latest-newsजयपुरराजस्थान

FSL DNA किट मामले में चार अफसरों पर एक्शन तय

FSL DNA किट मामले में चार अफसरों पर एक्शन तय

राजस्थान के चर्चित FSL DNA किट मामले में राज्य सरकार ने बड़ा प्रशासनिक कदम उठाया है। इस मामले में चार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई को मंजूरी दे दी गई है। गृह विभाग ने आरोपित अधिकारियों पर विधिक और विभागीय कार्रवाई के लिए स्वीकृति आदेश जारी कर दिए हैं। इसके बाद संबंधित अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ना तय माना जा रहा है। यह मामला सरकारी खरीद प्रक्रिया, वित्तीय अनियमितता और पद के दुरुपयोग से जुड़ा बताया जा रहा है, जिस पर अब जांच एजेंसियां सक्रिय हो गई हैं।

सरकार की ओर से जिन अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की स्वीकृति दी गई है, उनमें FSL निदेशक डॉ. अजय शर्मा, सिरोलॉजी डीएनए विभाग के सहायक निदेशक डॉ. आनंद कुमार, सहायक निदेशक डॉ. भावना पूनिया और सिरोलॉजी सेक्शन के सीनियर साइंटिफिक ऑफिसर डॉ. रामकिशन कुमावत शामिल हैं। इन सभी पर आरोप है कि डीएनए जांच किट खरीद प्रक्रिया में गंभीर अनियमितताएं हुईं और सरकारी धन को नुकसान पहुंचाया गया।

गृह विभाग ने इन अधिकारियों के खिलाफ 17(ए) के तहत कार्रवाई की अनुमति दी है। यह प्रावधान आमतौर पर सरकारी पद के दुरुपयोग, भ्रष्टाचार या निर्णय प्रक्रिया में अनियमितता से जुड़े मामलों में लागू किया जाता है। इस स्वीकृति के बाद अब जांच एजेंसियां आगे की कानूनी प्रक्रिया तेजी से आगे बढ़ा सकेंगी।

इससे पहले 13 अप्रैल को इन चारों अधिकारियों को एपीओ कर दिया गया था। प्रशासनिक दृष्टि से यह बड़ा कदम माना गया, क्योंकि किसी गंभीर आरोप या जांच की स्थिति में अधिकारियों को पदस्थापना आदेश की प्रतीक्षा में रखा जाता है। इसके बाद कार्मिक विभाग ने भी एसीबी जांच की मंजूरी दे दी थी। अब गृह विभाग की स्वीकृति मिलने के बाद भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की जांच और अधिक तेज होने की संभावना है।

सूत्रों के अनुसार इस मामले में गृहराज्य मंत्री जवाहर सिंह बेढम की स्वीकृति के बाद आगे की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है। इससे संकेत मिलता है कि सरकार इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जवाबदेही तय करने के पक्ष में है।

यह पूरा मामला करीब 8.71 करोड़ रुपये के कथित घोटाले से जुड़ा बताया जा रहा है। जांच में सामने आया कि राजस्थान में डीएनए जांच किट अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक कीमत पर खरीदे गए। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार कुछ किटों की खरीद कीमत अन्य राज्यों की तुलना में 11 गुना तक ज्यादा बताई गई है। यदि यह तथ्य जांच में सही साबित होते हैं, तो यह सरकारी खरीद प्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।

सबसे गंभीर पहलू यह बताया जा रहा है कि कंपनी और उत्पाद समान होने के बावजूद ऊंची दरों पर खरीद जारी रही। यानी जिन वस्तुओं को दूसरे राज्यों में कम दर पर खरीदा गया, वही सामान राजस्थान में काफी अधिक कीमत पर खरीदा गया। इतना ही नहीं, इस संबंध में शिकायतें मिलने के बाद भी खरीद प्रक्रिया नहीं रोकी गई। यही कारण है कि अब पूरे मामले को वित्तीय अनियमितता और संभावित भ्रष्टाचार के नजरिए से देखा जा रहा है।

जानकारी के अनुसार यह मामला पहली बार 22 मई 2024 को एक ई-फाइल के माध्यम से राज्य सरकार के संज्ञान में आया था। उस समय डॉ. रमेश चौधरी को स्टोर प्रभारी बनाया गया था। जब स्टोर रिकॉर्ड और खरीद दस्तावेजों की समीक्षा की गई, तब अप्रैल-मई 2023-24 के दौरान हुई खरीद में कई विसंगतियां सामने आईं। रिकॉर्ड में पाया गया कि एक ही प्रकार की डीएनए जांच किट अन्य राज्यों की तुलना में काफी अधिक दरों पर खरीदी गई थीं।

एफएसएल यानी फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी कानून व्यवस्था और अपराध जांच व्यवस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। यहां डीएनए परीक्षण, जैविक नमूनों की जांच, अपराध स्थल से मिले साक्ष्यों का विश्लेषण और वैज्ञानिक रिपोर्ट तैयार की जाती है। ऐसे संस्थान में उपयोग होने वाली सामग्री की खरीद प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी और तकनीकी मानकों के अनुरूप होनी चाहिए। इसलिए इस तरह की अनियमितताओं के आरोप को बेहद गंभीर माना जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं तो इससे न केवल सरकारी खजाने को नुकसान हुआ होगा, बल्कि संस्थागत विश्वसनीयता पर भी असर पड़ा होगा। फॉरेंसिक संस्थाओं पर न्याय व्यवस्था निर्भर करती है, इसलिए वहां होने वाली किसी भी वित्तीय गड़बड़ी को सामान्य प्रशासनिक मामला नहीं माना जा सकता।

अब एसीबी जांच के दौरान खरीद प्रक्रिया, टेंडर शर्तों, स्वीकृति नोटशीट, भुगतान आदेश, बाजार दरों और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की गहन जांच की जाएगी। यह भी देखा जाएगा कि निर्णय किस स्तर पर लिए गए, किसने अनुमोदन दिया और शिकायतों के बावजूद कार्रवाई क्यों नहीं हुई। जांच एजेंसी दस्तावेजों के साथ-साथ जिम्मेदार अधिकारियों के बयान भी दर्ज कर सकती है।

राज्य सरकार की इस कार्रवाई को प्रशासनिक सख्ती के रूप में देखा जा रहा है। हाल के समय में सरकारी विभागों में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। ऐसे में बड़े वित्तीय मामलों में त्वरित कार्रवाई का संदेश भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

फिलहाल चारों अधिकारियों पर आरोप साबित होना अभी बाकी है और अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही सामने आएगा। लेकिन कार्रवाई की स्वीकृति, एपीओ आदेश और एसीबी जांच मंजूरी जैसे कदमों से साफ है कि सरकार मामले को गंभीरता से ले रही है। आने वाले समय में जांच रिपोर्ट और कानूनी प्रक्रिया इस मामले की दिशा तय करेगी।

post bottom ad

Discover more from MTTV INDIA

Subscribe now to keep reading and get access to the full archive.

Continue reading