राजस्थान सरकार पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक संभावनाओं को मजबूत करने के उद्देश्य से एक महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रही है, जिसके तहत राज्य में चंदन वन विकसित किए जाएंगे। मुख्यमंत्री के ड्रीम प्रोजेक्ट के रूप में देखी जा रही इस योजना के तहत बांसवाड़ा सहित तीन जिलों का चयन किया गया है, जहां बड़े पैमाने पर चंदन के पौधे लगाए जाएंगे। इस पहल से न केवल प्रदेश में हरित क्षेत्र का विस्तार होगा, बल्कि भविष्य में चंदन आधारित उद्योगों को भी बढ़ावा मिलने की संभावना है।
इस परियोजना के अंतर्गत बांसवाड़ा, उदयपुर और सिरोही जिलों में चंदन वन विकसित किए जाने हैं। वन विभाग ने इन तीनों जिलों में स्थानों का चयन भी कर लिया है और अब तैयारियों को अंतिम रूप दिया जा रहा है। बांसवाड़ा जिले में वनखंड झातलिया क्षेत्र को इसके लिए चुना गया है, जहां लगभग 25 हेक्टेयर क्षेत्र में चंदन वन विकसित किया जाएगा। इसी तरह उदयपुर के कालका माता वनखंड में करीब 22 हेक्टेयर और सिरोही के पिण्डवाड़ा क्षेत्र में लगभग 30 हेक्टेयर भूमि पर यह परियोजना साकार होगी। इन सभी स्थानों पर भूमि की प्रकृति और पर्यावरणीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए चयन किया गया है, ताकि चंदन के पौधों का बेहतर विकास सुनिश्चित किया जा सके।
इस योजना की प्रगति का जायजा लेने के लिए राज्य के वन मंत्री स्वयं बांसवाड़ा पहुंच रहे हैं, जहां वे चयनित स्थल का निरीक्षण करेंगे और अधिकारियों के साथ तैयारियों की समीक्षा करेंगे। वन विभाग के अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि मानसून से पहले सभी आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली जाएं, ताकि पौधारोपण का कार्य समय पर शुरू किया जा सके। इसके तहत गड्ढों की खुदाई, भूमि समतलीकरण, सुरक्षा के लिए फेंसिंग और अन्य बुनियादी व्यवस्थाओं को प्राथमिकता दी जा रही है।
परियोजना के तहत प्रत्येक चंदन वन में लगभग दस हजार पौधे लगाए जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इसके लिए संबंधित जिलों के डीएफओ को अपने स्तर पर चंदन के पौधों की व्यवस्था करने के निर्देश दिए गए हैं। इन पौधों को बाहरी राज्यों से मंगवाया जाएगा, ताकि उनकी गुणवत्ता और विकास क्षमता सुनिश्चित की जा सके। पौधारोपण का कार्य जून माह के अंतिम चरण में मानसून की शुरुआत के साथ किया जाएगा, जिससे पौधों को पर्याप्त नमी और अनुकूल वातावरण मिल सके।
इस योजना में विशेष रूप से सफेद चंदन के पौधों को प्राथमिकता दी जा रही है, जो अपनी सुगंध और औषधीय गुणों के कारण अत्यधिक मूल्यवान माने जाते हैं। हालांकि, चंदन का पौधा सामान्य पौधों की तरह नहीं होता, बल्कि यह अर्द्ध परजीवी प्रकृति का होता है। इसका मतलब यह है कि इसके विकास के लिए अन्य पौधों की सहायता जरूरी होती है। चंदन के पौधे अपनी पोषण संबंधी जरूरतों को पूरा करने के लिए आसपास लगाए गए होस्ट प्लांट्स से पोषक तत्व ग्रहण करते हैं।
इसी वजह से चंदन के साथ-साथ अन्य सहायक पौधों को भी लगाया जाएगा। इनमें मूंग, अरहर, मेहंदी, करंज और अन्य उपयुक्त प्रजातियों के पौधे शामिल होंगे, जो चंदन के विकास में सहायक बनेंगे। यह मिश्रित पौधारोपण प्रणाली न केवल चंदन के पौधों की वृद्धि में मदद करेगी, बल्कि जैव विविधता को भी बढ़ावा देगी और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में सहायक होगी।
वन विभाग के अधिकारियों के अनुसार इस परियोजना की तैयारियां लगभग पूरी कर ली गई हैं और अब इसे जमीन पर उतारने की प्रक्रिया शुरू होने वाली है। बांसवाड़ा के डीएफओ अभिषेक शर्मा ने बताया कि चयनित क्षेत्र में सभी आवश्यक व्यवस्थाएं की जा रही हैं और जल्द ही पौधारोपण का कार्य प्रारंभ किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि इस परियोजना के लिए उच्च गुणवत्ता वाले पौधे मंगवाए जाएंगे, ताकि लंबे समय तक इसका लाभ मिल सके।
इस ड्रीम प्रोजेक्ट के पीछे सरकार का उद्देश्य केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आर्थिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है। चंदन की लकड़ी अंतरराष्ट्रीय बाजार में काफी महंगी मानी जाती है और इसका उपयोग इत्र, औषधि और धार्मिक कार्यों में व्यापक रूप से होता है। ऐसे में आने वाले वर्षों में यह परियोजना राज्य के लिए आय का एक बड़ा स्रोत बन सकती है।
राजस्थान में चंदन वन विकसित करने की यह योजना राज्य के पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। यदि यह परियोजना सफल होती है, तो यह न केवल प्रदेश की हरियाली बढ़ाएगी, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी पैदा करेगी। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि यह ड्रीम प्रोजेक्ट किस प्रकार आकार लेता है और राजस्थान को चंदन उत्पादन के क्षेत्र में एक नई पहचान दिलाता है।


