राजस्थान में आदिवासी क्षेत्रों के समग्र विकास और पलायन जैसी गंभीर समस्या से निपटने के लिए राज्य सरकार ने एक नई पहल की दिशा में कदम बढ़ाया है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने रविवार को जयपुर में ‘संसदीय संकुल परियोजना’ को लेकर एक अहम समीक्षा बैठक की, जिसमें प्रदेश के आदिवासी बहुल इलाकों के विकास को लेकर व्यापक चर्चा हुई। इस बैठक में यह निर्णय लिया गया कि केंद्र सरकार की ‘आकांक्षी जिला’ योजना की तर्ज पर अब राजस्थान में ‘आकांक्षी ग्राम’ विकसित किए जाएंगे, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और सुविधाओं का विस्तार किया जा सके।
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि इस योजना का मुख्य उद्देश्य गांवों में ही विकास के अवसर पैदा करना है, ताकि लोगों को रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन न करना पड़े। उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिए कि चयनित गांवों में बहुस्तरीय विकास कार्य किए जाएं, जिनमें कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य, जल संरक्षण और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों को प्राथमिकता दी जाए। उनका कहना था कि अगर गांवों में ही पर्याप्त संसाधन और रोजगार उपलब्ध होंगे, तो पलायन की समस्या अपने आप कम हो जाएगी।
बैठक में उदयपुर, सलूंबर और डूंगरपुर जिलों के 30 गांवों को विशेष रूप से चिन्हित किया गया है, जहां इस योजना के तहत विकास कार्यों को तेजी से लागू किया जाएगा। इन क्षेत्रों में पहले से ही ‘संसदीय संकुल’ की अवधारणा पर काम चल रहा है। उदयपुर के सांसद डॉ. मन्नालाल रावत और राज्यसभा सांसद चुन्नीलाल गरासिया ने इन परियोजनाओं की प्रगति रिपोर्ट प्रस्तुत की और बताया कि किस तरह इन गांवों में विभिन्न विकास गतिविधियां संचालित की जा रही हैं।
इन चयनित गांवों में खेती-बाड़ी को आधुनिक तकनीकों से जोड़ने, बागवानी को बढ़ावा देने, शिक्षा के स्तर में सुधार करने, स्वास्थ्य सेवाओं को सुदृढ़ करने और युवाओं को रोजगारपरक कौशल सिखाने पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इसके अलावा जल संरक्षण के उपायों को भी प्राथमिकता दी जा रही है, ताकि प्राकृतिक संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित हो सके। इस पूरे प्रयास का मूल उद्देश्य यह है कि गांवों की आर्थिक गतिविधियां गांवों के भीतर ही सशक्त हों और स्थानीय स्तर पर ही रोजगार के अवसर उपलब्ध हों।
बैठक में पलायन का मुद्दा सबसे महत्वपूर्ण विषय के रूप में सामने आया। भाजपा के राष्ट्रीय संगठक वी. सतीश ने इस पर चिंता जताते हुए कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में रोजगार के अभाव के कारण बड़ी संख्या में लोग शहरों की ओर पलायन करते हैं। इससे न केवल उनके परिवार प्रभावित होते हैं, बल्कि बच्चों की शिक्षा भी बाधित होती है। उन्होंने सुझाव दिया कि इस समस्या के समाधान के लिए सरकार, समाज और स्वयंसेवी संगठनों को मिलकर काम करना होगा।
मुख्यमंत्री ने भी इस बात को गंभीरता से लेते हुए कहा कि राज्य सरकार का पूरा ध्यान इस दिशा में है कि हर व्यक्ति को अपने ही क्षेत्र में रोजगार मिले। उन्होंने अधिकारियों को निर्देशित किया कि इन गांवों में योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए और विकास कार्यों में किसी प्रकार की कमी न रहे।
इस बैठक में प्रशासनिक और विकास से जुड़े कई वरिष्ठ अधिकारी और विशेषज्ञ भी मौजूद रहे। मुख्यमंत्री के अतिरिक्त मुख्य सचिव अखिल अरोड़ा, टीएडी विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव कुंजीलाल मीणा और मुख्यमंत्री कार्यालय के संयुक्त सचिव उत्तम कौशल ने भी अपने-अपने विचार रखे। इसके अलावा पुणे से आए विकास विशेषज्ञ कपिल सहस्रबुद्धे और अन्य सहयोगियों ने भी अपने अनुभव साझा किए और योजनाओं को प्रभावी बनाने के सुझाव दिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि ‘आकांक्षी ग्राम’ जैसी पहल ग्रामीण विकास के लिए एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है। इससे न केवल आधारभूत सुविधाओं में सुधार होगा, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी। आदिवासी क्षेत्रों में यह पहल विशेष रूप से प्रभावी हो सकती है, क्योंकि यहां संसाधनों की कमी और रोजगार के अवसरों का अभाव लंबे समय से एक चुनौती रहा है।
राजस्थान सरकार की यह पहल यह भी दर्शाती है कि अब विकास का फोकस केवल शहरी क्षेत्रों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों को भी समान रूप से प्राथमिकता दी जा रही है। यदि इस योजना का क्रियान्वयन प्रभावी ढंग से किया जाता है, तो यह न केवल पलायन को रोकने में मददगार होगी, बल्कि आदिवासी समुदाय के जीवन स्तर में भी उल्लेखनीय सुधार ला सकती है।


