राजस्थान के बाड़मेर चल रहे गिरल लिग्नाइट माइंस मजदूर आंदोलन ने अब राजनीतिक रंग लेना शुरू कर दिया है। मजदूरों की मांगों को लेकर पिछले 38 दिनों से जारी धरने के बीच शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी के समर्थन में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत तथा नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली खुलकर सामने आ गए हैं। दोनों नेताओं ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए राज्य की भाजपा सरकार पर गंभीर सवाल उठाए और मजदूरों की मांगों पर तत्काल समाधान निकालने की मांग की है।
बाड़मेर की गिरल लिग्नाइट माइंस के बाहर पिछले कई दिनों से स्थानीय मजदूर और युवा रोजगार, कार्य परिस्थितियों और पुराने वादों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। आंदोलन की शुरुआत 9 अप्रैल से हुई थी और धीरे-धीरे यह क्षेत्र का बड़ा जनआंदोलन बन गया। स्थानीय लोगों का आरोप है कि राजस्थान स्टेट माइंस एंड मिनरल्स लिमिटेड ने जमीन अधिग्रहण के समय रोजगार देने का आश्वासन दिया था, लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी बड़ी संख्या में स्थानीय युवाओं को रोजगार नहीं मिला। इतना ही नहीं, कई ऐसे लोग भी हैं जिन्हें पहले काम दिया गया और बाद में हटा दिया गया। इसी नाराजगी के कारण मजदूर लंबे समय से धरने पर बैठे हैं।
इस आंदोलन को शिव विधायक रविंद्र सिंह भाटी का खुला समर्थन मिला हुआ है। भाटी पिछले करीब 15 दिनों से मजदूरों के साथ धरना स्थल पर मौजूद रहे और लगातार सरकार व प्रशासन से बातचीत की मांग करते रहे। आंदोलन के दौरान उन्होंने चेतावनी भी दी थी कि यदि मजदूरों की मांगों को गंभीरता से नहीं लिया गया तो आंदोलन और तेज किया जाएगा। मंगलवार को इसी मुद्दे को लेकर बड़ी जनसभा आयोजित की गई, जिसके बाद जिला मुख्यालय पर कलेक्ट्रेट घेराव के लिए बड़ी संख्या में लोग पहुंचे।
स्थिति उस समय और ज्यादा चर्चा में आ गई जब विरोध प्रदर्शन के दौरान रविंद्र सिंह भाटी ने खुद पर पेट्रोल उड़ेल लिया। हालांकि वहां मौजूद समर्थकों और लोगों ने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए स्थिति को संभाल लिया। इस घटना के बाद राज्य की राजनीति में हलचल तेज हो गई और विपक्ष ने भाजपा सरकार को घेरना शुरू कर दिया।
पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए लिखा कि गिरल लिग्नाइट माइंस के मजदूर पिछले 38 दिनों से आंदोलन कर रहे हैं और विधायक रविंद्र सिंह भाटी भी 15 दिनों से उनके साथ धरने पर बैठे हैं, लेकिन सरकार और प्रशासन ने उनकी बात सुनने की जरूरत नहीं समझी। उन्होंने कहा कि सरकार की इस उदासीनता के कारण मजदूरों और विधायक को कलेक्ट्रेट कूच करने और इस तरह के कठोर कदम उठाने तक मजबूर होना पड़ा। गहलोत ने इसे गंभीर प्रशासनिक संवेदनहीनता बताते हुए कहा कि यदि भाजपा शासन में एक विधायक को अपनी बात मनवाने के लिए ऐसा कदम उठाना पड़ रहा है तो आम आदमी की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है। उन्होंने राज्य सरकार से तुरंत हस्तक्षेप कर सकारात्मक समाधान निकालने की अपील की।
नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली ने भी इस मामले में सरकार को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि भाजपा सरकार की घोर लापरवाही और संवेदनहीनता के कारण स्थिति यहां तक पहुंची। जूली ने इसे लोकतंत्र पर कलंक बताते हुए कहा कि जब एक विधायक को मजदूरों के हक की लड़ाई में इतना बड़ा कदम उठाने पर मजबूर होना पड़े तो यह सरकार की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े करता है। उन्होंने मुख्यमंत्री से आग्रह किया कि मजदूरों और विधायक के साथ तुरंत वार्ता कर ठोस समाधान निकाला जाए।
धरने पर बैठे मजदूरों की मांगें लंबे समय से चली आ रही समस्याओं से जुड़ी हुई हैं। प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना है कि उन्हें 8 घंटे की नियमित ड्यूटी दी जाए और स्थानीय युवाओं को रोजगार में प्राथमिकता मिले। साथ ही कंपनी द्वारा भूमि अधिग्रहण के दौरान किए गए रोजगार संबंधी वादों को पूरा किया जाए। मजदूरों का आरोप है कि क्षेत्र के संसाधनों का उपयोग तो किया जा रहा है, लेकिन स्थानीय लोगों को उसका लाभ नहीं मिल रहा।
गिरल लिग्नाइट माइंस क्षेत्र में रोजगार का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बना हुआ है। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि उनकी जमीनें परियोजनाओं के लिए ली गईं, लेकिन बदले में रोजगार और स्थायी आर्थिक सुरक्षा का वादा पूरा नहीं हुआ। इसी कारण युवाओं और मजदूरों में असंतोष लगातार बढ़ता गया और अब यह बड़ा आंदोलन बन चुका है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस आंदोलन ने अब केवल मजदूरों की मांगों का स्वरूप नहीं रखा, बल्कि यह सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव का विषय भी बन गया है। एक तरफ विपक्ष सरकार पर संवेदनहीनता का आरोप लगा रहा है, वहीं दूसरी ओर सरकार पर अब इस आंदोलन का जल्द समाधान निकालने का दबाव भी बढ़ गया है।


