अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प एक बार फिर विवादों में घिर गए हैं। इस बार उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर एक ऐसी पोस्ट शेयर की है, जिसमें भारत और चीन को लेकर बेहद आपत्तिजनक टिप्पणी की गई है। यह पोस्ट कट्टरपंथी अमेरिकी लेखक और रेडियो होस्ट माइकल सैवेज के पुराने वीडियो और चिट्ठी पर आधारित बताई जा रही है। इस पोस्ट के सामने आने के बाद अमेरिका में बर्थराइट सिटिजनशिप यानी जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता पर बहस फिर तेज हो गई है, वहीं भारत सरकार ने भी इस मामले पर प्रतिक्रिया दी है।
जानकारी के मुताबिक माइकल सैवेज ने 1 अप्रैल को अपने यूट्यूब चैनल पर एक लाइव वीडियो प्रसारित किया था। इसी वीडियो में कही गई बातों का टेक्स्ट ट्रम्प ने लगभग 22 दिन बाद चार पन्नों के रूप में शेयर किया। इसमें अमेरिका की नागरिकता व्यवस्था, प्रवासियों की बढ़ती संख्या और भारत-चीन सहित कई देशों के लोगों पर टिप्पणी की गई। पोस्ट में यह दावा किया गया कि कुछ लोग गर्भावस्था के अंतिम समय में अमेरिका पहुंचते हैं, वहां बच्चे को जन्म देते हैं और जन्म लेते ही बच्चे को अमेरिकी नागरिकता मिल जाती है। बाद में उसी आधार पर पूरा परिवार अमेरिका में बसने की कोशिश करता है।
पोस्ट में अमेरिकी संविधान और पुराने कानूनों पर भी सवाल उठाए गए। कहा गया कि जब संविधान लिखा गया था, उस समय आज जैसी वैश्विक यात्रा व्यवस्था, इंटरनेट, आधुनिक संचार और बड़े पैमाने पर प्रवासन की स्थिति नहीं थी। इसलिए मौजूदा समय में कुछ कानून प्रासंगिक नहीं रह गए हैं। माइकल सैवेज ने यह भी कहा कि बर्थराइट सिटिजनशिप का फैसला अदालतों या वकीलों के भरोसे नहीं छोड़ा जाना चाहिए, बल्कि देशव्यापी मतदान के जरिए जनता को निर्णय लेना चाहिए।
इस विवादित पोस्ट का सबसे संवेदनशील हिस्सा भारत और चीन से जुड़ा था। इसमें कहा गया कि अमेरिका के कुछ क्षेत्रों, खासकर कैलिफोर्निया के टेक सेक्टर में भारतीय और चीनी मूल के लोगों का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ गया है। आरोप लगाया गया कि वहां भर्ती प्रक्रिया निष्पक्ष नहीं रह गई है और कुछ खास समुदायों को प्राथमिकता दी जा रही है। इस तरह की टिप्पणी ने भारतीय समुदाय के साथ-साथ एशियाई मूल के लोगों में भी नाराजगी पैदा की है।
अमेरिका में भारतीय मूल के पेशेवर लंबे समय से टेक्नोलॉजी, रिसर्च, हेल्थकेयर और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में अहम भूमिका निभाते रहे हैं। सिलिकॉन वैली सहित कई बड़े तकनीकी केंद्रों में भारतीय प्रतिभाओं का मजबूत योगदान माना जाता है। ऐसे में इस तरह की टिप्पणी को कई लोग नस्लीय पूर्वाग्रह और राजनीतिक ध्रुवीकरण से जोड़कर देख रहे हैं।
पोस्ट में American Civil Liberties Union पर भी निशाना साधा गया। आरोप लगाया गया कि यह संगठन अवैध प्रवासियों के हित में काम करता है और ऐसी नीतियों का समर्थन करता है, जिनसे करदाताओं पर बोझ बढ़ता है। साथ ही यह भी कहा गया कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं और वेलफेयर योजनाओं का गलत फायदा उठाया जा रहा है। हालांकि इन दावों को लेकर कोई ठोस तथ्य प्रस्तुत नहीं किए गए।
इस पूरे विवाद के बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने भी प्रतिक्रिया दी। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि सरकार ने इस मामले से जुड़ी कुछ रिपोर्ट्स देखी हैं और फिलहाल इतना ही कहा जा सकता है। भारत की यह प्रतिक्रिया सावधानीपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि मामला अमेरिका की घरेलू राजनीति और चुनावी माहौल से भी जुड़ा हुआ है।
अमेरिका में जन्म के आधार पर नागरिकता देने का प्रावधान 1868 में लागू हुए 14वें संवैधानिक संशोधन से जुड़ा है। गृहयुद्ध के बाद इस संशोधन का उद्देश्य गुलामी झेल चुके अश्वेत लोगों को पूर्ण नागरिक अधिकार देना था। इसके तहत अमेरिका में जन्म लेने वाले बच्चों को नागरिकता दी जाती है, चाहे उनके माता-पिता का इमिग्रेशन स्टेटस कुछ भी हो। समय के साथ इस कानून की अलग-अलग व्याख्याएं हुईं और आज यह अमेरिकी राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुका है।
डोनाल्ड ट्रम्प पहले भी बर्थराइट सिटिजनशिप का विरोध करते रहे हैं। उन्होंने 20 जनवरी 2025 को एक आदेश जारी कर जन्म के आधार पर मिलने वाली नागरिकता पर रोक लगाने की कोशिश की थी, लेकिन इसके तुरंत बाद संघीय अदालतों ने उस पर अस्थायी रोक लगा दी। इसके बाद कई अदालतों में इस आदेश को चुनौती दी गई और मामला अब भी कानूनी प्रक्रिया में है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मुद्दा सिर्फ इमिग्रेशन नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि अमेरिकी पहचान, श्रम बाजार, नस्लीय राजनीति और चुनावी रणनीति से भी जुड़ा है। ट्रम्प द्वारा ऐसे समय में यह पोस्ट शेयर करना, जब अमेरिका में चुनावी माहौल गर्म है, राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है।


