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सोना, तेल और विदेश यात्रा पर पीएम नरेंद्र मोदी की अपील क्यों?

सोना, तेल और विदेश यात्रा पर पीएम नरेंद्र मोदी की अपील क्यों?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  ने रविवार को तेलंगाना की एक रैली में देशवासियों से सात बड़ी अपीलें कीं। इनमें एक साल तक सोने के गहने नहीं खरीदने, पेट्रोल-डीजल की खपत कम करने, विदेश यात्राओं से बचने, खाने के तेल का सीमित उपयोग करने और प्राकृतिक खेती को अपनाने जैसी बातें शामिल थीं। पहली नजर में ये अपीलें सामान्य बचत या देशभक्ति से जुड़ी लग सकती हैं, लेकिन इनके पीछे भारत की अर्थव्यवस्था, विदेशी मुद्रा भंडार और बढ़ते आयात खर्च को लेकर गहरी चिंता छिपी हुई है।

पीएम  मोदी ने कहा कि भारत को विदेशी मुद्रा बचाने के लिए सामूहिक प्रयास करने होंगे। उन्होंने लोगों से अपील की कि अगले एक साल तक जरूरत न हो तो सोना न खरीदें। दरअसल भारत अपनी जरूरत का लगभग पूरा सोना विदेशों से आयात करता है। बीते कारोबारी वर्ष में भारत का गोल्ड इम्पोर्ट बिल करीब 6.4 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच गया। सोने की कीमतों में रिकॉर्ड तेजी के कारण यह खर्च और तेजी से बढ़ा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें लगातार नई ऊंचाइयों पर पहुंच रही हैं, जिससे भारत को डॉलर में ज्यादा भुगतान करना पड़ रहा है।

भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ताओं में शामिल है। शादी-ब्याह और निवेश दोनों के लिए देश में सोने की भारी मांग रहती है। हालांकि हाल के महीनों में कीमतें इतनी बढ़ चुकी हैं कि आम लोगों की खरीदारी पर असर पड़ने लगा है। इसके बावजूद निवेश के तौर पर सोने की मांग बनी हुई है। यही वजह है कि सरकार चाहती है कि लोग फिलहाल सोने की खरीद कम करें ताकि विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम हो सके। अगर सोने का आयात घटता है तो डॉलर की बचत होगी और रुपए पर दबाव कम पड़ेगा।

प्रधानमंत्री ने पेट्रोल-डीजल के सीमित उपयोग, मेट्रो और कार पूलिंग को बढ़ावा देने की भी अपील की। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय तेल संकट है। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है। भारत अपनी जरूरत का करीब 70 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय कीमतें बढ़ने का सीधा असर भारत के आयात बिल पर पड़ता है।

हाल के महीनों में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं, लेकिन भारत में पेट्रोल और डीजल के दामों में अभी बड़ा बदलाव नहीं किया गया। इससे सरकारी तेल कंपनियों पर भारी आर्थिक बोझ बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहीं तो भारत का क्रूड ऑयल इम्पोर्ट बिल 17 लाख करोड़ रुपए तक पहुंच सकता है। ऐसे में सरकार चाहती है कि लोग निजी वाहनों का कम उपयोग करें, सार्वजनिक परिवहन अपनाएं और जहां संभव हो वर्क फ्रॉम होम तथा ऑनलाइन मीटिंग्स को प्राथमिकता दें।

प्रधानमंत्री मोदी ने प्राकृतिक खेती और रासायनिक खाद के कम उपयोग पर भी जोर दिया। भारत यूरिया, डीएपी और पोटाश जैसे उर्वरकों का बड़ा आयातक है। खाद बनाने में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल विदेशों से आता है और मौजूदा वैश्विक तनाव के कारण इसकी सप्लाई प्रभावित हो रही है। यदि खाद की कीमतें और बढ़ती हैं तो सरकार को किसानों को सब्सिडी देने में भारी अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ सकता है।

सरकार पहले ही फर्टिलाइजर सब्सिडी पर लाखों करोड़ रुपए खर्च कर रही है। ऐसे में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देकर सरकार आयात पर निर्भरता कम करना चाहती है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि बिना पर्याप्त तैयारी के रासायनिक खाद का उपयोग अचानक घटा दिया गया तो कृषि उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इसलिए सरकार संतुलित तरीके से प्राकृतिक खेती को बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है।

प्रधानमंत्री ने विदेश यात्रा और डेस्टिनेशन वेडिंग्स को लेकर भी लोगों से सोच-समझकर खर्च करने की अपील की। पिछले कुछ वर्षों में भारतीयों का विदेश घूमने और विदेशों में शादी करने का चलन तेजी से बढ़ा है। मध्यम वर्ग के लोग भी अब बड़ी संख्या में विदेशी पर्यटन पर खर्च कर रहे हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक भारतीयों द्वारा विदेश यात्राओं पर होने वाला खर्च लगातार बढ़ रहा है और यह अब लाखों करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है।

सरकार का मानना है कि यदि लोग विदेशी पर्यटन की जगह देश के भीतर घूमना पसंद करें तो भारतीय अर्थव्यवस्था को सीधा फायदा होगा। इससे होटल उद्योग, टैक्सी सेवाओं, स्थानीय व्यापार और पर्यटन क्षेत्र में रोजगार बढ़ेगा। साथ ही विदेशों में खर्च होने वाला डॉलर देश के भीतर ही रहेगा। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने फिलहाल विदेश यात्राओं को सीमित करने की अपील की है।

खाने के तेल की खपत कम करने की सलाह के पीछे भी आर्थिक कारण हैं। भारत अपनी जरूरत का 60 से 65 प्रतिशत खाद्य तेल विदेशों से खरीदता है। पाम ऑयल, सोयाबीन ऑयल और सनफ्लावर ऑयल का बड़ा हिस्सा आयात होता है। पिछले साल भारत ने खाद्य तेल आयात पर करीब 1.61 लाख करोड़ रुपए खर्च किए। यदि घरेलू खपत में थोड़ी भी कमी आती है तो आयात बिल घट सकता है और विदेशी मुद्रा की बचत होगी।

हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने पहले भी खाने के तेल की खपत कम करने की बात स्वास्थ्य कारणों से कही थी। उन्होंने मोटापा, डायबिटीज और हार्ट डिजीज जैसी समस्याओं को देखते हुए तेल कम खाने की सलाह दी थी। इस बार आर्थिक कारण भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।

इन सभी अपीलों के पीछे सबसे बड़ा कारण भारत का घटता विदेशी मुद्रा भंडार माना जा रहा है। हाल के महीनों में भारत के फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व में लगातार गिरावट दर्ज की गई है। वैश्विक अस्थिरता, बढ़ते आयात खर्च और डॉलर की मजबूत स्थिति के कारण भारत पर दबाव बढ़ा है। सरकार चाहती है कि आम लोग भी इस आर्थिक चुनौती को समझें और कुछ समय के लिए गैर-जरूरी खर्चों में कटौती करें।

विपक्ष ने प्रधानमंत्री की इन अपीलों को लेकर सरकार पर निशाना भी साधा है। राहुल गांधी ने कहा कि देश की आर्थिक स्थिति ऐसी हो गई है कि अब लोगों को यह बताना पड़ रहा है कि क्या खरीदना है और क्या नहीं। वहीं अखिलेश यादव  ने सवाल उठाया कि चुनावों के दौरान बड़े पैमाने पर होने वाले खर्चों पर कोई रोक क्यों नहीं लगाई गई।

इन आलोचनाओं के बीच सरकार और विशेषज्ञों का तर्क है कि यह कोई आर्थिक आपातकाल नहीं बल्कि एहतियाती कदम हैं। पूर्व भारतीय राजनयिक निरुपमा राव  के अनुसार वैश्विक संकट का असर आम लोगों की जिंदगी पर पड़ रहा है और ऐसे समय में सरकार, उद्योग और जनता सभी को मिलकर जिम्मेदारी निभानी होगी।

दिलचस्प बात यह है कि जहां आम लोगों से सोना न खरीदने की अपील की जा रही है, वहीं भारतीय रिजर्व बैंक लगातार अपना गोल्ड रिजर्व बढ़ा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में Reserve Bank of India ने बड़ी मात्रा में सोना खरीदा है। इसकी वजह यह है कि दुनिया के कई देश अब डॉलर पर निर्भरता कम करके अपने विदेशी मुद्रा भंडार को सोने में बदल रहे हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद कई देशों को यह एहसास हुआ कि वैश्विक संकट के समय सोना सबसे सुरक्षित संपत्ति साबित हो सकता है।

भारत भी इसी रणनीति पर काम कर रहा है। अब आरबीआई अपने अधिकतर गोल्ड रिजर्व को देश के भीतर ही सुरक्षित रख रहा है ताकि जरूरत पड़ने पर उसका इस्तेमाल किया जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार की अपील का उद्देश्य लोगों में घबराहट पैदा करना नहीं बल्कि आर्थिक अनुशासन और विदेशी मुद्रा बचत को बढ़ावा देना है।

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