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महंगे ईंधन से एयरलाइंस संकट में, उड़ानों पर असर संभव

महंगे ईंधन से एयरलाइंस संकट में, उड़ानों पर असर संभव

मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और युद्ध जैसी परिस्थितियों का असर अब भारत के एविएशन सेक्टर पर भी साफ दिखाई देने लगा है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण एविएशन टर्बाइन फ्यूल यानी ATF महंगा हो गया है, जिससे देश की प्रमुख एयरलाइन कंपनियों की परिचालन लागत तेजी से बढ़ी है। Federation of Indian Airlines ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द राहत नहीं मिली तो कई एयरलाइंस को उड़ानें कम करनी पड़ सकती हैं और कुछ विमानों को अस्थायी रूप से खड़ा करने की नौबत भी आ सकती है।

इस संगठन में Air India, IndiGo और SpiceJet जैसी बड़ी एयरलाइंस शामिल हैं। फेडरेशन ने नागरिक उड्डयन मंत्रालय को भेजी रिपोर्ट में कहा है कि ईंधन महंगा होने से एयरलाइंस की ऑपरेशन कॉस्ट करीब 20 प्रतिशत तक बढ़ गई है। विमानन उद्योग पहले ही लागत दबाव, प्रतिस्पर्धा और किराया नियंत्रण जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, ऐसे में ATF की कीमतों में तेज उछाल ने स्थिति और कठिन बना दी है।

एविएशन टर्बाइन फ्यूल एयरलाइन कंपनियों के कुल खर्च का सबसे बड़ा हिस्सा होता है। पहले यह खर्च कुल परिचालन लागत का लगभग 40 प्रतिशत माना जाता था, लेकिन अब यह बढ़कर 60 प्रतिशत तक पहुंचने की बात कही जा रही है। इसका सीधा मतलब है कि एयरलाइन कंपनियों की कमाई का बड़ा हिस्सा अब केवल ईंधन खरीदने में जा रहा है। ऐसे में लाभ कमाना तो दूर, सामान्य संचालन बनाए रखना भी मुश्किल होता जा रहा है।

रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है। फरवरी के अंत से अब तक तेल की कीमतों में लगभग 45 प्रतिशत से अधिक वृद्धि दर्ज की गई है। इसी के साथ ATF के दाम भी तेजी से बढ़े हैं। वैश्विक बाजार में एविएशन फ्यूल की कीमतें पहले जहां लगभग 87 डॉलर प्रति बैरल थीं, वहीं अब 235 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंचने की बात कही जा रही है।

भारतीय एयरलाइंस के लिए समस्या केवल वैश्विक कीमतें नहीं हैं, बल्कि टैक्स संरचना भी बड़ी चुनौती बनी हुई है। एयरलाइंस कंपनियों का कहना है कि ATF पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी और राज्यों द्वारा वसूला जाने वाला वैट उनकी लागत को और बढ़ा रहा है। इसी कारण फेडरेशन ने केंद्र सरकार से 11 प्रतिशत एक्साइज ड्यूटी को अस्थायी रूप से हटाने और प्रमुख राज्यों में वैट कम करने की मांग की है। उनका कहना है कि यदि टैक्स राहत नहीं मिली तो उद्योग को गंभीर वित्तीय संकट का सामना करना पड़ सकता है।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए फ्यूल कीमतों में बड़ा अंतर एयरलाइंस के नेटवर्क प्लानिंग को प्रभावित कर रहा है। घरेलू सेक्टर के लिए कुछ हद तक कीमत नियंत्रण होने के बावजूद अंतरराष्ट्रीय ऑपरेशंस पर लागत बहुत तेजी से बढ़ी है। इससे विदेशी मार्गों पर उड़ान चलाना कई कंपनियों के लिए महंगा सौदा बनता जा रहा है।

डेटा के अनुसार घरेलू ATF की कीमतों में बढ़ोतरी को सीमित रखने की कोशिश की गई, लेकिन अंतरराष्ट्रीय उड़ानों के लिए ईंधन दरों में प्रति लीटर लगभग 73 रुपये तक की वृद्धि दर्ज की गई। इसका असर सीधे तौर पर उन एयरलाइंस पर पड़ता है जो बड़ी संख्या में विदेशों के लिए उड़ानें संचालित करती हैं। लंबे रूट्स पर ईंधन खर्च अधिक होने के कारण उनकी वित्तीय स्थिति ज्यादा प्रभावित हो सकती है।

यदि स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है तो इसका असर यात्रियों पर भी पड़ना तय माना जा रहा है। एयरलाइंस कंपनियां या तो उड़ानों की संख्या कम कर सकती हैं, कम लाभ वाले रूट बंद कर सकती हैं या टिकट किराए बढ़ा सकती हैं। छोटे शहरों की कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय उड़ान सेवाएं भी प्रभावित हो सकती हैं। इससे यात्रियों को कम विकल्प, महंगे टिकट और सीमित सीट उपलब्धता जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

हालात की गंभीरता को देखते हुए नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने कुछ राहत कदम उठाए हैं। जानकारी के अनुसार अप्रैल 2026 से तीन महीने के लिए घरेलू एयरलाइंस के लैंडिंग और पार्किंग शुल्क में 25 प्रतिशत तक कटौती की गई है। यह कदम एयरलाइंस के परिचालन खर्च को कुछ हद तक कम करने के उद्देश्य से उठाया गया है।

इसके अलावा केंद्र सरकार एयरलाइन उद्योग के लिए लगभग 5,000 करोड़ रुपये की इमरजेंसी क्रेडिट स्कीम पर भी विचार कर रही है। यदि यह योजना लागू होती है तो एयरलाइंस कंपनियों को कार्यशील पूंजी और नकदी प्रवाह से जुड़ी दिक्कतों में राहत मिल सकती है। महामारी के बाद उद्योग धीरे-धीरे संभल रहा था, लेकिन अब ईंधन संकट ने नई चुनौती खड़ी कर दी है।

रेटिंग एजेंसी ICRA ने भी संकेत दिया है कि यदि कच्चे तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो आने वाले समय में ATF और महंगा हो सकता है। इसका मतलब है कि संकट अल्पकालिक नहीं भी हो सकता। ऐसे में एयरलाइंस कंपनियों को किराया नीति, रूट रणनीति और लागत प्रबंधन पर नए सिरे से काम करना होगा।

भारतीय एविएशन सेक्टर देश की अर्थव्यवस्था, पर्यटन, व्यापार और रोजगार के लिए महत्वपूर्ण है। इसलिए उद्योग की स्थिरता जरूरी है। सरकार, एयरलाइंस और ईंधन कंपनियों के बीच समन्वय से यदि जल्द समाधान निकलता है, तो यात्रियों और कंपनियों दोनों को राहत मिल सकती है। फिलहाल पूरे सेक्टर की नजर तेल कीमतों और सरकारी फैसलों पर टिकी हुई है।

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