राजस्थान के जोधपुर शहर में तेजी से बढ़ती कबूतरों की संख्या अब केवल पर्यावरण या सफाई का मुद्दा नहीं रह गई है, बल्कि यह सीधे तौर पर लोगों की सेहत के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है। विशेषज्ञों और डॉक्टरों का कहना है कि कबूतरों के संपर्क में आने से श्वसन संबंधी बीमारियों के मामलों में तेजी से वृद्धि हो रही है, जो आने वाले समय में और बड़ी समस्या का रूप ले सकती है।
चिकित्सकों के अनुसार कबूतरों की बीट में मौजूद फंगस और सूक्ष्म कण सूखकर हवा में फैल जाते हैं। ये कण सांस के जरिए शरीर में प्रवेश कर फेफड़ों को प्रभावित करते हैं। इसके अलावा कबूतरों के पंखों से निकलने वाले महीन कण भी हवा में घुल जाते हैं, जो एलर्जी और सांस लेने में परेशानी पैदा करते हैं। यही कारण है कि हाल के महीनों में बिना कफ वाली सूखी खांसी के मरीजों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा रही है।
डॉक्टरों का कहना है कि यह सामान्य दिखने वाली खांसी धीरे-धीरे गंभीर रूप ले सकती है और हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस जैसी बीमारी में बदल जाती है। हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस एक ऐसी फेफड़ों की बीमारी है, जो लंबे समय तक एलर्जन के संपर्क में रहने से विकसित होती है। जोधपुर में प्रतिदिन इस बीमारी के 10 से 15 नए मामले सामने आ रहे हैं, जो इस खतरे की गंभीरता को दर्शाता है।
चिकित्सकीय आंकड़ों के अनुसार इस बीमारी के लगभग 80 से 90 प्रतिशत मामलों में कारण कबूतरों के संपर्क को ही माना जा रहा है। यह स्थिति इसलिए भी चिंताजनक है क्योंकि शुरुआती लक्षणों को लोग अक्सर सामान्य खांसी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन यदि समय रहते इलाज नहीं कराया जाए, तो यह बीमारी आगे चलकर क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिजीज यानी सीओपीडी जैसी गंभीर स्थिति का रूप ले सकती है, जो जानलेवा भी साबित हो सकती है।
शहर में सामने आए कुछ मामलों ने इस खतरे को और स्पष्ट कर दिया है। एक स्कूल शिक्षिका, जो नियमित रूप से कबूतरों की बीट साफ करती थी, लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने के कारण इस बीमारी की शिकार हो गई। इसी तरह एक अपार्टमेंट में रहने वाले परिवार के सभी सदस्य भी इस समस्या से प्रभावित हुए। इलाज के बावजूद जब स्थिति में सुधार नहीं हुआ, तो जांच के दौरान उनके घर के आसपास कबूतरों की अधिक आवाजाही का पता चला। डॉक्टरों की सलाह पर जब उन्होंने कबूतरों से दूरी बनाई और घर में सुरक्षा उपाय अपनाए, तब जाकर उनकी स्थिति में सुधार हुआ।
विशेषज्ञ बताते हैं कि कबूतरों की बीट सूखकर पाउडर का रूप ले लेती है, जो बहुत हल्की होने के कारण हवा में आसानी से फैल जाती है। यह पाउडर जब फेफड़ों में पहुंचता है, तो वहां एलर्जी, संक्रमण और फाइब्रोसिस जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से व्यक्ति को सांस फूलना, सीने में जकड़न और लगातार खांसी जैसी परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार इस बीमारी के मामलों में लगातार वृद्धि हो रही है और हर महीने सैकड़ों मरीज सामने आ रहे हैं। इस स्थिति को देखते हुए लोगों को सतर्क रहने की आवश्यकता है। खासतौर पर वे लोग जो पहले से ही अस्थमा या अन्य श्वसन संबंधी बीमारियों से जूझ रहे हैं, उन्हें अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए।
डॉ. सी.आर. चौधरी, जो पल्मोनोलॉजिस्ट और कमला नेहरू वक्ष चिकित्सालय के अधीक्षक हैं, का कहना है कि उनके यहां आने वाले मरीजों में इंटरस्टिशियल लंग डिजीज के मामलों में हाइपरसेंसिटिविटी न्यूमोनाइटिस सबसे सामान्य कारण बनकर उभर रहा है। मरीजों की हिस्ट्री लेने पर अक्सर यह सामने आता है कि वे कबूतरों के संपर्क में रहे हैं या उनके घरों के आसपास इनकी संख्या अधिक है।
उन्होंने यह भी सलाह दी कि घरों की बालकनी, छत और खिड़कियों पर कबूतरों को बैठने से रोकने के लिए उचित उपाय किए जाएं। नियमित सफाई रखना, कबूतरों की बीट को सीधे संपर्क में आने से बचना और जरूरत पड़ने पर मास्क का उपयोग करना बेहद जरूरी है।


