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आधुनिक खेती से किसान की कमाई दोगुनी, पीले तरबूज की खेती से लाखों का मुनाफा

आधुनिक खेती से किसान की कमाई दोगुनी, पीले तरबूज की खेती से लाखों का मुनाफा

राजस्थान के झालावाड़ जिले के खानपुर उपखंड क्षेत्र से सटे देवपुरा-नयागांव के किसान शिवप्रसाद मालव ने यह साबित कर दिया है कि यदि खेती में पारंपरिक तरीकों के साथ आधुनिक तकनीक और नवाचार को जोड़ा जाए, तो सीमित संसाधनों में भी बेहतर आय अर्जित की जा सकती है। जहां अधिकांश किसान आज भी पारंपरिक फसलों पर निर्भर हैं, वहीं शिवप्रसाद मालव ने समय के साथ कदम मिलाते हुए खेती के नए प्रयोग किए और आज वे मीठे खरबूजे और विशेष किस्म के पीले तरबूज की खेती कर हर साल लाखों रुपए की आय अर्जित कर रहे हैं।

शिवप्रसाद मालव की यह सफलता एक दिन में नहीं मिली, बल्कि इसके पीछे वर्षों का अनुभव, जोखिम लेने की क्षमता और सही मार्गदर्शन का बड़ा योगदान रहा है। करीब चार वर्ष पहले उन्होंने अपने ही गांव के उद्यान विभाग में कार्यरत वरिष्ठ कृषि पर्यवेक्षक दानमल मालव की सलाह पर पारंपरिक खेती से हटकर कुछ नया करने का निर्णय लिया। इस सलाह ने उनके जीवन की दिशा बदल दी। उन्होंने मध्य प्रदेश के सोयत क्षेत्र से उच्च गुणवत्ता वाले खरबूजे के बीज मंगवाए और प्रयोग के तौर पर अपनी जमीन पर इसकी खेती शुरू की।

पहले ही वर्ष में उन्हें उम्मीद से बेहतर उत्पादन और मुनाफा मिला, जिसने उनके आत्मविश्वास को मजबूत किया। इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा और खरबूजे की खेती को नियमित रूप से अपनाया। वर्तमान में वे लगभग तीन बीघा भूमि पर खरबूजे की खेती कर रहे हैं। इसके साथ ही उन्होंने इस वर्ष एक और प्रयोग करते हुए पीले रंग के तरबूज की खेती शुरू की है, जो बाजार में अपनी अनोखी विशेषताओं के कारण तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। यह तरबूज बाहर से पीले रंग का होता है, जबकि अंदर से लाल, मीठा और रसदार होता है, जिससे उपभोक्ताओं में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।

खेती की प्रक्रिया भी पूरी तरह वैज्ञानिक तरीके से अपनाई गई है। शिवप्रसाद मालव बताते हैं कि वे दिसंबर महीने में बुवाई करते हैं और अप्रैल के पहले सप्ताह से फसल पककर तैयार हो जाती है, जिसके बाद तुड़ाई का कार्य शुरू हो जाता है। इस समय बाजार में इन फलों की मांग अधिक होती है, जिससे उन्हें अच्छे दाम मिलते हैं।

हालांकि इस खेती में शुरुआती निवेश अपेक्षाकृत अधिक होता है। किसान के अनुसार खरबूजे का बीज लगभग 6500 रुपए प्रति 100 ग्राम और तरबूज का बीज करीब 7800 रुपए प्रति 100 ग्राम तक आता है। एक बीघा भूमि के लिए 100 ग्राम बीज पर्याप्त होता है। इसके अलावा फसल को कीटों और रोगों से बचाने के लिए नियमित रूप से कीटनाशकों का उपयोग भी करना पड़ता है, जिससे लागत में वृद्धि होती है।

लेकिन सरकार द्वारा दी जाने वाली सब्सिडी इस लागत को काफी हद तक संतुलित कर देती है। शिवप्रसाद मालव को बूंद-बूंद सिंचाई योजना के तहत 70 प्रतिशत तक अनुदान और मल्चिंग के लिए 50 प्रतिशत तक सहायता मिली। इस सहायता के कारण उन्होंने आधुनिक तकनीकों को अपनाने में आसानी महसूस की। हालांकि यह अनुदान एक निश्चित अवधि के लिए ही मिलता है, जिसके बाद किसान को स्वयं ही इन व्यवस्थाओं का खर्च उठाना पड़ता है।

लागत और मुनाफे के आंकड़े इस खेती की सफलता को स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं। पहले वर्ष में ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग और लो टनल जैसी व्यवस्थाओं पर लगभग डेढ़ लाख रुपए का खर्च आया था, जबकि फसल से उन्हें करीब तीन लाख रुपए की आय हुई। दूसरे वर्ष में इन संसाधनों का पुनः उपयोग करने से लागत घटकर लगभग 50 हजार रुपए रह गई, जबकि उत्पादन और आय पहले जैसी ही बनी रही। इससे उनका मुनाफा और अधिक बढ़ गया।

बाजार की दृष्टि से भी यह खेती काफी लाभदायक साबित हो रही है। शिवप्रसाद मालव अपने उत्पादों को स्थानीय बाजारों के अलावा बारां मंडी में बेचते हैं और अधिक उत्पादन होने पर जयपुर जैसे बड़े शहरों में भी भेजते हैं। वर्तमान में खरबूजे का भाव लगभग 25 रुपए प्रति किलो और तरबूज का करीब 20 रुपए प्रति किलो या उससे अधिक मिल रहा है, जो किसानों के लिए संतोषजनक है।

उनकी फसल की गुणवत्ता और मिठास के कारण अब उपभोक्ता सीधे उनके खेत पर पहुंचकर खरीदारी करने लगे हैं। इससे उन्हें बिचौलियों से मुक्ति मिली है और सीधे ग्राहकों से जुड़कर अधिक लाभ प्राप्त हो रहा है। यह मॉडल अन्य किसानों के लिए भी प्रेरणादायक बन रहा है।

उद्यान विभाग के अनुसार राज्य सरकार किसानों को सब्जी और फलदार फसलों की खेती को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाओं के तहत अनुदान प्रदान कर रही है। ड्रिप सिंचाई पर सामान्य वर्ग के किसानों को 70 प्रतिशत तक और मल्चिंग व लो टनल जैसी तकनीकों पर 50 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जाती है। इसके अलावा फलदार पौधों जैसे पपीता, संतरा और मौसमी की खेती के लिए भी 50 हजार रुपए तक का अनुदान उपलब्ध कराया जाता है।

शिवप्रसाद मालव की यह सफलता कहानी न केवल उनके लिए बल्कि पूरे क्षेत्र के किसानों के लिए एक प्रेरणा बनकर उभरी है। यह उदाहरण दर्शाता है कि यदि किसान आधुनिक तकनीकों को अपनाएं, बाजार की मांग को समझें और जोखिम लेने के लिए तैयार रहें, तो खेती को एक लाभकारी व्यवसाय में बदला जा सकता है।

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