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सरस घी महंगा, रसोई बजट पर बढ़ा दबाव

सरस घी महंगा, रसोई बजट पर बढ़ा दबाव

राजस्थान में एक बार फिर महंगाई ने आम आदमी की रसोई पर सीधा असर डाला है। प्रदेशवासियों के भरोसेमंद ब्रांड ‘सरस घी’ की कीमतों में अचानक बढ़ोतरी ने घरेलू बजट का संतुलन बिगाड़ दिया है। राजस्थान को-ऑपरेटिव डेयरी फेडरेशन द्वारा मंगलवार देर शाम लिए गए फैसले के बाद घी के दामों में प्रति लीटर और किलोग्राम लगभग 20 रुपये तक की वृद्धि कर दी गई है। नई दरें 8 अप्रैल की सुबह से पूरे प्रदेश में लागू हो गई हैं, जिससे उपभोक्ताओं को अब हर पैक के लिए पहले से अधिक कीमत चुकानी पड़ रही है।

इस मूल्य वृद्धि का असर सीधे तौर पर उन परिवारों पर पड़ रहा है, जो रोजमर्रा के भोजन में घी का नियमित उपयोग करते हैं। अब एक लीटर सामान्य घी, जो पहले 551 रुपये में उपलब्ध था, उसकी कीमत बढ़कर 571 रुपये हो गई है। इसी तरह गाय के घी की कीमत भी 570 रुपये से बढ़कर 590 रुपये प्रति लीटर हो गई है। बड़े परिवारों और आयोजनों के लिए उपयोग में आने वाले 5 लीटर के टिन पैक में भी 100 रुपये की वृद्धि दर्ज की गई है, जिसके बाद इसकी कीमत 2740 रुपये से बढ़कर 2840 रुपये हो गई है। वहीं 15 किलोग्राम वाले टिन पैक की कीमत अब 9345 रुपये से बढ़कर 9495 रुपये तक पहुंच गई है, जिससे बड़े पैमाने पर उपयोग करने वालों की लागत में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

यह इस वर्ष का दूसरा अवसर है जब सरस घी की कीमतों में इजाफा किया गया है। इससे पहले जनवरी महीने में भी कीमतों में 20 रुपये प्रति किलोग्राम की वृद्धि की गई थी, हालांकि उस समय यह बढ़ोतरी केवल बड़े पैक यानी 15 किलोग्राम के टिन तक सीमित थी। लेकिन इस बार फेडरेशन ने सभी श्रेणियों में कीमतें बढ़ाकर आम उपभोक्ता को सीधे प्रभावित किया है। इसका मतलब यह है कि अब चाहे छोटा परिवार हो या बड़ा, हर किसी को इस बढ़ोतरी का सामना करना पड़ेगा।

हालांकि फेडरेशन की ओर से इस मूल्य वृद्धि के पीछे कोई आधिकारिक कारण स्पष्ट रूप से सामने नहीं आया है, लेकिन डेयरी क्षेत्र के विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे कई आर्थिक और मौसमी कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। गर्मी के मौसम में दूध में फैट की मात्रा कम हो जाती है, जिससे घी उत्पादन की लागत बढ़ जाती है। इसके अलावा पशुपालकों के लिए चारे और रखरखाव की लागत में भी वृद्धि हुई है, जिसका सीधा असर डेयरी उत्पादों की कीमतों पर पड़ता है।

राजस्थान जैसे राज्य में, जहां घी का उपयोग केवल खानपान तक सीमित नहीं है बल्कि यह सांस्कृतिक और पारंपरिक जीवन का अहम हिस्सा भी है, वहां इस तरह की मूल्य वृद्धि का असर और अधिक गहरा होता है। त्योहारों, पारिवारिक आयोजनों और दैनिक भोजन में घी का उपयोग आम बात है, ऐसे में इसकी कीमतों में बढ़ोतरी से लोगों की जेब पर अतिरिक्त बोझ पड़ना स्वाभाविक है।

विशेष रूप से मध्यम और निम्न आय वर्ग के परिवारों के लिए यह बढ़ोतरी चिंता का विषय बन गई है। पहले ही बढ़ती महंगाई के कारण रसोई का बजट प्रभावित हो रहा था और अब घी जैसी जरूरी वस्तु के महंगे होने से घरेलू खर्च और बढ़ जाएगा। कई परिवार अब घी के उपयोग में कटौती करने या सस्ते विकल्पों की तलाश करने पर मजबूर हो सकते हैं।

इस मूल्य वृद्धि का असर केवल घरेलू उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि मिठाई और खाद्य व्यवसाय से जुड़े लोगों पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा। हलवाई, रेस्टोरेंट संचालक और अन्य खाद्य व्यवसायी, जो बड़े पैमाने पर घी का उपयोग करते हैं, उनकी लागत में वृद्धि होगी, जिसका असर अंततः उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा। यानी आने वाले समय में मिठाइयों और अन्य घी आधारित उत्पादों की कीमतों में भी वृद्धि देखी जा सकती है।

इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि बढ़ती महंगाई के बीच आम आदमी अपने घरेलू बजट को कैसे संतुलित करे। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि दूध उत्पादन और सप्लाई चेन से जुड़ी लागतों को नियंत्रित किया जाए, तो डेयरी उत्पादों की कीमतों को स्थिर रखा जा सकता है। इसके लिए सरकार और डेयरी संस्थाओं को मिलकर दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी।

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