वैश्विक स्तर पर जारी भू-राजनीतिक तनाव और विशेष रूप से पश्चिम एशिया में उभरते संकट के बीच भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण लेकिन चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) की ताजा ग्लोबल जीडीपी रिपोर्ट के अनुसार भारत अब दुनिया की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में दर्ज किया गया है। यह स्थिति इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि एक साल पहले तक भारत को कुछ समय के लिए चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में देखा जा रहा था, लेकिन अब रैंकिंग में यह बदलाव कई आर्थिक कारकों की ओर इशारा करता है।
IMF के आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में भारत की सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी लगभग 2.25 ट्रिलियन डॉलर के आसपास आंकी गई है। यह आंकड़ा अपने आप में मजबूत है, लेकिन वैश्विक तुलना में भारत की स्थिति अपेक्षाकृत पीछे खिसकती नजर आई है। इस बदलाव के पीछे सबसे बड़ा कारण भारतीय रुपये की कमजोरी को माना जा रहा है। डॉलर के मुकाबले रुपये पर बढ़ते दबाव ने भारतीय अर्थव्यवस्था के डॉलर आधारित मूल्यांकन को प्रभावित किया है।
रुपये की कमजोरी के पीछे कई कारक काम कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में डॉलर की मजबूती, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें और वैश्विक अनिश्चितता ने भारतीय मुद्रा पर दबाव बनाया है। चूंकि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए तेल की कीमतों में वृद्धि सीधे तौर पर आयात बिल को बढ़ा देती है। इससे न केवल व्यापार घाटा बढ़ता है, बल्कि रुपये पर अतिरिक्त दबाव भी पड़ता है। यदि रुपये की स्थिति स्थिर रहती, तो भारत की जीडीपी का डॉलर मूल्य अधिक होता और संभवतः वैश्विक रैंकिंग में बेहतर स्थान मिल सकता था।
इस रिपोर्ट में भारत से आगे जिन देशों को स्थान मिला है, उनमें अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी और यूनाइटेड किंगडम शामिल हैं। ये सभी देश लंबे समय से वैश्विक अर्थव्यवस्था में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं और उनकी आर्थिक स्थिरता तथा मुद्रा की मजबूती ने उन्हें शीर्ष स्थान पर बनाए रखा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के सामने इस समय दोहरी चुनौती खड़ी है। एक ओर उसे अपनी आर्थिक विकास दर को 7 से 8 प्रतिशत के स्तर पर बनाए रखना है, ताकि वह तेजी से आगे बढ़ सके, वहीं दूसरी ओर रुपये की अस्थिरता को नियंत्रित करना भी जरूरी है। यदि इन दोनों मोर्चों पर संतुलन नहीं बना, तो भारत के लिए वैश्विक प्रतिस्पर्धा में अपनी स्थिति मजबूत करना कठिन हो सकता है।
हालांकि इस चुनौतीपूर्ण स्थिति के बावजूद कुछ सकारात्मक संकेत भी सामने आए हैं। एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स की रिपोर्ट के अनुसार, यदि कच्चे तेल की औसत कीमत 130 डॉलर प्रति बैरल तक भी पहुंचती है, तब भी भारतीय अर्थव्यवस्था के 6.3 प्रतिशत की दर से बढ़ने की संभावना है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि भारत की आर्थिक बुनियाद अभी भी मजबूत है और वह बाहरी झटकों का सामना करने में सक्षम है।
एसएंडपी के निदेशक यी फर्न फुआ के अनुसार, यदि तेल की कीमतें अपेक्षाकृत कम यानी लगभग 85 डॉलर प्रति बैरल रहती हैं, तो वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की विकास दर 7.1 प्रतिशत तक पहुंच सकती है। यह दर दुनिया की अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में काफी अधिक मानी जाती है, जो भारत की संभावनाओं को दर्शाती है।
रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि ऊर्जा कीमतों में वृद्धि से भले ही राजकोषीय दबाव बढ़े, लेकिन इसका भारत की संप्रभु साख रेटिंग पर तत्काल नकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना नहीं है। इसका कारण यह है कि भारत ने लंबे समय से राजकोषीय अनुशासन और सुधारों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखाई है, जो निवेशकों के विश्वास को बनाए रखने में मदद करती है।
वैश्विक आर्थिक परिदृश्य में तेजी से हो रहे बदलावों के बीच भारत के लिए यह समय रणनीतिक फैसलों का है। ऊर्जा आयात को विविध बनाना, घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देना और वित्तीय स्थिरता बनाए रखना जैसे कदम भविष्य में भारत की आर्थिक स्थिति को मजबूत करने में सहायक हो सकते हैं।
कुल मिलाकर, आईएमएफ की यह रिपोर्ट जहां भारत के लिए एक चेतावनी का संकेत देती है, वहीं यह भी स्पष्ट करती है कि देश के पास अभी भी मजबूत विकास की संभावनाएं मौजूद हैं। यदि सरकार और नीति निर्माता सही दिशा में कदम उठाते हैं, तो भारत आने वाले वर्षों में न केवल अपनी रैंकिंग सुधार सकता है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में और अधिक प्रभावशाली भूमिका निभा सकता है।


