जयपुर में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने नीट-यूजी परीक्षा में सामने आए पेपर लीक और परीक्षा रद्द होने के मामले को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। गहलोत ने इस पूरे विवाद को देश की शिक्षा व्यवस्था के लिए गंभीर संकट बताते हुए केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की है। उन्होंने कहा कि लगातार तीन वर्षों से परीक्षा प्रणाली में हो रही गड़बड़ियां यह साबित करती हैं कि सरकार युवाओं और छात्रों के भविष्य को सुरक्षित रखने में पूरी तरह विफल रही है।
अशोक गहलोत ने कहा कि वर्ष 2024, 2025 और अब 2026 में भी पेपर लीक जैसी घटनाओं का सामने आना बेहद चिंताजनक है। देशभर में लाखों छात्र नीट-यूजी जैसी महत्वपूर्ण परीक्षा की तैयारी के लिए दिन-रात मेहनत करते हैं, लेकिन हर बार पेपर लीक और अनियमितताओं की खबरें उनके विश्वास को तोड़ देती हैं। उन्होंने कहा कि यह केवल एक परीक्षा का मामला नहीं है, बल्कि पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा मुद्दा बन चुका है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार और संबंधित एजेंसियां पेपर लीक रोकने में लगातार असफल साबित हो रही हैं। उन्होंने कहा कि सरकार की ओर से हर बार सख्त कार्रवाई और सुधार के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति में कोई बदलाव दिखाई नहीं देता। यही कारण है कि छात्रों और अभिभावकों के बीच गहरा असंतोष फैल रहा है। गहलोत ने कहा कि यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो देश के युवाओं का शिक्षा व्यवस्था से भरोसा पूरी तरह खत्म हो सकता है।
गहलोत ने केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि अब उनके पास अपने पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं बचा है। उन्होंने कहा कि जब लगातार परीक्षाओं में गड़बड़ियां सामने आ रही हैं और लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित हो रहा है, तब इसकी जिम्मेदारी तय होना जरूरी है। उन्होंने मांग की कि या तो शिक्षा मंत्री स्वयं इस्तीफा दें या फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें तत्काल पद से हटाएं, ताकि यह संदेश जाए कि सरकार छात्रों के भविष्य को लेकर गंभीर है।
उन्होंने कहा कि विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने भी संसद में इस मुद्दे को मजबूती से उठाया था और सरकार से जवाब मांगा था। राहुल गांधी ने परीक्षा प्रणाली में सुधार और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की थी, लेकिन इसके बावजूद कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आए। गहलोत ने आरोप लगाया कि सरकार केवल बयानबाजी कर रही है, जबकि वास्तविक सुधार के लिए कोई प्रभावी कदम नहीं उठाए जा रहे हैं।
नीट-यूजी परीक्षा देश की सबसे महत्वपूर्ण मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में शामिल है। हर साल लाखों छात्र डॉक्टर बनने का सपना लेकर इस परीक्षा में शामिल होते हैं। ऐसे में परीक्षा में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी सीधे तौर पर छात्रों के करियर और मानसिक स्थिति को प्रभावित करती है। इस बार 3 मई को आयोजित हुई परीक्षा के बाद कई राज्यों से अनियमितताओं और पेपर लीक के आरोप सामने आए थे। इसके बाद मामला राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया।
जैसे-जैसे आरोप बढ़ते गए, छात्रों और अभिभावकों का विरोध भी तेज होता गया। देशभर में कई जगह प्रदर्शन हुए और परीक्षा रद्द करने की मांग उठी। बढ़ते दबाव और विवाद के बीच सरकार को आखिरकार परीक्षा रद्द करनी पड़ी। इसके बाद राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल उठने लगे। अब सरकार ने 21 जून को दोबारा परीक्षा आयोजित कराने की घोषणा की है, लेकिन छात्र अब भी पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर चिंतित दिखाई दे रहे हैं।
अशोक गहलोत ने कहा कि पेपर लीक जैसी घटनाओं का असर केवल परीक्षा परिणाम तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका गहरा मानसिक प्रभाव छात्रों पर पड़ता है। उन्होंने कहा कि कई छात्र वर्षों तक तैयारी करते हैं और परिवार अपनी आर्थिक स्थिति पर दबाव डालकर बच्चों को कोचिंग और शिक्षा उपलब्ध कराते हैं। लेकिन जब परीक्षा प्रक्रिया पर सवाल खड़े होते हैं तो छात्रों में निराशा और हताशा बढ़ जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि कुछ मामलों में छात्रों द्वारा आत्महत्या जैसी दुखद घटनाओं की खबरें सामने आई हैं, जो बेहद चिंताजनक और संवेदनशील विषय है।
गहलोत ने सरकार पर संवेदनहीनता का आरोप लगाते हुए कहा कि छात्रों के भविष्य को लेकर जिस गंभीरता की जरूरत है, वह केंद्र सरकार में दिखाई नहीं दे रही। उन्होंने कहा कि केवल जांच समितियां बनाना या बयान देना काफी नहीं है, बल्कि परीक्षा प्रणाली को पूरी तरह पारदर्शी और सुरक्षित बनाना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
राजनीतिक दृष्टि से भी यह मामला काफी अहम माना जा रहा है। विपक्ष लगातार पेपर लीक और भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं को लेकर केंद्र सरकार को घेर रहा है। आने वाले समय में यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति में और अधिक गर्मा सकता है, क्योंकि करोड़ों युवाओं और उनके परिवारों की भावनाएं इससे जुड़ी हुई हैं।
फिलहाल देशभर के छात्र 21 जून को होने वाली पुनः परीक्षा की तैयारी में जुटे हैं, लेकिन उनके मन में अब भी निष्पक्षता और सुरक्षा को लेकर सवाल बने हुए हैं। ऐसे में सरकार और परीक्षा एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वे छात्रों का विश्वास दोबारा कायम कर सकें और यह सुनिश्चित करें कि भविष्य में ऐसी घटनाएं दोबारा न हों।


