राजस्थान विधानसभा अध्यक्ष वासुदेव देवनानी ने शिक्षा को समाज और राष्ट्र निर्माण का सबसे महत्वपूर्ण आधार बताते हुए कहा कि भारत की शिक्षा व्यवस्था केवल भौतिक सुविधाओं या भवनों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि यह बच्चों के समग्र विकास और भविष्य निर्माण का सशक्त माध्यम बननी चाहिए। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कार और चरित्र का निर्माण करना है।
शनिवार को एम.पी.एस. स्कूल में नव निर्मित भवन के लोकार्पण कार्यक्रम के दौरान उन्होंने यह विचार व्यक्त किए। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में शिक्षा को एक व्यापक दृष्टिकोण के साथ देखने की आवश्यकता है, जहां यह केवल परीक्षा और अंकों तक सीमित न होकर जीवन जीने की कला सिखाने का माध्यम बने। उनके अनुसार, ऐसी शिक्षा ही समाज को जिम्मेदार और जागरूक नागरिक प्रदान कर सकती है।
उन्होंने आधुनिक शिक्षा प्रणाली में भारतीय ज्ञान परंपरा के समावेश की आवश्यकता पर भी बल दिया। उनका कहना था कि आधुनिक तकनीक और नवाचार के साथ यदि भारतीय संस्कृति और मूल्यों को जोड़ा जाए, तो यह समाज को एक सशक्त दिशा प्रदान कर सकता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि भारत की प्राचीन वैदिक शिक्षा प्रणाली इस दृष्टि से अत्यंत समृद्ध रही है, जिसमें केवल ज्ञान ही नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों और नैतिकता पर भी विशेष ध्यान दिया जाता था।
इस संदर्भ में उन्होंने तक्षशिला विश्वविद्यालय और नालंदा विश्वविद्यालय का उल्लेख करते हुए कहा कि ये संस्थान इस बात के प्रमाण हैं कि भारत प्राचीन काल से ही ज्ञान का वैश्विक केंद्र रहा है। उन्होंने कहा कि भारतीय सभ्यता ने हमेशा दुनिया को वैज्ञानिक सोच, आध्यात्मिकता और प्रकृति के साथ संतुलन का संदेश दिया है।
उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय परंपरा में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं, जो यह दर्शाते हैं कि हमारे पूर्वजों का ज्ञान अत्यंत उन्नत और दूरदर्शी था। उन्होंने पुष्पक विमान और संजय की दिव्य दृष्टि जैसे प्रसंगों का उल्लेख करते हुए कहा कि यह हमारी समृद्ध वैचारिक विरासत को दर्शाते हैं।
विधानसभा अध्यक्ष ने वर्ष 2014 के बाद देश में शिक्षा के क्षेत्र में आए बदलावों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इस अवधि में शिक्षा में भारतीयता, नवाचार और आधुनिक तकनीक को एक साथ लेकर आगे बढ़ने का प्रयास किया गया है। नई शिक्षा नीति के माध्यम से विद्यार्थियों को केवल रोजगारपरक शिक्षा ही नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना से जोड़ने की दिशा में भी कार्य किया जा रहा है।
उन्होंने भारतीय समाज की पारिवारिक व्यवस्था को भी शिक्षा का महत्वपूर्ण आधार बताया। उनके अनुसार, परिवार केवल एक सामाजिक इकाई नहीं, बल्कि वह स्थान है जहां पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान, संस्कार और नैतिक मूल्यों का हस्तांतरण होता है। उन्होंने कहा कि बदलते समय में शिक्षा का स्वरूप भी बदल रहा है और अब इसका उद्देश्य केवल बौद्धिक विकास नहीं, बल्कि मानसिक संतुलन, आत्मविकास और समग्र व्यक्तित्व निर्माण होना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि आज विश्व भारत की ओर आशा और विश्वास के साथ देख रहा है। योग, आयुर्वेद, आध्यात्मिकता और भारतीय जीवन दर्शन को वैश्विक स्तर पर स्वीकार किया जा रहा है, जो भारत की सांस्कृतिक शक्ति का प्रमाण है।
इस अवसर पर उन्होंने माहेश्वरी समाज के योगदान की भी सराहना की। उन्होंने कहा कि समाज ने देश के आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। शिक्षा संस्थानों की स्थापना, सेवा कार्यों और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देने में इस समाज का योगदान उल्लेखनीय रहा है। कार्यक्रम में माहेश्वरी समाज के अध्यक्ष संदीप काबरा, गोपाल राठी, रामपाल सोनी सहित कई गणमान्य नागरिक और विद्यालय प्रशासन के सदस्य उपस्थित रहे।
अपने संबोधन के अंत में वासुदेव देवनानी ने आह्वान किया कि आधुनिक विज्ञान और सनातन परंपरा के समन्वय से ही एक सशक्त और विकसित भारत का निर्माण संभव है। उन्होंने कहा कि शिक्षा को केवल सुविधा का माध्यम न मानकर इसे संस्कार, विचार और चरित्र निर्माण का आधार बनाना होगा, तभी आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल भविष्य की मजबूत नींव रखी जा सकेगी।


