पहचान दी जा सकती है, तो करोड़ों की आबादी वाले आदिवासी समाज को यह अधिकार क्यों नहीं दिया जा रहा। उन्होंने कहा कि यह मांग किसी के खिलाफ नहीं है, बल्कि अपने अस्तित्व और सांस्कृतिक अधिकारों के पक्ष में है।
रैली में बड़ी संख्या में युवा, महिलाएं और समाज के वरिष्ठ लोग शामिल हुए। युवाओं ने कहा कि वे अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए यह लड़ाई लड़ रहे हैं। उनका कहना था कि यदि आज पहचान सुरक्षित नहीं की गई, तो आने वाले समय में इतिहास, परंपरा और सामुदायिक संरचना को नुकसान पहुंच सकता है। कई प्रदर्शनकारियों ने पारंपरिक वेशभूषा में भाग लेकर अपनी सांस्कृतिक एकता का संदेश दिया।
उदयपुर और आसपास के आदिवासी बहुल क्षेत्रों से आए लोगों ने कहा कि जनगणना केवल संख्या गिनने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि नीति निर्माण, संसाधनों के वितरण और सामाजिक प्रतिनिधित्व का आधार भी है। ऐसे में यदि आदिवासी समाज की अलग पहचान दर्ज नहीं होगी, तो भविष्य की योजनाओं और नीतियों पर भी उसका असर पड़ सकता है।
समाज के प्रतिनिधियों ने संभागीय आयुक्त कार्यालय में ज्ञापन सौंपा और मांग की कि उनकी बात केंद्र सरकार तक जल्द पहुंचाई जाए। ज्ञापन में जनगणना 2026 में अलग आदिवासी धर्म कोड शामिल करने की मांग प्रमुख रूप से रखी गई। साथ ही सांस्कृतिक संरक्षण, पारंपरिक अधिकारों और पहचान से जुड़े मुद्दों पर भी ध्यान देने की अपील की गई।
विधायक गोगरा ने कहा कि यह आंदोलन अभी शुरुआत है। यदि उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया, तो आने वाले समय में आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रख रहा है, लेकिन लगातार उपेक्षा की स्थिति में विरोध तेज होगा।
राजस्थान सहित देश के कई हिस्सों में आदिवासी समुदाय लंबे समय से अपनी विशिष्ट पहचान, भाषा और सांस्कृतिक अधिकारों को लेकर आवाज उठाता रहा है। उदयपुर में हुआ यह प्रदर्शन उसी व्यापक विमर्श का हिस्सा माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि जनगणना में पहचान संबंधी वर्गीकरण केवल तकनीकी विषय नहीं होता, बल्कि सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक महत्व भी रखता है।


