पश्चिमी राजस्थान में जल संकट को स्थायी रूप से दूर करने की दिशा में एक नई और महत्वाकांक्षी पहल आकार लेती दिखाई दे रही है। उत्तरी भारत की नदियों के अतिरिक्त जल को पश्चिमी राजस्थान तक पहुंचाने की मांग अब तेजी से जोर पकड़ रही है। इस प्रस्ताव के तहत घग्गर, यमुना, सतलुज, रावी और अन्य नदियों के पानी को डायवर्ट कर जोधपुर सहित राज्य के कई जिलों तक लाने की योजना पर गंभीर मंथन चल रहा है। यह परियोजना यदि साकार होती है, तो क्षेत्र में पेयजल और कृषि दोनों क्षेत्रों में व्यापक बदलाव देखने को मिल सकता है।
हाल ही में मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा के ओसियां दौरे के दौरान इस मुद्दे पर एक बार फिर चर्चा तेज हुई। जनप्रतिनिधियों और स्थानीय नेताओं ने इस योजना को लेकर सरकार के सामने अपनी मांगों को मजबूती से रखा। इसके बाद जल संसाधन विभाग में इस प्रस्ताव को लेकर उच्च स्तर पर विचार-विमर्श शुरू हो गया है। फिलहाल विभाग डीपीआर यानी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार कराने की संभावनाओं पर काम कर रहा है, ताकि इस महत्वाकांक्षी योजना की व्यवहार्यता को तकनीकी रूप से परखा जा सके।
इस प्रस्ताव का दायरा काफी व्यापक है। इसमें केवल उत्तरी भारत की नदियों के जल को लाने की बात ही नहीं है, बल्कि राज्य के भीतर भी नदियों को आपस में जोड़ने की योजना शामिल है। माही नदी को लूणी नदी से जोड़ने और नर्मदा नहर परियोजना का विस्तार करते हुए इसे पश्चिमी जिलों तक पहुंचाने जैसे सुझाव भी सामने आए हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य यह है कि पश्चिमी राजस्थान के शुष्क इलाकों को स्थायी जल स्रोत उपलब्ध कराया जा सके।
इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक स्तर पर भी व्यापक समर्थन देखने को मिल रहा है। 60 से अधिक विधायकों ने इस योजना के समर्थन में हस्ताक्षर कर सरकार को पत्र सौंपे हैं, जिससे यह स्पष्ट होता है कि यह केवल एक क्षेत्रीय मांग नहीं, बल्कि व्यापक जनहित से जुड़ा विषय बन चुका है। जनप्रतिनिधियों का मानना है कि जिस तरह पूर्वी राजस्थान के लिए ईआरसीपी जैसी बड़ी परियोजना पर काम शुरू हुआ है, उसी तरह पश्चिमी राजस्थान को भी समान प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
गौरतलब है कि पश्चिमी राजस्थान के लिए पहले से ही एक डब्ल्यूआरसीपी परियोजना पर काम शुरू हो चुका है, जिसके तहत गुजरात के माध्यम से पानी लाने की योजना बनाई गई है। इस परियोजना की प्री-फिजिबिलिटी रिपोर्ट भी तैयार की जा चुकी है, हालांकि जल संसाधन विभाग ने इस पर कुछ आपत्तियां जताई हैं। इसके चलते डीपीआर पर काम फिलहाल धीमी गति से चल रहा है। संभावना जताई जा रही है कि इस परियोजना के अगले चरण को भी पुनः प्री-फिजिबिलिटी स्तर पर ले जाया जा सकता है, ताकि तकनीकी पहलुओं को और स्पष्ट किया जा सके।
प्रस्तावित योजना को चरणबद्ध तरीके से लागू करने की रूपरेखा भी सामने आई है। पहले चरण में घग्गर नहर परियोजना के जरिए वर्षा जल को हनुमानगढ़ जिले से कच्ची नहरों के माध्यम से जोधपुर तक लाने की योजना बनाई गई है, जहां इसे जोजरी नदी से जोड़ा जा सकता है। इसके बाद दूसरे चरण में यमुना नहर परियोजना के माध्यम से हरियाणा क्षेत्र से वर्षा जल को सोनीपत के पास कच्ची नहर बनाकर जोजरी नदी में मिलाने का प्रस्ताव है। इस तरह से पश्चिमी राजस्थान के जिलों में नहरी पानी की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है, जिससे खेती-किसानी को नया जीवन मिल सकेगा।
इसके अलावा माही नदी को लूणी नदी से जोड़ने के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार करने हेतु पर्याप्त बजट की मांग भी उठाई गई है। साथ ही नर्मदा नहर परियोजना के विस्तार के माध्यम से बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर और आसपास के जिलों तक पानी पहुंचाने की योजना भी विचाराधीन है। यह सभी प्रस्ताव मिलकर एक व्यापक जल प्रबंधन प्रणाली का हिस्सा बन सकते हैं।
इस योजना के तकनीकी और वैज्ञानिक पहलुओं को मजबूत करने के लिए जोधपुर और बीकानेर के कृषि विश्वविद्यालयों के साथ-साथ जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय के भूगोल और भूगर्भ विभागों को भी शामिल करने का सुझाव दिया गया है। इससे परियोजना की व्यवहार्यता और प्रभावशीलता का बेहतर आकलन किया जा सकेगा।
यदि यह योजना सफल होती है, तो इसका सीधा लाभ जोधपुर, फलोदी, बाड़मेर, जैसलमेर, बालोतरा, जालोर, सिरोही, पाली, नागौर, बीकानेर, श्रीगंगानगर और हनुमानगढ़ जैसे जिलों को मिल सकता है। इन क्षेत्रों में जल की उपलब्धता बढ़ने से न केवल पेयजल संकट दूर होगा, बल्कि कृषि उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है।
इस पूरे मुद्दे पर ओसियां विधायक भैराराम सियोल ने भी अपनी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने बताया कि इस योजना को लेकर प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्रियों तक अपनी मांग रखी जा चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि इस प्रस्ताव के तकनीकी पहलुओं को भी सरकार के समक्ष प्रस्तुत किया गया है, ताकि इसे जल्द से जल्द अमल में लाया जा सके।
वहीं, जल संसाधन विभाग के मुख्य अभियंता अरुण कुमार सिडाना ने कहा कि इस प्रस्ताव पर उच्च स्तर पर मंथन जारी है। चूंकि यह योजना एक से अधिक राज्यों से जुड़ी हुई है, इसलिए अंतिम निर्णय भी व्यापक स्तर पर लिया जाएगा। उन्होंने संकेत दिए कि यदि सभी पहलुओं पर सहमति बनती है, तो आने वाले समय में इस दिशा में ठोस कदम उठाए जा सकते हैं।


