आज की डिजिटल लाइफस्टाइल में मोबाइल, लैपटॉप और डेस्क जॉब का उपयोग तेजी से बढ़ा है। इसके साथ ही गर्दन दर्द की समस्या भी आम होती जा रही है। घंटों तक स्क्रीन पर झुके रहना, गलत पोस्चर में बैठना, पर्याप्त ब्रेक न लेना और शारीरिक गतिविधि की कमी के कारण बड़ी संख्या में लोग गर्दन दर्द से परेशान हैं। अक्सर लोग गर्दन में दर्द होते ही इसे सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस मान लेते हैं, जबकि हर गर्दन दर्द सर्वाइकल की वजह से नहीं होता। कई मामलों में दर्द केवल मांसपेशियों में तनाव, गलत बैठने की आदत या अस्थायी अकड़न के कारण भी हो सकता है। इसलिए सही जानकारी होना बेहद जरूरी है।
दिल्ली स्थित अपोलो स्पेक्ट्रा हॉस्पिटल के ऑर्थोपेडिक एंड स्पाइन विशेषज्ञ डॉ. अनिल रहेजा के अनुसार सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस रीढ़ की हड्डी के ऊपरी हिस्से में होने वाली उम्रजनित समस्या है। रीढ़ की गर्दन वाले हिस्से को सर्वाइकल स्पाइन कहा जाता है। यह हिस्सा सिर को संभालने, घुमाने, झुकाने और संतुलन बनाए रखने का काम करता है। सर्वाइकल क्षेत्र में सात वर्टिब्रे यानी हड्डियां होती हैं, जिनके बीच डिस्क और जोड़ मौजूद रहते हैं। उम्र बढ़ने, लगातार दबाव पड़ने या घिसाव होने के कारण जब इन हिस्सों में कमजोरी या क्षति होने लगती है, तब इसे सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस कहा जाता है।
सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस का सबसे आम लक्षण गर्दन में लगातार दर्द है। हालांकि यह दर्द सामान्य गर्दन दर्द से अलग हो सकता है। इसमें गर्दन में जकड़न महसूस होती है और गर्दन घुमाने या झुकाने में परेशानी हो सकती है। कई लोगों को सिरदर्द भी होता है, खासकर सिर के पीछे के हिस्से में। कुछ मामलों में दर्द गर्दन से कंधों, बाजुओं या हाथों तक फैल सकता है। यदि नसों पर दबाव बढ़ने लगे तो हाथों में झुनझुनी, सुन्नपन या कमजोरी भी महसूस हो सकती है। यही संकेत सामान्य मांसपेशीय दर्द और सर्वाइकल समस्या के बीच अंतर समझने में मदद करते हैं।
गर्दन दर्द के पीछे सबसे बड़ा कारण खराब पोस्चर माना जाता है। लंबे समय तक मोबाइल नीचे देखकर चलाना, लैपटॉप पर झुककर काम करना, गलत ऊंचाई वाली कुर्सी पर बैठना या गर्दन को एक ही स्थिति में घंटों रखना सर्वाइकल स्पाइन पर अतिरिक्त दबाव डालता है। धीरे-धीरे यह दबाव मांसपेशियों, डिस्क और जोड़ों पर असर डालता है। यही वजह है कि कम उम्र के लोगों में भी अब गर्दन दर्द और सर्वाइकल जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि राहत पाने का पहला और सबसे जरूरी कदम पोस्चर सुधारना है। मोबाइल या लैपटॉप की स्क्रीन आंखों के स्तर पर होनी चाहिए ताकि गर्दन झुकानी न पड़े। बैठते समय कमर सीधी, कंधे रिलैक्स और सिर रीढ़ की सीध में होना चाहिए। यदि आप लंबे समय तक डेस्क पर काम करते हैं तो हर 30 से 40 मिनट में उठकर थोड़ा चलना, स्ट्रेच करना और गर्दन की स्थिति बदलना जरूरी है। दिनभर में कई बार अपने वर्कस्टेशन और बैठने के तरीके को जांचना लाभकारी होता है।
सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस के प्रबंधन में फिजियोथेरेपी बेहद प्रभावी मानी जाती है। सही मार्गदर्शन में की गई एक्सरसाइज गर्दन की मांसपेशियों को मजबूत बनाती है, अकड़न कम करती है और लचीलापन बढ़ाती है। हल्के नेक रोटेशन से गर्दन की गतिशीलता सुधरती है। चिन टक एक्सरसाइज गर्दन और ऊपरी पीठ की स्थिति सुधारने में मदद करती है। शोल्डर रोल यानी कंधों को गोल घुमाने से आसपास की मांसपेशियों का तनाव कम होता है। इन अभ्यासों को जल्दबाजी या जोर लगाकर नहीं करना चाहिए। यदि दर्द अधिक हो तो पहले विशेषज्ञ की सलाह लेना उचित है।
जिन लोगों को दर्द ज्यादा होता है, उन्हें डॉक्टर कुछ दवाएं भी दे सकते हैं। सूजन कम करने वाली दवाएं और मांसपेशियों को आराम देने वाली दवाएं अस्थायी राहत देती हैं। कई बार जेल, स्प्रे या हीट पैच की सलाह भी दी जाती है। लेकिन केवल दवाओं पर निर्भर रहना समाधान नहीं है। यदि जीवनशैली, बैठने की आदत और मांसपेशियों की मजबूती पर ध्यान नहीं दिया गया, तो दर्द दोबारा लौट सकता है।
गर्म और ठंडी सिकाई भी गर्दन दर्द में काफी राहत देती है। गर्म सिकाई से मांसपेशियां रिलैक्स होती हैं, रक्त संचार बेहतर होता है और जकड़न कम होती है। वहीं ठंडी सिकाई सूजन और इंफ्लेमेशन कम करने में सहायक होती है। यदि हाल ही में दर्द शुरू हुआ है और सूजन महसूस हो रही है तो ठंडी सिकाई उपयोगी हो सकती है, जबकि पुरानी अकड़न और जकड़न में गर्म सिकाई अधिक आराम देती है। कई लोग दोनों का बारी-बारी से उपयोग करके लाभ पाते हैं।
लाइफस्टाइल में छोटे बदलाव लंबे समय तक फायदा दे सकते हैं। एक कंधे पर भारी बैग टांगने से बचना चाहिए क्योंकि इससे गर्दन और कंधों पर असमान दबाव पड़ता है। सोते समय बहुत ऊंचा या बहुत पतला तकिया गर्दन के लिए नुकसानदायक हो सकता है, इसलिए सपोर्टिव तकिया चुनना जरूरी है। गद्दा ऐसा होना चाहिए जो रीढ़ को संतुलित सहारा दे। नियमित वॉक, हल्की स्ट्रेंथ ट्रेनिंग, योग और वजन नियंत्रण भी सर्वाइकल समस्या के जोखिम को कम करते हैं।
गर्दन को अचानक झटके से घुमाना या तेज हरकतें करना नुकसान पहुंचा सकता है, खासकर तब जब पहले से दर्द हो। कई लोग दर्द होने पर खुद ही गर्दन चटकाने की कोशिश करते हैं, जो जोखिम भरा हो सकता है। इससे नसों, जोड़ या मांसपेशियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
कुछ मामलों में सामान्य उपायों से राहत नहीं मिलती। यदि लगातार दर्द बना रहे, हाथों में कमजोरी बढ़े, चलने में संतुलन बिगड़े या नसों पर दबाव के संकेत मिलें तो उन्नत उपचार की जरूरत पड़ सकती है। इसमें दर्द कम करने वाले इंजेक्शन, नर्व ब्लॉक प्रक्रिया या मिनिमली इनवेसिव ट्रीटमेंट शामिल हो सकते हैं। गंभीर स्थिति में सर्जरी भी विकल्प हो सकती है, खासकर जब नस दबने से न्यूरोलॉजिकल समस्या पैदा हो रही हो।
डॉक्टर से कब मिलना चाहिए, यह समझना भी जरूरी है। यदि गर्दन दर्द कुछ दिनों में ठीक नहीं हो रहा, लगातार बढ़ रहा है, रात में ज्यादा परेशान करता है, हाथों में सुन्नपन हो रहा है या कमजोरी महसूस हो रही है, तो तुरंत विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए। दर्द को लंबे समय तक नजरअंदाज करना भविष्य में बड़ी समस्या बन सकता है।
कुल मिलाकर गर्दन का हर दर्द सर्वाइकल स्पॉन्डिलाइटिस नहीं होता, लेकिन बार-बार होने वाला दर्द शरीर का चेतावनी संकेत जरूर हो सकता है। सही पोस्चर, नियमित एक्सरसाइज, समय पर ब्रेक, स्वस्थ जीवनशैली और जरूरत पड़ने पर विशेषज्ञ सलाह से इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। डिजिटल दौर में गर्दन की सेहत का ध्यान रखना अब पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है।


