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नागौर में चोरी की जांच के लिए पुलिस पहुंची तांत्रिक के पास, हाईकोर्ट सख्त

नागौर में चोरी की जांच के लिए पुलिस पहुंची तांत्रिक के पास, हाईकोर्ट सख्त

राजस्थान के नागौर जिले से एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने पुलिस जांच प्रणाली और कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक जांच के दौर में भी अगर पुलिस किसी चोरी की वारदात को सुलझाने के लिए तांत्रिकों और अंधविश्वास का सहारा लेने लगे, तो यह न केवल कानून व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि आमजन के भरोसे को भी कमजोर करता है। नागौर के श्री बालाजी थाना क्षेत्र में हुई एक चोरी की जांच के दौरान पुलिस द्वारा कथित रूप से एक भोपी यानी तांत्रिक की मदद लेने का मामला अब राजस्थान हाईकोर्ट तक पहुंच गया है। इस मामले में हाईकोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए जांच अधिकारी को हटाने और निष्पक्ष जांच कराने के आदेश जारी किए हैं।

पूरा मामला नागौर जिले के श्री बालाजी थाना क्षेत्र का बताया जा रहा है। याचिकाकर्ता खेमी देवी ने जोधपुर स्थित राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि उनके घर में 7 मार्च 2026 को चोरी की बड़ी वारदात हुई थी। चोरी के दौरान घर में रखे सोने-चांदी के आभूषण और नकदी गायब हो गई थी। घटना के बाद पुलिस ने मामला दर्ज तो कर लिया, लेकिन जांच की दिशा जल्द ही विवादों में आ गई। पीड़िता का आरोप है कि मामले की जांच कर रहे हेड कांस्टेबल रतिराम ने वैज्ञानिक और कानूनी तरीके से जांच करने के बजाय अंधविश्वास का रास्ता अपना लिया।

याचिका में बताया गया कि काफी समय तक चोरी का कोई सुराग नहीं मिलने पर जांच अधिकारी ने पीड़ित परिवार और गांव के कुछ लोगों को सुझाव दिया कि अलवर में एक भोपी बैठती है, जो चोरी और अपराध के मामलों में कथित तौर पर सच बता देती है। आरोप है कि हेड कांस्टेबल खुद पीड़ित पक्ष को लेकर अलवर पहुंचा और वहां तांत्रिक से मुलाकात करवाई। इस दौरान उस भोपी ने बिना किसी ठोस सबूत और जांच के पीड़िता की बहू के पिता मोहनराम का नाम लेते हुए दावा किया कि चोरी उसी ने की है।

सबसे गंभीर बात यह रही कि पुलिस ने भोपी के कथित बयान को आधार बनाकर मोहनराम को शक के दायरे में लेना शुरू कर दिया। याचिका में आरोप लगाया गया कि इसके बाद पुलिस ने वास्तविक अपराधियों की तलाश करने के बजाय मोहनराम को परेशान करना शुरू कर दिया। इस पूरे घटनाक्रम ने पुलिस जांच की निष्पक्षता और पेशेवर रवैये पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए।

मामले की सुनवाई राजस्थान हाईकोर्ट में जस्टिस मुन्नुरी लक्ष्मण की अदालत में हुई। याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता मनोहर सिंह राठौड़ ने अदालत को बताया कि भारतीय कानून में कहीं भी यह प्रावधान नहीं है कि किसी अपराध की जांच तांत्रिक, भोपी या अंधविश्वास के आधार पर की जाए। उन्होंने कहा कि पुलिस का काम वैज्ञानिक साक्ष्य, तकनीकी जांच और कानूनी प्रक्रियाओं के आधार पर अपराध का खुलासा करना है, न कि किसी कथित तांत्रिक के इशारों पर कार्रवाई करना।

सुनवाई के दौरान अदालत में मौजूद सरकारी वकील ने भी इस बात को स्वीकार किया कि जांच अधिकारी वास्तव में पीड़ित परिवार को लेकर अलवर स्थित भोपी के पास गया था। सरकारी पक्ष की यह स्वीकारोक्ति सामने आने के बाद अदालत ने मामले को बेहद गंभीरता से लिया। कोर्ट ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था और कानून के शासन वाले देश में पुलिस जांच अंधविश्वास और तंत्र-मंत्र के आधार पर नहीं चलाई जा सकती। अदालत ने यह भी माना कि इस तरह की कार्यप्रणाली से निष्पक्ष जांच संभव नहीं है और इससे निर्दोष लोगों को प्रताड़ना का सामना करना पड़ सकता है।

हाईकोर्ट ने मामले में सख्त रुख अपनाते हुए नागौर पुलिस अधीक्षक को तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए। अदालत ने आदेश दिया कि इस चोरी प्रकरण की जांच वर्तमान हेड कांस्टेबल से तुरंत वापस ली जाए। साथ ही केस डायरी को श्री बालाजी थाने से हटाकर किसी अन्य थाने में स्थानांतरित किया जाए ताकि जांच निष्पक्ष तरीके से हो सके। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिए कि मामले की जांच अब सब इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी से करवाई जाए और नया जांच अधिकारी अगले 15 दिनों के भीतर जांच प्रक्रिया शुरू करे।

इस मामले ने एक बार फिर पुलिस व्यवस्था में वैज्ञानिक जांच और पेशेवर प्रशिक्षण की आवश्यकता को उजागर किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अपराध जांच जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में अंधविश्वास को जगह देना न केवल कानून का उल्लंघन है, बल्कि इससे आमजन का पुलिस और न्याय व्यवस्था से विश्वास भी कमजोर होता है। तकनीकी युग में जहां सीसीटीवी फुटेज, मोबाइल लोकेशन, फॉरेंसिक साइंस और डिजिटल सबूत जैसे आधुनिक साधन उपलब्ध हैं, वहां तांत्रिकों और झाड़-फूंक के आधार पर जांच करना बेहद चिंताजनक माना जा रहा है।

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