जयपुर के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल सवाई मानसिंह (एसएमएस) अस्पताल में एक बार फिर वीआईपी संस्कृति और प्रशासनिक नियमों की अनदेखी को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। इस बार मामला निविक हॉस्पिटल जयपुर से जुड़े डॉक्टर सोमदेव बंसल का है, जिन्हें गिरफ्तारी के बाद अचानक तबीयत खराब होने की शिकायत पर एसएमएस अस्पताल लाया गया और कथित तौर पर विशेष सुविधा देते हुए भर्ती कर लिया गया। इस पूरे घटनाक्रम ने अस्पताल की कार्यप्रणाली, मेडिकल प्रोटोकॉल और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
जानकारी के अनुसार, डॉक्टर सोमदेव बंसल को गिरफ्तारी के कुछ ही घंटों बाद स्वास्थ्य समस्या बताकर एसएमएस अस्पताल के इमरजेंसी विभाग में लाया गया था। आमतौर पर ऐसे मामलों में जब कोई आरोपी पुलिस हिरासत में होता है और स्वास्थ्य जांच के लिए अस्पताल लाया जाता है, तब स्पष्ट चिकित्सकीय प्रक्रिया अपनाई जाती है। मरीज की प्राथमिक जांच, चिकित्सकीय स्थिति का मूल्यांकन, कानूनी औपचारिकताएं और संबंधित विशेषज्ञों की राय के बाद ही भर्ती या अन्य निर्णय लिए जाते हैं। लेकिन इस मामले में आरोप है कि तय प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।
बताया जा रहा है कि डॉक्टर बंसल को सीधे जनरल मेडिसिन विभाग की यूनिट 9 में भर्ती कर लिया गया। सबसे गंभीर सवाल यह उठ रहा है कि भर्ती से संबंधित दस्तावेजों पर न तो किसी रेजिडेंट डॉक्टर के हस्ताक्षर थे और न ही किसी वरिष्ठ चिकित्सक की औपचारिक सलाह दर्ज थी। यदि यह तथ्य सही हैं, तो यह अस्पताल की मानक प्रक्रिया से बड़ा विचलन माना जा सकता है।
मेडिको-लीगल मामलों में अस्पताल प्रशासन को विशेष सावधानी बरतनी होती है, क्योंकि ऐसे मामलों में हर मेडिकल निर्णय का कानूनी महत्व होता है। आरोपी व्यक्ति की स्वास्थ्य स्थिति, चोट, बीमारी या अन्य शिकायतों का रिकॉर्ड बेहद व्यवस्थित तरीके से रखा जाता है ताकि बाद में किसी प्रकार का विवाद न हो। ऐसे में बिना आवश्यक हस्ताक्षर और वरिष्ठ चिकित्सकीय राय के भर्ती किया जाना प्रशासनिक गंभीरता पर सवाल खड़ा करता है।
सूत्रों के मुताबिक, जब मेडिसिन विभाग के विभागाध्यक्ष को इस भर्ती प्रक्रिया की जानकारी मिली, तो उन्होंने इस पर नाराजगी जताई। विभागाध्यक्ष की आपत्ति के बाद अस्पताल प्रशासन में हलचल मच गई। मामला बढ़ता देख तत्काल स्थिति संभालने के प्रयास शुरू हुए और डॉक्टर बंसल की जांच के लिए एक मेडिकल बोर्ड गठित कर दिया गया।
इस मेडिकल बोर्ड में कार्डियोलॉजी, न्यूरोलॉजी, जनरल मेडिसिन और फोरेंसिक मेडिसिन विभाग के विशेषज्ञ शामिल किए गए हैं। बोर्ड का उद्देश्य यह तय करना बताया जा रहा है कि मरीज की वास्तविक चिकित्सकीय स्थिति क्या है, भर्ती आवश्यक थी या नहीं, और आगे किस प्रकार का उपचार होना चाहिए। साथ ही यह भी माना जा रहा है कि बोर्ड के गठन से प्रशासन इस विवाद को संस्थागत प्रक्रिया के माध्यम से नियंत्रित करना चाहता है।
हालांकि सवाल यह भी उठ रहा है कि यदि शुरुआत में ही नियमों के अनुसार प्रक्रिया अपनाई जाती, तो बाद में मेडिकल बोर्ड बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ती। आलोचकों का कहना है कि विवाद सामने आने के बाद की गई कार्रवाई डैमेज कंट्रोल जैसी लगती है। यदि अस्पताल प्रबंधन शुरुआत से पारदर्शी और नियमसम्मत तरीके से काम करता, तो ऐसी स्थिति शायद नहीं बनती।
एसएमएस अस्पताल प्रदेश का सबसे बड़ा सरकारी चिकित्सा संस्थान है, जहां हर दिन हजारों मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। आम मरीजों को बेड, जांच, भर्ती और डॉक्टर से परामर्श के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में यदि किसी प्रभावशाली व्यक्ति या चर्चित आरोपी को नियमों से अलग विशेष सुविधा मिलने की धारणा बनती है, तो इससे आम जनता का भरोसा प्रभावित होता है।
सरकारी अस्पतालों में समानता का सिद्धांत सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां मरीज की पहचान, सामाजिक स्थिति या प्रभाव के आधार पर नहीं, बल्कि चिकित्सकीय आवश्यकता के आधार पर उपचार होना चाहिए। इसलिए जब भी वीआईपी ट्रीटमेंट जैसे आरोप सामने आते हैं, तो वे सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित मामला नहीं रहते, बल्कि पूरे सिस्टम की निष्पक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं।
इस मामले में अस्पताल अधीक्षक डॉ. मृणाल जोशी की ओर से अब तक कोई विस्तृत सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। प्रशासन की चुप्पी भी चर्चा का विषय बनी हुई है। स्वास्थ्य जगत के जानकार मानते हैं कि ऐसे मामलों में समय पर स्पष्ट बयान और तथ्यों की जानकारी देना जरूरी होता है, ताकि अफवाहों और भ्रम की स्थिति न बने।
अब सभी की नजर मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट पर है। यदि बोर्ड यह पाता है कि मरीज की हालत गंभीर थी और तत्काल भर्ती जरूरी थी, तो प्रशासन को राहत मिल सकती है। लेकिन यदि प्रक्रिया में अनियमितता या विशेष सुविधा दिए जाने की पुष्टि होती है, तो जिम्मेदार अधिकारियों पर सवाल और गहरे हो सकते हैं।
यह मामला केवल एक भर्ती तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी अस्पतालों में पारदर्शिता, जवाबदेही और नियमों के पालन की व्यापक बहस को फिर से सामने लाता है। जयपुर के एसएमएस अस्पताल जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से अपेक्षा की जाती है कि वहां हर निर्णय चिकित्सा मानकों और प्रशासनिक नियमों के अनुरूप हो।


