मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क से निकला चीता अब राजस्थान के प्रसिद्ध रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान तक पहुंच गया है, जिससे वन विभाग और वन्यजीव विशेषज्ञों की चिंता बढ़ गई है। चीता, जिसे KP-2 के नाम से चिन्हित किया गया है, हाल ही में रणथंभौर के जोन नंबर 9 में देखा गया, जहां पहले से ही बाघिन T-127 tigress का मूवमेंट बना हुआ है। ऐसे में दोनों वन्यजीवों के आमने-सामने आने की संभावना को लेकर सतर्कता बढ़ा दी गई है।
इस पूरे घटनाक्रम की पुष्टि रणथंभौर के डीएफओ मानस सिंह ने की है। उन्होंने बताया कि यह चीता 14 फरवरी को राजस्थान की सीमा में प्रवेश कर चुका था और कूनो से निकलकर चंबल नदी पार करते हुए रणथंभौर क्षेत्र में पहुंचा। तब से ही मध्यप्रदेश और राजस्थान के वन विभाग की टीमें इसके मूवमेंट पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। पिछले कुछ दिनों से यह चीता रणथंभौर के अलग-अलग हिस्सों में सक्रिय रूप से घूमता हुआ देखा गया है, जिससे इसकी मौजूदगी की पुष्टि होती रही है।
वन विभाग की टीमें चीते की गतिविधियों पर चौबीसों घंटे निगरानी रख रही हैं। आधुनिक ट्रैकिंग तकनीकों और जमीनी टीमों की मदद से इसके हर मूवमेंट को रिकॉर्ड किया जा रहा है, ताकि किसी भी संभावित खतरे से पहले ही निपटा जा सके। डीएफओ मानस सिंह के अनुसार, फिलहाल चीता और बाघिन के बीच किसी प्रकार का सीधा टकराव सामने नहीं आया है, लेकिन जिस क्षेत्र में चीता देखा गया है, वह बाघिन T-127 का सक्रिय इलाका माना जाता है।
वन्यजीव विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्य परिस्थितियों में चीता बेहद सतर्क और तेज़ प्रतिक्रिया देने वाला जानवर होता है। वह बाघ या बाघिन जैसे बड़े शिकारी को देखते ही दूरी बनाने की कोशिश करता है। लेकिन यदि किसी कारणवश दोनों आमने-सामने आ जाते हैं, तो स्थिति गंभीर हो सकती है। चीता अपेक्षाकृत कमजोर होता है और बाघ या तेंदुए जैसे शिकारी उसके लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं।
कुछ दिन पहले रणथंभौर के पालीघाट रेंज के पास अजीतपुरा गांव के आसपास भी चीते की मौजूदगी देखी गई थी। स्थानीय ग्रामीणों ने इसकी सूचना तुरंत वन विभाग को दी, जिसके बाद विभाग की टीम और अधिक सतर्क हो गई। ग्रामीण इलाकों के नजदीक इस तरह के वन्यजीवों का आना न केवल जानवरों के लिए, बल्कि लोगों के लिए भी जोखिम पैदा कर सकता है, इसलिए विभाग लगातार स्थिति पर नजर बनाए हुए है।
वन्यजीव विशेषज्ञ धर्मेंद्र खांडल का कहना है कि रणथंभौर का जोन नंबर 9 वन्यजीवों की दृष्टि से काफी संवेदनशील क्षेत्र है। यहां बाघिन T-127 के अलावा बाघ T-108 और कई तेंदुओं की भी सक्रिय मौजूदगी रहती है। ऐसे में यह इलाका चीते के लिए सुरक्षित नहीं माना जाता। यदि चीता इन शिकारी जानवरों के संपर्क में आता है, तो उसके जीवित रहने की संभावना कम हो सकती है।
इसी कारण वन विभाग की टीमें लगातार सतर्क हैं और चीते को सुरक्षित क्षेत्र की ओर मोड़ने या उसकी निगरानी बढ़ाने के प्रयास कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह घटना वन्यजीव संरक्षण के दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दिखाती है कि बड़े जानवर अपने प्राकृतिक आवास से बाहर निकलकर नए क्षेत्रों में पहुंच रहे हैं।
कुल मिलाकर, कूनो से रणथंभौर तक पहुंचे इस चीते की गतिविधियां वन विभाग के लिए एक चुनौती बन गई हैं। एक ओर जहां इसे सुरक्षित रखना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर अन्य वन्यजीवों और स्थानीय आबादी की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वन विभाग इस स्थिति को कैसे संभालता है और क्या चीता किसी सुरक्षित क्षेत्र में वापस लौट पाता है या नहीं।


