अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का असर अब वैश्विक ऊर्जा बाजार के साथ-साथ भारत की तेल कंपनियों पर भी साफ दिखाई देने लगा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में लगातार हो रही बढ़ोतरी के कारण देश की सरकारी तेल कंपनियों के लिए पेट्रोल-डीजल की बिक्री घाटे का सौदा बनती जा रही है। मौजूदा परिस्थितियों में पेट्रोल पर करीब 18 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर लगभग 35 रुपये प्रति लीटर तक का नुकसान उठाना पड़ रहा है, जिससे कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर दबाव बढ़ता जा रहा है।
भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतें बाजार आधारित प्रणाली के अनुसार तय होती हैं, लेकिन इसके बावजूद पिछले कुछ वर्षों से खुदरा कीमतों में स्थिरता देखने को मिली है। प्रमुख सरकारी तेल कंपनियां जैसे इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन, भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड ने अप्रैल 2022 के बाद से पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बड़ा बदलाव नहीं किया है। इस दौरान अंतरराष्ट्रीय बाजार में कई बार उतार-चढ़ाव आया, लेकिन घरेलू स्तर पर कीमतों को स्थिर बनाए रखा गया।
विशेषज्ञों का मानना है कि कीमतों को स्थिर रखने का फैसला उपभोक्ताओं को राहत देने के उद्देश्य से लिया गया था, लेकिन इसका असर अब कंपनियों के घाटे के रूप में सामने आ रहा है। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि ने इस दबाव को और बढ़ा दिया है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई थीं। हालांकि 2026 की शुरुआत में इसमें कुछ गिरावट आई और कीमतें 70 डॉलर प्रति बैरल तक आ गई थीं, लेकिन मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के चलते एक बार फिर कीमतों में तेजी देखने को मिली है और यह दोबारा 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी हुई हैं।
इस बढ़ोतरी का सीधा असर भारत की तेल कंपनियों की लागत पर पड़ रहा है। जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं और खुदरा कीमतों में बदलाव नहीं किया जाता, तो कंपनियों को प्रति लीटर के हिसाब से नुकसान उठाना पड़ता है। आंकड़ों के अनुसार, पिछले महीने तक सरकारी तेल कंपनियों को रोजाना करीब 2,400 करोड़ रुपये का नुकसान हो रहा था। हालांकि हाल के दिनों में यह घाटा घटकर लगभग 1,600 करोड़ रुपये प्रतिदिन के आसपास आ गया है, लेकिन यह अब भी एक बड़ा वित्तीय दबाव बना हुआ है।
इस घाटे को कुछ हद तक कम करने के लिए सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती की थी। प्रति लीटर लगभग 10 रुपये की यह कमी कंपनियों के नुकसान को संतुलित करने में मददगार साबित हुई है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल करों में कटौती से लंबे समय तक इस स्थिति को संभालना संभव नहीं है और अंततः कीमतों में बदलाव करना ही पड़ेगा।
इस बीच, वैश्विक निवेश और वित्तीय संस्थानों की रिपोर्ट्स भी संकेत दे रही हैं कि आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ सकते हैं। Macquarie Group की एक रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु जैसे प्रमुख राज्यों में चुनाव समाप्त होने के बाद ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना है। रिपोर्ट में कहा गया है कि अप्रैल के बाद पंप पर दाम बढ़ने का जोखिम स्पष्ट रूप से नजर आ रहा है।
इससे यह संकेत मिलता है कि फिलहाल सरकार ने राजनीतिक और सामाजिक कारणों से कीमतों को स्थिर बनाए रखा है, लेकिन आर्थिक दबाव के चलते भविष्य में इनमें बदलाव किया जा सकता है। यदि ऐसा होता है, तो इसका सीधा असर आम लोगों की जेब पर पड़ेगा, क्योंकि पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ने से परिवहन लागत बढ़ती है और इसका प्रभाव अन्य वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर भी पड़ता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता नहीं आती है, तो भारत के लिए स्थिति और चुनौतीपूर्ण हो सकती है। ऐसे में सरकार और तेल कंपनियों को मिलकर संतुलन बनाने की आवश्यकता होगी, ताकि एक ओर कंपनियों का घाटा नियंत्रित हो सके और दूसरी ओर आम जनता पर अतिरिक्त बोझ न पड़े।


