पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान तथा अमेरिका के बीच जारी टकराव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को अस्थिर कर दिया है। इस स्थिति का सीधा असर भारत जैसे बड़े तेल आयातक देश पर भी देखने को मिल रहा है, जहां कच्चे तेल और एलपीजी की आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। हालात तब और जटिल हो गए, जब अमेरिका द्वारा भारत को दी गई 30 दिनों की प्रतिबंध छूट 11 अप्रैल 2026 को समाप्त हो गई। इस छूट के तहत भारत को ईरान से सीमित मात्रा में तेल खरीदने की अनुमति दी गई थी, लेकिन अब इसके खत्म होने के बाद भारत के सामने वैकल्पिक आपूर्ति स्रोत तलाशने की चुनौती खड़ी हो गई है।
इस बदलते परिदृश्य में भारत की ऊर्जा रणनीति को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार भारत अब ईरान के स्थान पर रूस से कच्चा तेल खरीदने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है। यह संकेत इस बात को दर्शाते हैं कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए किसी एक देश या नीति पर निर्भर रहने के बजाय व्यावहारिक और बहुस्तरीय रणनीति अपनाने के पक्ष में है।
मीडिया रिपोर्ट्स, विशेष रूप से मिंट के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, भारत की ऊर्जा आयात नीति पूरी तरह स्वतंत्र है और यह अमेरिकी प्रतिबंधों से प्रभावित होकर नहीं तय की जाती। रिपोर्ट में अज्ञात सरकारी सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि भारत अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए तेल और एलपीजी की खरीद के फैसले लेता है। ऐसे में अमेरिका द्वारा प्रतिबंध छूट समाप्त किए जाने के बावजूद भारत अपनी मौजूदा खरीद नीति में बड़े बदलाव के मूड में नहीं दिख रहा है।
इस संदर्भ में यह भी स्पष्ट किया गया है कि भारतीय रिफाइनरियां केवल उन कंपनियों और संस्थाओं से ही तेल खरीदेंगी, जो अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के दायरे में नहीं आतीं। इसका मतलब यह है कि भारत नियमों का पालन करते हुए अपने हितों की रक्षा करने की कोशिश कर रहा है। साथ ही यह भी संकेत मिलता है कि भारत किसी भी तरह की ऊर्जा कमी से बचने के लिए पहले से ही वैकल्पिक व्यवस्थाएं तैयार कर रहा है।
दूसरी ओर, रूस ने भी भारत को तेल आपूर्ति जारी रखने की अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है। रूसी समाचार एजेंसी तास के अनुसार, भारत में रूस के राजनयिक डेनिस अलिपोव ने कहा है कि रूस भारत की मांग के अनुसार पर्याप्त मात्रा में तेल उपलब्ध कराने के लिए तैयार है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वैश्विक परिस्थितियां चाहे जैसी भी हों, रूस भारत के साथ अपने ऊर्जा सहयोग को बनाए रखेगा। यह बयान भारत के लिए एक महत्वपूर्ण आश्वासन के रूप में देखा जा रहा है, खासकर ऐसे समय में जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं दबाव में हैं।
अमेरिका द्वारा प्रतिबंध छूट समाप्त किए जाने के साथ ही उसके वित्त विभाग ने भी कड़ा रुख अपनाने के संकेत दिए हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जारी बयान में यह कहा गया है कि ईरान की गतिविधियों का समर्थन करने वाले देशों के खिलाफ अतिरिक्त द्वितीयक प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं। हालांकि इस बयान में रूसी तेल को लेकर कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं की गई, जिससे यह संकेत मिलता है कि भारत के पास अभी भी कुछ हद तक रणनीतिक लचीलापन मौजूद है।
ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का यह रुख पूरी तरह व्यावहारिक है। देश की ऊर्जा जरूरतें बहुत बड़ी हैं और ऐसे में किसी एक स्रोत पर निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। रूस से सस्ते दामों पर तेल की उपलब्धता ने पहले भी भारत को राहत दी है और वर्तमान परिस्थितियों में यह विकल्प और भी महत्वपूर्ण हो गया है।
इसके साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में तेजी से हो रहे बदलावों के बीच भारत अपनी स्थिति को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है। चाहे वह विविध आपूर्ति स्रोतों की तलाश हो या दीर्घकालिक ऊर्जा समझौते, भारत हर स्तर पर अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के प्रयास कर रहा है।
कुल मिलाकर ईरान-अमेरिका तनाव और प्रतिबंधों के बीच भारत की ऊर्जा नीति संतुलित और व्यावहारिक नजर आ रही है। रूस के साथ बढ़ता सहयोग इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो न केवल तत्काल जरूरतों को पूरा करेगा, बल्कि भविष्य में ऊर्जा सुरक्षा को भी मजबूत करेगा। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक परिस्थितियों के बीच भारत अपनी ऊर्जा रणनीति को किस तरह और विकसित करता है।


