राजस्थान में लंबे समय से लंबित पंचायत और निकाय चुनावों को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर चर्चाओं का दौर लगातार जारी है। प्रदेश में स्थानीय स्वशासन संस्थाओं के चुनाव कब होंगे, यह सवाल आम जनता से लेकर राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों तक सभी के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। इसी बीच राज्य सरकार की ओर से इस मुद्दे पर महत्वपूर्ण प्रतिक्रिया सामने आई है। स्वायत्त शासन राज्य मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने स्पष्ट किया है कि राजस्थान हाईकोर्ट के हालिया फैसले के बाद चुनाव करवाने की जिम्मेदारी अब पूरी तरह से Rajasthan State Election Commission की है और राज्य सरकार चुनाव प्रक्रिया में हर संभव सहयोग देने के लिए तैयार है।
सोमवार को सीकर जिले में आयोजित ‘वंदे गंगा जल संरक्षण अभियान’ के शुभारंभ कार्यक्रम के दौरान मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने प्रदेश में पंचायत और निकाय चुनावों से जुड़े विभिन्न सवालों पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार चुनावों को लेकर किसी भी प्रकार की बाधा नहीं बन रही है, बल्कि सरकार पहले भी चुनावों के लिए तैयार थी और वर्तमान में भी पूरी तरह तैयार है। उनके अनुसार, हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब चुनावी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का अधिकार और जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग के पास है।
स्थानीय निकाय और पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों में हो रही देरी को लेकर पिछले काफी समय से विपक्षी दल सरकार पर सवाल उठा रहे हैं। इस संदर्भ में मंत्री खर्रा ने कहा कि चुनावों में देरी के पीछे कई कानूनी और प्रशासनिक कारण रहे हैं। उन्होंने विशेष रूप से अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण के मुद्दे का उल्लेख करते हुए कहा कि राज्य सरकार इस वर्ग के अधिकारों को लेकर गंभीर है और बिना उचित प्रक्रिया पूरी किए चुनाव कराना उचित नहीं माना जा सकता।
मंत्री ने इस दौरान पिछली कांग्रेस सरकार पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्ववर्ती सरकार के कार्यकाल में ओबीसी समुदाय की समुचित गणना और उससे संबंधित आवश्यक आंकड़ों का व्यवस्थित संकलन नहीं किया गया। उनके अनुसार, जब वर्तमान सरकार सत्ता में आई तो उसने ओबीसी आरक्षण से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिए राज्य ओबीसी आयोग का गठन किया। हालांकि आयोग को आरक्षण संबंधी सिफारिशें तैयार करने के लिए पर्याप्त और अद्यतन आंकड़ों की आवश्यकता है, जो अभी उपलब्ध नहीं हैं।
उन्होंने कहा कि स्थानीय निकायों और पंचायत चुनावों में आरक्षण व्यवस्था संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के अनुरूप तय की जानी चाहिए। यदि बिना राज्य ओबीसी आयोग की रिपोर्ट और आवश्यक आंकड़ों के चुनाव करवाए जाते हैं, तो इससे ओबीसी वर्ग के हित प्रभावित हो सकते हैं। सरकार का मानना है कि इस वर्ग को उसका उचित प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकार मिलना चाहिए, इसलिए सभी आवश्यक प्रक्रियाओं को पूरा करना महत्वपूर्ण है।
राजस्थान हाईकोर्ट के हालिया फैसले के बाद चुनावी प्रक्रिया को लेकर नई स्थिति बनी है। मंत्री खर्रा ने कहा कि सरकार फिलहाल अदालत के आदेश का विस्तृत अध्ययन कर रही है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार की ओर से फिलहाल इस मामले में पुनः अदालत जाने या किसी प्रकार की अपील दायर करने की कोई योजना नहीं है। इससे यह संकेत मिलता है कि सरकार न्यायालय के निर्देशों का सम्मान करते हुए आगे की प्रक्रिया में सहयोगात्मक भूमिका निभाना चाहती है।
उन्होंने बताया कि निकायों और पंचायतों से जुड़े पुनर्गठन, सीमांकन और सीमा विस्तार जैसे महत्वपूर्ण कार्यों से संबंधित कानूनी अड़चनें अब समाप्त हो चुकी हैं। पिछले कुछ समय में इन प्रक्रियाओं को लेकर विभिन्न स्तरों पर विवाद और कानूनी चुनौतियां सामने आई थीं, जिसके कारण चुनावी कार्यक्रम आगे नहीं बढ़ पाया। अब इन बाधाओं के दूर होने के बाद चुनाव कराने के लिए आवश्यक प्रशासनिक और कानूनी आधार काफी हद तक तैयार हो चुका है।
मंत्री ने यह भी कहा कि राज्य का प्रशासनिक तंत्र पिछले कुछ समय से विभिन्न महत्वपूर्ण कार्यों में व्यस्त रहा है। पहले विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जैसी प्रक्रियाओं में प्रशासन की भागीदारी रही और अब आगामी जनगणना की तैयारियों में भी सरकारी मशीनरी लगी हुई है। इसके बावजूद यदि निर्वाचन आयोग चुनावों के संचालन के लिए किसी भी प्रकार का सहयोग मांगता है तो सरकार पूरी क्षमता के साथ सहायता उपलब्ध कराएगी।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पंचायत और निकाय चुनाव केवल स्थानीय प्रशासन के लिए ही नहीं, बल्कि प्रदेश की राजनीति के लिए भी महत्वपूर्ण होते हैं। इन चुनावों के माध्यम से ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में राजनीतिक दलों की वास्तविक स्थिति का आकलन होता है। साथ ही स्थानीय स्तर पर विकास योजनाओं के क्रियान्वयन और जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही सुनिश्चित करने में भी इन चुनावों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यही कारण है कि चुनावों में हो रही देरी को लेकर विभिन्न वर्गों में उत्सुकता बनी हुई है।
अपने दौरे के दौरान मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने केवल चुनावी मुद्दों पर ही नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और जल संकट जैसे विषयों पर भी चिंता व्यक्त की। ‘वंदे गंगा जल संरक्षण अभियान’ की शुरुआत करते हुए उन्होंने कहा कि प्रदेश के कई हिस्सों में तापमान लगातार बढ़ रहा है और आने वाले समय में यह स्थिति और गंभीर हो सकती है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि पर्यावरण संरक्षण और जल प्रबंधन को गंभीरता से नहीं लिया गया तो भविष्य में लोगों को और अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।
उन्होंने कहा कि कई क्षेत्रों में तापमान 53 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने की आशंका जताई जा रही है, जो मानव स्वास्थ्य, कृषि और जल संसाधनों पर गंभीर प्रभाव डाल सकती है। ऐसे में जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और अधिक से अधिक वृक्षारोपण को जन आंदोलन का रूप देने की आवश्यकता है। उन्होंने लोगों से पर्यावरण संरक्षण को अपनी सामाजिक जिम्मेदारी मानने की अपील भी की।
कुल मिलाकर राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनावों को लेकर राज्य सरकार ने अपना रुख स्पष्ट कर दिया है। सरकार का कहना है कि चुनाव कराने की संवैधानिक जिम्मेदारी अब निर्वाचन आयोग की है और वह हर आवश्यक सहयोग देने के लिए तैयार है। वहीं ओबीसी आरक्षण, सीमांकन और कानूनी प्रक्रियाओं को लेकर सरकार का जोर इस बात पर है कि चुनाव पूरी तरह संवैधानिक और न्यायसंगत तरीके से संपन्न हों। अब प्रदेश की नजरें निर्वाचन आयोग की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं, क्योंकि वही यह तय करेगा कि राजस्थान में लंबे समय से प्रतीक्षित पंचायत और निकाय चुनावों की प्रक्रिया कब और किस प्रकार आगे बढ़ेगी।


