राजस्थान की राजनीति में एक बार फिर अशोक गहलोत और सचिन पायलट से जुड़ा पुराना विवाद चर्चा में आ गया है। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सोमवार को जयपुर एयरपोर्ट पर मीडिया से बातचीत करते हुए कहा कि सचिन पायलट की दोनों टांगें कांग्रेस में हैं और वे कांग्रेस में ही रहेंगे। गहलोत के इस बयान ने राज्य की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। उनके बयान को कांग्रेस के अंदरूनी समीकरणों और पुराने विवादों से जोड़कर देखा जा रहा है।
यह पूरा मामला उस समय गरमा गया जब भारतीय जनता पार्टी के राजस्थान प्रभारी राधा मोहन दास अग्रवाल ने टोंक में सचिन पायलट पर टिप्पणी करते हुए कहा कि पायलट स्थानीय विधायक हैं, लेकिन वे बहुरूपिया हैं। उन्होंने कहा कि उनकी एक टांग कांग्रेस में रहती है और दूसरी कहीं और रहती है। भाजपा नेता के इस बयान पर पलटवार करते हुए अशोक गहलोत ने पायलट का खुलकर बचाव किया, लेकिन साथ ही पुराने घटनाक्रम का जिक्र कर नई राजनीतिक चर्चा भी शुरू कर दी।
गहलोत ने कहा कि अब जो लोग पहले गुमराह करके कांग्रेस के विधायकों को मानेसर ले गए थे, उनकी मंशा कभी पूरी नहीं होगी। उन्होंने कहा कि सचिन पायलट को अब अनुभव हो गया है कि उस तरह की गलती करने के क्या परिणाम होते हैं। उन्होंने कहा कि अब पायलट समझ चुके हैं, संभल चुके हैं और उन्हें उम्मीद है कि वे अब कभी कांग्रेस छोड़कर नहीं जाएंगे। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि पूरी कांग्रेस पार्टी सचिन पायलट के साथ एकजुट है।
गहलोत का यह बयान इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि जुलाई 2020 का राजनीतिक संकट आज भी राजस्थान कांग्रेस के इतिहास की सबसे चर्चित घटनाओं में शामिल है। उस समय सचिन पायलट समर्थक विधायकों के साथ हरियाणा के मानेसर चले गए थे, जिससे तत्कालीन कांग्रेस सरकार पर संकट खड़ा हो गया था। कई दिनों तक चली राजनीतिक उठापटक के बाद मामला शांत हुआ और पायलट की कांग्रेस में वापसी हुई। हालांकि उस प्रकरण की यादें समय-समय पर बयानबाजी के जरिए फिर सामने आती रही हैं।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अशोक गहलोत का यह बयान सिर्फ भाजपा पर जवाबी हमला नहीं है, बल्कि यह कांग्रेस के भीतर चल रहे शक्ति संतुलन का संकेत भी है। गहलोत ने एक ओर पायलट के कांग्रेस में बने रहने की बात कही, वहीं दूसरी ओर पुराने घटनाक्रम को याद दिलाकर यह भी जताया कि 2020 का अध्याय पूरी तरह भुलाया नहीं गया है।
गौरतलब है कि अगस्त 2020 में जब सचिन पायलट की कांग्रेस में वापसी हुई थी, तब अशोक गहलोत ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि अब सब लोग ‘फॉरगेट एंड फॉरगिव’ यानी भूलो और माफ करो की नीति अपनाकर आगे बढ़ें। उस समय पार्टी नेतृत्व ने भी राजस्थान कांग्रेस में एकता का संदेश देने की कोशिश की थी। इसके बावजूद समय-समय पर दोनों खेमों के बीच तनाव की खबरें सामने आती रही हैं।
पिछले कई महीनों से अशोक गहलोत लगातार भाजपा पर निर्वाचित सरकारों को गिराने की साजिश रचने का आरोप लगाते रहे हैं। वे अक्सर राजस्थान के 2020 राजनीतिक संकट का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि भाजपा ने सरकार गिराने की कोशिश की थी, लेकिन कांग्रेस एकजुट रही और उनकी योजना सफल नहीं होने दी गई। इस बार भी उन्होंने भाजपा पर निशाना साधते हुए मानेसर प्रकरण का जिक्र किया।
दूसरी ओर, सचिन पायलट ने पिछले कुछ समय में पार्टी लाइन के भीतर रहकर सक्रिय राजनीति की है। वे कई सार्वजनिक कार्यक्रमों में कांग्रेस नेतृत्व के साथ नजर आए हैं और राज्य तथा राष्ट्रीय मुद्दों पर पार्टी की तरफ से मुखर रहे हैं। ऐसे में गहलोत का यह कहना कि पायलट अब समझ गए हैं और कांग्रेस नहीं छोड़ेंगे, कई तरह के राजनीतिक संदेश देता है।
राजस्थान कांग्रेस में लंबे समय तक गहलोत और पायलट के बीच नेतृत्व संघर्ष की चर्चा होती रही है। 2018 विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस की सरकार बनने पर मुख्यमंत्री पद को लेकर दोनों नेताओं के समर्थकों के बीच खींचतान रही। बाद में अशोक गहलोत मुख्यमंत्री बने और सचिन पायलट उपमुख्यमंत्री तथा प्रदेशाध्यक्ष की भूमिका में रहे। हालांकि 2020 के संकट के बाद दोनों नेताओं के रिश्तों में दूरी बढ़ी थी।
अब जब राजस्थान में कांग्रेस विपक्ष की भूमिका में है, तब पार्टी के लिए एकजुटता बनाए रखना बड़ी चुनौती मानी जा रही है। भाजपा की सत्ता वाली सरकार के खिलाफ प्रभावी विपक्ष बनने के लिए कांग्रेस को अपने बड़े नेताओं के बीच तालमेल मजबूत रखना होगा। ऐसे समय में गहलोत का बयान संगठनात्मक दृष्टि से भी अहम माना जा रहा है।
अब राजनीतिक नजरें सचिन पायलट की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। यदि वे इस बयान पर संयमित प्रतिक्रिया देते हैं, तो इसे कांग्रेस में एकजुटता का संकेत माना जाएगा। वहीं यदि वे तीखा जवाब देते हैं, तो फिर पार्टी के भीतर पुराने मतभेदों की चर्चा तेज हो सकती है।
भाजपा भी इस पूरे घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। विपक्षी दल के रूप में भाजपा लगातार कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान को मुद्दा बनाती रही है। ऐसे में गहलोत और पायलट से जुड़े बयान आने वाले दिनों में राजस्थान की राजनीति का बड़ा विषय बने रह सकते हैं।
फिलहाल इतना तय है कि अशोक गहलोत के एक बयान ने राजस्थान कांग्रेस के भीतर पुराने अध्याय को फिर से चर्चा में ला दिया है। उन्होंने सचिन पायलट के पार्टी में बने रहने का भरोसा जताया है, लेकिन साथ ही मानेसर प्रकरण का जिक्र कर यह भी संकेत दिया है कि राजनीति में पुराने घटनाक्रम कभी पूरी तरह खत्म नहीं होते। आने वाले दिनों में पायलट की प्रतिक्रिया और कांग्रेस की रणनीति से इस मुद्दे की दिशा तय होगी।


