मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव और युद्ध जैसे हालात के बीच कूटनीतिक प्रयासों ने एक बार फिर रफ्तार पकड़ ली है। इसी कड़ी में इस्लामाबाद में एक महत्वपूर्ण बैठक शुरू हुई है, जिसमें सऊदी अरब, तुर्किये और मिस्र के विदेश मंत्री शामिल हो रहे हैं। इस बैठक की मेजबानी पाकिस्तान कर रहा है, जो खुद को एक तटस्थ मध्यस्थ के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। यह बैठक ऐसे समय हो रही है जब ईरान और इजराइल के बीच टकराव लगातार गहराता जा रहा है और इसके प्रभाव पूरे क्षेत्र में दिखाई दे रहे हैं।
पाकिस्तान की मध्यस्थ भूमिका
पाकिस्तान लंबे समय से इस क्षेत्र में संतुलित संबंध बनाए रखने की कोशिश करता रहा है। उसके ईरान और सऊदी अरब दोनों के साथ अच्छे संबंध हैं। यही कारण है कि इस बैठक के लिए पाकिस्तान को उपयुक्त स्थान माना गया। पाकिस्तान ने न केवल इस बैठक की मेजबानी की है, बल्कि वह अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता की पेशकश भी कर चुका है। उसने ईरान को एक 15 सूत्रीय प्रस्ताव भी सौंपा है, जिसमें परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने, मिसाइल क्षमता घटाने और क्षेत्रीय तनाव कम करने जैसे मुद्दे शामिल हैं।
युद्ध का बढ़ता दायरा और सैन्य गतिविधियां
इस संघर्ष का असर अब केवल दो देशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह पूरे मध्य पूर्व में फैलता नजर आ रहा है। अमेरिका ने अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ाते हुए USS Tripoli जैसे युद्धपोत को क्षेत्र में तैनात किया है, जिसमें हजारों सैनिक मौजूद हैं।
वहीं, इजराइली रक्षा बल (IDF) ने भी अपनी सैन्य गतिविधियों को तेज कर दिया है। उसने सीरिया और लेबनान के सीमावर्ती इलाकों में ऑपरेशन चलाकर आतंकी ठिकानों को निशाना बनाने का दावा किया है।
रणनीतिक ठिकानों पर हमले
संघर्ष के दौरान दोनों पक्ष एक-दूसरे के रणनीतिक और औद्योगिक ठिकानों को निशाना बना रहे हैं। बहरीन और संयुक्त अरब अमीरात में एल्युमिनियम प्लांट्स पर हमले हुए हैं, जो वैश्विक सप्लाई का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसके जवाब में इजराइल ने ईरान के स्टील प्लांट्स को निशाना बनाया।
इस तरह की जवाबी कार्रवाई से स्पष्ट है कि दोनों पक्ष “जैसे को तैसा” रणनीति अपना रहे हैं, जिससे युद्ध और भी जटिल होता जा रहा है।
इंटरनेट बंद और आंतरिक स्थिति
ईरान के अंदरूनी हालात भी चिंताजनक बने हुए हैं। पिछले करीब 30 दिनों से देश में इंटरनेट सेवाएं लगभग ठप हैं। डिजिटल कनेक्टिविटी घटकर केवल 1 प्रतिशत तक रह गई है, जिससे आम नागरिकों का बाहरी दुनिया से संपर्क टूट गया है। यह स्थिति न केवल सूचना प्रवाह को प्रभावित कर रही है, बल्कि वैश्विक समुदाय के लिए वास्तविक हालात समझना भी मुश्किल बना रही है।
हूती और अन्य समूहों की भूमिका
हूती विद्रोही भी इस संघर्ष में सक्रिय होते दिखाई दे रहे हैं। उन्होंने इजराइल पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं, हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूर्ण युद्ध में शामिल होने का संकेत नहीं, बल्कि चेतावनी है। यदि ये समूह पूरी तरह युद्ध में उतरते हैं, तो बाब-अल-मंदेब जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों पर खतरा बढ़ सकता है, जिससे वैश्विक व्यापार प्रभावित होगा।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर
इस संघर्ष का असर केवल सैन्य या राजनीतिक स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा है। उदाहरण के तौर पर कंबोडिया में डीजल और एलपीजी की कीमतों में वृद्धि दर्ज की गई है, जो इस क्षेत्रीय अस्थिरता का सीधा परिणाम है। ऊर्जा आपूर्ति और समुद्री मार्गों पर बढ़ते खतरे के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी अस्थिरता देखी जा रही है।
लगातार बढ़ते हमले और असुरक्षा
क्षेत्र के कई देशों में ड्रोन और मिसाइल हमलों का खतरा बढ़ गया है। कुवैत, ओमान और सऊदी अरब में हाल के दिनों में हमलों की घटनाएं सामने आई हैं। कई जगहों पर एयर डिफेंस सिस्टम सक्रिय किए गए हैं और ड्रोन को हवा में ही मार गिराया गया है। इससे स्पष्ट है कि क्षेत्र में सुरक्षा स्थिति बेहद संवेदनशील बनी हुई है।
कूटनीतिक समाधान की उम्मीद
इन तमाम तनावपूर्ण हालात के बीच इस्लामाबाद में हो रही बैठक को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसमें शामिल देश क्षेत्रीय स्थिरता के लिए प्रभावशाली भूमिका निभा सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इस बैठक से कोई ठोस समाधान निकलता है, तो यह न केवल ईरान-इजराइल तनाव को कम कर सकता है, बल्कि पूरे मध्य पूर्व में शांति बहाल करने की दिशा में बड़ा कदम साबित होगा।


