अमेरिका और ईरान के बीच हाल ही में हुए युद्धविराम समझौते के बाद जिस स्थिरता की उम्मीद जताई जा रही थी, अब वह अनिश्चितता के घेरे में आती दिखाई दे रही है। 7 अप्रैल को दोनों देशों के बीच दो सप्ताह के अस्थायी युद्धविराम पर सहमति बनी थी, जिसमें खास तौर पर होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों की सुरक्षित और निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करने का वादा किया गया था। लेकिन अब सामने आ रही नई रिपोर्ट्स ने इस समझौते की विश्वसनीयता और प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
रूस की सरकारी समाचार एजेंसी TASS के हवाले से दावा किया गया है कि ईरान ने अपने रुख में बदलाव करते हुए होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों की संख्या सीमित करने का फैसला किया है। रिपोर्ट के अनुसार, अब इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग से प्रतिदिन केवल 10 से 15 जहाजों को ही गुजरने की अनुमति दी जाएगी। इतना ही नहीं, इन जहाजों को ईरानी अधिकारियों से पूर्व अनुमति लेनी होगी और संभवतः अन्य प्रशासनिक प्रक्रियाओं का भी पालन करना पड़ेगा। यदि यह दावा सही साबित होता है, तो यह वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए एक बड़ा झटका हो सकता है।
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक है, जहां से वैश्विक तेल आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है। ऐसे में जहाजों की आवाजाही पर किसी भी प्रकार का प्रतिबंध या नियंत्रण न केवल क्षेत्रीय बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। इससे पहले आई रिपोर्ट्स में यह कहा गया था कि ईरान युद्धविराम की अवधि के दौरान जहाजों की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित करेगा, जिससे अंतरराष्ट्रीय बाजारों में स्थिरता बनी रहेगी। लेकिन अब सामने आए इस नए दावे ने उस भरोसे को कमजोर कर दिया है।
हालांकि, इस पूरे मामले में ईरान की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। इससे स्थिति और अधिक अस्पष्ट हो गई है। अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस बात पर नजर बनाए हुए है कि क्या यह केवल एक रणनीतिक कदम है या वास्तव में ईरान अपनी शर्तों को सख्ती से लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। खास बात यह है कि यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है, जब अमेरिका और ईरान के प्रतिनिधिमंडलों की बैठक इस्लामाबाद में होने वाली है। इस बैठक में दोनों देशों के बीच आगे की रणनीति और स्थायी समाधान पर चर्चा होनी है।
इसी बीच, ईरान की इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स ने होर्मुज स्ट्रेट से गुजरने वाले जहाजों के लिए एक नया नक्शा भी जारी किया है। इस नक्शे का उद्देश्य जहाजों को संभावित खतरों, विशेष रूप से समुद्र में बिछाई गई बारूदी सुरंगों से बचाना बताया गया है। रिपोर्ट्स के अनुसार, अब जहाजों को ओमान के तट के बजाय ईरान के तट के करीब से गुजरने की सलाह दी जा रही है। यह बदलाव सुरक्षा के लिहाज से किया गया बताया जा रहा है, लेकिन इसके पीछे रणनीतिक नियंत्रण की मंशा भी देखी जा रही है।
युद्धविराम को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। यूरोपियन यूनियन की विदेश नीति प्रमुख काजा कालासने इस समझौते को केवल सीमित क्षेत्र तक सीमित न रखने की अपील की है। उनका कहना है कि यह युद्धविराम व्यापक होना चाहिए और इसे लेबनान जैसे अन्य संवेदनशील क्षेत्रों तक भी विस्तारित किया जाना चाहिए। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि लेबनान में सक्रिय समूहों, विशेष रूप से हिज़बुल्लाह, को भी अपने हथियार छोड़ने चाहिए, ताकि क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित हो सके।
काजा कालास ने यह भी स्पष्ट किया कि इजरायल की हालिया सैन्य कार्रवाइयों ने इस युद्धविराम को कमजोर करने का काम किया है। उनके अनुसार, यदि सभी पक्ष संयम नहीं बरतते, तो यह अस्थायी शांति कभी भी टूट सकती है। यह बयान इस बात की ओर संकेत करता है कि मिडिल ईस्ट में हालात अभी भी बेहद संवेदनशील हैं और किसी भी छोटी घटना से बड़ा संकट उत्पन्न हो सकता है।
वर्तमान परिस्थितियों में यह स्पष्ट है कि अमेरिका और ईरान के बीच हुआ यह युद्धविराम केवल एक अस्थायी राहत है, न कि स्थायी समाधान। होर्मुज स्ट्रेट को लेकर ईरान के कथित नए रुख ने यह दिखा दिया है कि दोनों देशों के बीच विश्वास की कमी अब भी बनी हुई है। वैश्विक व्यापार, ऊर्जा आपूर्ति और कूटनीतिक संतुलन के लिहाज से आने वाले दिन बेहद महत्वपूर्ण साबित हो सकते हैं।
यदि जहाजों की आवाजाही पर वास्तव में प्रतिबंध लगाया जाता है, तो इसका असर तेल की कीमतों, शिपिंग लागत और अंतरराष्ट्रीय बाजारों पर साफ तौर पर देखने को मिलेगा। ऐसे में दुनिया की नजरें अब इस्लामाबाद में होने वाली बैठक और ईरान की आधिकारिक प्रतिक्रिया पर टिकी हुई हैं, जो इस पूरे घटनाक्रम की दिशा तय करेगी।


