राजस्थान में लंबे समय से लंबित पंचायती राज संस्थाओं और नगरीय निकायों के चुनावों को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर चल रही चर्चाओं के बीच राज्य सरकार ने अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है। प्रदेश के नगरीय विकास एवं आवासन तथा स्वायत्त शासन मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने संकेत दिए हैं कि सरकार की ओर से चुनावों को लेकर सभी आवश्यक तैयारियां पूरी कर ली गई हैं और अब केवल राज्य निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया पूरी होने का इंतजार है। उनके इस बयान को स्थानीय निकाय चुनावों की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत माना जा रहा है, क्योंकि पिछले कई महीनों से चुनाव की संभावित तारीखों को लेकर लगातार अटकलें लगाई जा रही थीं।
जयपुर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान मीडिया से बातचीत करते हुए मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने कहा कि स्थानीय निकाय और पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव करवाना राज्य निर्वाचन आयोग का संवैधानिक और स्वतंत्र अधिकार है। सरकार इस प्रक्रिया में सहयोगी की भूमिका निभाती है और आयोग द्वारा मांगी गई सभी प्रशासनिक एवं कानूनी आवश्यकताओं को पूरा करने की जिम्मेदारी निभाती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य सरकार चुनाव कराने में किसी प्रकार की देरी नहीं चाहती और न ही चुनाव टालने के पक्ष में है।
मंत्री ने बताया कि सरकार की ओर से वार्डों के परिसीमन, सीमाओं के पुनर्सीमांकन और अन्य आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं को पूरी पारदर्शिता के साथ पूरा कर लिया गया है। उन्होंने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया में किसी भी प्रकार का राजनीतिक पक्षपात नहीं किया गया और सभी निर्णय प्रशासनिक एवं कानूनी मानकों के अनुरूप लिए गए हैं। सरकार ने परिसीमन से जुड़ी अंतिम रिपोर्ट भी राज्य निर्वाचन आयोग को सौंप दी है, जिससे चुनावी प्रक्रिया के अगले चरण का रास्ता साफ हो गया है।
झाबर सिंह खर्रा के अनुसार अब सबसे महत्वपूर्ण कार्य मतदाता सूचियों का अंतिम वार्डवार प्रकाशन है। यह जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग के अधिकार क्षेत्र में आती है। जैसे ही आयोग मतदाता सूची के अंतिम प्रकाशन की प्रक्रिया पूरी करेगा, चुनाव कार्यक्रम घोषित करने का मार्ग प्रशस्त हो जाएगा। उनके बयान से यह संकेत मिलता है कि चुनाव की प्रशासनिक बाधाएं लगभग समाप्त हो चुकी हैं और अब निर्णय पूरी तरह निर्वाचन आयोग के हाथ में है।
राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं और नगरीय निकायों के चुनावों में हुई देरी को लेकर पिछले कुछ समय से विपक्षी दलों और सामाजिक संगठनों द्वारा लगातार सवाल उठाए जा रहे थे। कई लोगों का मानना था कि चुनाव टलने से स्थानीय लोकतांत्रिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली प्रभावित हो रही है। इसी मुद्दे को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट में जनहित याचिकाएं भी दायर की गई थीं। इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया था कि 31 जुलाई तक सभी लंबित स्थानीय चुनावों को हर हाल में संपन्न कराया जाए।
हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद प्रशासनिक गतिविधियों में तेजी आई है। सचिवालय से लेकर राज्य निर्वाचन आयोग तक लगातार बैठकों का दौर चल रहा है। विभिन्न विभाग चुनाव संबंधी तैयारियों की समीक्षा कर रहे हैं ताकि समय सीमा के भीतर सभी प्रक्रियाएं पूरी की जा सकें। अदालत के आदेश ने चुनावी तैयारियों को गति देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और अब सभी की निगाहें निर्वाचन आयोग की आगामी घोषणा पर टिकी हुई हैं।
मंत्री खर्रा ने यह भी स्पष्ट किया कि चुनावों के आयोजन के लिए आवश्यक प्रशासनिक संसाधनों की कोई कमी नहीं है। उन्होंने कहा कि यदि आयोग किसी भी समय चुनाव कराने का निर्णय लेता है तो राज्य सरकार पूरी क्षमता के साथ सहयोग करने के लिए तैयार है। संवेदनशील क्षेत्रों में सुरक्षा व्यवस्था, पुलिस बल की उपलब्धता, मतदान कर्मियों की नियुक्ति, वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था और अन्य प्रशासनिक तैयारियों को लेकर सरकार ने सभी स्तरों पर तैयारी कर रखी है।
उन्होंने कहा कि यदि राज्य निर्वाचन आयोग तय समय से पहले भी चुनाव कराने का फैसला लेता है तो सरकार उस स्थिति के लिए भी पूरी तरह तैयार है। उनके अनुसार चुनाव लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं और सरकार इस प्रक्रिया को सफलतापूर्वक संपन्न कराने के लिए हरसंभव सहयोग देने के लिए प्रतिबद्ध है। इस बयान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सरकार चुनावी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में किसी प्रकार की बाधा नहीं बनना चाहती।
राजनीतिक दृष्टि से भी स्थानीय निकाय चुनावों को काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पिछले विधानसभा और लोकसभा चुनावों के बाद प्रदेश की राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव देखने को मिला है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्थानीय चुनाव आगामी राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं। यही कारण है कि विभिन्न राजनीतिक दल इन चुनावों को लेकर अपनी रणनीतियां तैयार करने में जुटे हुए हैं।
भाजपा के भीतर यह धारणा भी मजबूत मानी जा रही है कि हाल के चुनावी परिणामों के बाद ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में संगठन की स्थिति मजबूत हुई है। पार्टी नेतृत्व का मानना है कि जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की सक्रियता और संगठनात्मक मजबूती का लाभ स्थानीय चुनावों में मिल सकता है। यही वजह है कि पार्टी के कई नेता चुनाव जल्द कराने के पक्ष में दिखाई दे रहे हैं।
दूसरी ओर विपक्षी दल भी चुनावी तैयारियों में जुट चुके हैं और सरकार पर लगातार दबाव बना रहे हैं कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के चुनाव समय पर कराए जाएं। ऐसे में आने वाले दिनों में स्थानीय चुनावों की घोषणा प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर सकती है।
कुल मिलाकर राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं और नगरीय निकायों के चुनावों को लेकर अब तस्वीर पहले की तुलना में काफी स्पष्ट होती दिखाई दे रही है। सरकार ने परिसीमन और प्रशासनिक तैयारियों को पूरा करने का दावा किया है, जबकि हाईकोर्ट ने भी चुनावों के लिए अंतिम समय सीमा तय कर दी है। अब पूरा ध्यान राज्य निर्वाचन आयोग की अगली कार्रवाई पर केंद्रित है। यदि मतदाता सूचियों के प्रकाशन की प्रक्रिया जल्द पूरी हो जाती है तो प्रदेश में लंबे समय से प्रतीक्षित स्थानीय चुनावों की घोषणा कभी भी हो सकती है। इससे न केवल स्थानीय लोकतांत्रिक संस्थाओं को नया नेतृत्व मिलेगा, बल्कि प्रदेश की राजनीति में भी एक नया अध्याय शुरू होगा।


