राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनाव को लेकर चल रहा विवाद अब न्यायिक और राजनीतिक दोनों स्तरों पर गंभीर होता जा रहा है। चुनाव में देरी के मुद्दे पर राज्य चुनाव आयोग और राज्य सरकार की भूमिका को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। इसी मामले में दायर अवमानना याचिका पर सोमवार को राजस्थान हाईकोर्ट में अहम सुनवाई होने जा रही है। इस सुनवाई पर पूरे प्रदेश की नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इसका असर प्रदेश में स्थानीय निकायों और पंचायतों के चुनावी कार्यक्रम पर सीधे तौर पर पड़ सकता है।
राजस्थान हाईकोर्ट की जस्टिस महेन्द्र कुमार गोयल और जस्टिस अनिल कुमार उपमन की खंडपीठ इस मामले की सुनवाई करेगी। यह अवमानना याचिका पूर्व विधायक संयम लोढ़ा और अन्य की ओर से दायर की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग ने हाईकोर्ट के पूर्व आदेशों की अनदेखी करते हुए जानबूझकर चुनाव प्रक्रिया में देरी की है।
इस मामले की पिछली सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य चुनाव आयोग और राज्य चुनाव आयुक्त राजेश्वर सिंह को अवमानना नोटिस जारी किया था। अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए चुनाव आयोग से पूछा था कि हाईकोर्ट द्वारा तय समयसीमा के बावजूद निकाय चुनाव के लिए मतदाता सूची पुनरीक्षण कार्यक्रम को निर्धारित समय से आगे क्यों बढ़ाया गया। कोर्ट ने इस पर स्पष्टीकरण मांगा था कि जब न्यायालय ने स्पष्ट रूप से चुनाव समय पर कराने के निर्देश दिए थे, तब आयोग ने ऐसी प्रक्रिया क्यों अपनाई जिससे चुनाव तय समयसीमा में संभव ही नहीं रह गए।
पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने अपनी याचिका में कहा है कि राज्य सरकार और चुनाव आयोग दोनों जानबूझकर चुनाव टालने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग द्वारा निकाय चुनाव के लिए अंतिम मतदाता सूची जारी करने की तारीख 22 अप्रैल तय करना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि चुनाव किसी भी स्थिति में अदालत द्वारा निर्धारित 15 अप्रैल की समयसीमा के भीतर नहीं कराए जा सकते थे। याचिका में इसे न्यायालय की अवमानना करार दिया गया है।
दरअसल, राजस्थान में पंचायत और शहरी निकाय चुनाव लंबे समय से चर्चा और विवाद का विषय बने हुए हैं। चुनाव की समयसीमा को लेकर पहले भी कई बार अदालत में सुनवाई हो चुकी है। विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों का आरोप है कि राज्य सरकार प्रशासनिक और आरक्षण संबंधी कारणों का हवाला देकर चुनाव टालना चाहती है। वहीं सरकार का कहना है कि बिना उचित आरक्षण व्यवस्था और प्रशासनिक तैयारी के चुनाव कराना संभव नहीं है।
इसी बीच राज्य सरकार और राज्य चुनाव आयोग की ओर से पंचायत और निकाय चुनाव आगे बढ़ाने के लिए हाईकोर्ट में प्रार्थना पत्र भी दायर किया गया था। इस प्रार्थना पत्र पर 11 मई को राजस्थान हाईकोर्ट में सुनवाई हुई थी। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था।
राज्य सरकार ने अदालत में प्रस्तुत अपने पक्ष में कहा था कि प्रदेश में अलग-अलग महीनों में विभिन्न प्रशासनिक और सामाजिक परिस्थितियां बनी हुई हैं, जिनके कारण तत्काल चुनाव कराना व्यावहारिक नहीं होगा। सरकार ने दिसंबर तक चुनाव टालने की अनुमति मांगी थी। सरकार का तर्क था कि कई क्षेत्रों में आरक्षण निर्धारण, प्रशासनिक पुनर्गठन और अन्य चुनावी प्रक्रियाएं पूरी नहीं हुई हैं। ऐसे में जल्दबाजी में चुनाव कराने से विवाद और बढ़ सकते हैं।
दूसरी ओर राज्य चुनाव आयोग ने भी सरकार के तर्कों का समर्थन किया। आयोग ने अदालत में कहा कि ओबीसी आरक्षण के निर्धारण से पहले चुनाव कराना संभव नहीं है। आयोग का कहना था कि यदि आरक्षण प्रक्रिया अधूरी रहते हुए चुनाव कराए जाते हैं तो बाद में कानूनी विवाद खड़े हो सकते हैं, जिससे चुनाव की वैधता पर भी सवाल उठ सकते हैं। आयोग ने अदालत से अतिरिक्त समय देने की मांग की थी ताकि सभी संवैधानिक और प्रशासनिक प्रक्रियाएं पूरी की जा सकें।
हालांकि याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सरकार और आयोग लगातार तकनीकी कारणों का सहारा लेकर चुनाव टालने की कोशिश कर रहे हैं। उनका आरोप है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में स्थानीय निकाय चुनाव समय पर होना बेहद जरूरी है, क्योंकि पंचायत और नगर निकाय जनता से सीधे जुड़े हुए संस्थान हैं। समय पर चुनाव नहीं होने से विकास कार्य और स्थानीय प्रशासन प्रभावित होते हैं।
राजनीतिक दृष्टि से भी यह मामला काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। आगामी महीनों में प्रदेश की राजनीति में पंचायत और निकाय चुनाव की बड़ी भूमिका रहने वाली है। ऐसे में चुनाव में देरी को लेकर विपक्ष लगातार सरकार पर हमलावर है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि हाईकोर्ट की आगामी सुनवाई इस पूरे मामले की दिशा तय कर सकती है। यदि अदालत ने चुनाव आयोग और सरकार के जवाबों से असंतोष जताया तो आगे और सख्त निर्देश भी जारी किए जा सकते हैं।
अब सबकी नजर सोमवार को होने वाली सुनवाई पर टिकी है। अदालत यह तय करेगी कि चुनाव प्रक्रिया में हुई देरी को न्यायालय की अवमानना माना जाए या फिर सरकार और आयोग द्वारा पेश किए गए कारणों को उचित माना जाए। इस फैसले का असर न केवल चुनावी कार्यक्रम पर पड़ेगा, बल्कि राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों पर भी इसका व्यापक प्रभाव देखने को मिल सकता है।


