मध्य पूर्व में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी साफ दिखाई दिया है। ईरान, इजराइल और अमेरिका के बीच बढ़ती टकराव की स्थिति ने वैश्विक बाजारों में अस्थिरता पैदा कर दी है। इसी वजह से सोमवार 9 मार्च को भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई। कारोबार के अंत में बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का प्रमुख सूचकांक सेंसेक्स 1353 अंक यानी 1.71 प्रतिशत गिरकर 77,566 के स्तर पर बंद हुआ। वहीं नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 422 अंक यानी 1.73 प्रतिशत टूटकर 24,028 पर बंद हुआ।
दिनभर के कारोबार में निवेशकों के बीच काफी बेचैनी देखने को मिली। बैंकिंग, ऑटो, मेटल, एनर्जी और एफएमसीजी सेक्टर के शेयरों में सबसे ज्यादा बिकवाली हुई। वैश्विक स्तर पर युद्ध जैसी स्थिति और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के कारण निवेशकों ने जोखिम से दूरी बनानी शुरू कर दी, जिससे बाजार पर दबाव बढ़ गया।
युद्ध का खतरा और सप्लाई चेन पर असर
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान और इजराइल के बीच बढ़ता तनाव वैश्विक सप्लाई चेन को प्रभावित कर सकता है। मध्य पूर्व दुनिया के लिए ऊर्जा और तेल का बड़ा केंद्र है। यदि इस क्षेत्र में युद्ध जैसी स्थिति पैदा होती है तो तेल की सप्लाई बाधित हो सकती है। इसका सीधा असर वैश्विक अर्थव्यवस्था और व्यापार पर पड़ सकता है।
भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करते हैं, ऐसे हालात में ज्यादा प्रभावित होते हैं। सप्लाई चेन में रुकावट आने से कंपनियों की उत्पादन लागत बढ़ सकती है और उनके मुनाफे पर दबाव पड़ सकता है। इसी आशंका के कारण निवेशक जोखिम वाले एसेट से पैसा निकालकर सुरक्षित विकल्पों की ओर रुख कर रहे हैं।
निवेशकों की संपत्ति में भारी गिरावट
बाजार में आई इस तेज गिरावट का असर निवेशकों की संपत्ति पर भी पड़ा है। ईरान और इजराइल के बीच तनाव बढ़ने के बाद से भारतीय शेयर बाजार में बड़े पैमाने पर बिकवाली देखने को मिली है। आंकड़ों के अनुसार निवेशकों की कुल संपत्ति में 22 लाख करोड़ रुपए से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। 27 फरवरी को बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज में सूचीबद्ध कंपनियों का कुल मार्केट कैप करीब 4.63 लाख करोड़ रुपए था। लेकिन 9 मार्च तक यह घटकर लगभग 4.41 लाख करोड़ रुपए रह गया। यह गिरावट इस बात का संकेत है कि वैश्विक तनाव का असर सीधे तौर पर भारतीय निवेशकों की संपत्ति पर पड़ रहा है।
कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल
मध्य पूर्व में तनाव बढ़ने का सबसे बड़ा असर कच्चे तेल की कीमतों पर देखने को मिला है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें पिछले साढ़े तीन साल के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं। सोमवार को कारोबार के दौरान कच्चे तेल की कीमत लगभग 25 प्रतिशत बढ़कर 115 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई थी। हालांकि बाद में इसमें कुछ गिरावट आई और यह करीब 105 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गया।
पिछले दस दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में करीब 50 प्रतिशत की तेजी दर्ज की गई है। इससे पहले 2022 में रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध के दौरान भी तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गई थीं। कई विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि मध्य पूर्व में हालात और बिगड़ते हैं तो तेल की कीमत 150 डॉलर प्रति बैरल तक जा सकती है।
तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का सीधा असर भारत जैसे आयातक देशों पर पड़ता है। इससे देश का इंपोर्ट बिल बढ़ सकता है और महंगाई में भी तेजी आ सकती है। अनुमान लगाया जा रहा है कि आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 5 से 6 रुपए प्रति लीटर तक की बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि सरकार का कहना है कि देश के पास पर्याप्त तेल भंडार उपलब्ध है और स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है।
रुपये में रिकॉर्ड गिरावट
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी और वैश्विक अनिश्चितता के कारण भारतीय मुद्रा पर भी दबाव देखने को मिला है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 46 पैसे कमजोर होकर 92.33 के स्तर पर पहुंच गया। यह अब तक का सबसे निचला स्तर माना जा रहा है। विदेशी निवेशकों द्वारा पूंजी निकालने और आयात बिल बढ़ने की आशंका के कारण रुपये में कमजोरी देखने को मिल रही है। यदि तेल की कीमतें इसी तरह ऊंची बनी रहती हैं तो आने वाले दिनों में रुपये पर और दबाव बढ़ सकता है।
सोना और चांदी बने सुरक्षित निवेश
जब भी वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता बढ़ती है तो निवेशक सोना और चांदी जैसे सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर रुख करते हैं। सोमवार को इन दोनों की कीमतों में भी बढ़ोतरी दर्ज की गई। इंडिया बुलियन एंड ज्वेलर्स एसोसिएशन के अनुसार 24 कैरेट सोने की कीमत 800 रुपए बढ़कर 10 ग्राम के लिए लगभग 1.60 लाख रुपए तक पहुंच गई। वहीं चांदी की कीमत भी 2000 रुपए बढ़कर एक किलो के लिए लगभग 2.63 लाख रुपए हो गई।
एशियाई बाजारों में भी गिरावट
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव का असर केवल भारतीय बाजार तक सीमित नहीं रहा। एशियाई बाजारों में भी भारी गिरावट दर्ज की गई। दक्षिण कोरिया का कोस्पी इंडेक्स लगभग 5.96 प्रतिशत गिरकर 5,251 के स्तर पर बंद हुआ। जापान का निक्केई इंडेक्स भी करीब 2,892 अंक यानी 5.20 प्रतिशत गिरकर 52,728 पर बंद हुआ। इसके अलावा हांगकांग का हैंगसेंग इंडेक्स 348 अंक गिरकर 25,408 पर बंद हुआ, जबकि चीन का शंघाई कंपोजिट इंडेक्स भी 27 अंक की गिरावट के साथ 4,096 पर बंद हुआ।
अमेरिकी बाजारों में भी कमजोरी
वैश्विक तनाव का असर अमेरिकी शेयर बाजारों पर भी दिखाई दिया। 6 मार्च को हुए कारोबार में डाउ जोन्स इंडेक्स 453 अंक यानी 0.95 प्रतिशत गिरकर 47,501 के स्तर पर बंद हुआ। टेक्नोलॉजी कंपनियों पर आधारित नैस्डैक कंपोजिट इंडेक्स 1.59 प्रतिशत गिरकर 22,387 पर आ गया। वहीं एसएंडपी 500 इंडेक्स 90 अंक यानी 1.33 प्रतिशत की गिरावट के साथ 6,740 के स्तर पर बंद हुआ।
पहले भी आई थी गिरावट
इससे पहले 6 मार्च को भी भारतीय शेयर बाजार में तेज गिरावट दर्ज की गई थी। उस दिन सेंसेक्स 1097 अंक यानी 1.37 प्रतिशत गिरकर 78,919 के स्तर पर बंद हुआ था। वहीं निफ्टी भी 315 अंक यानी 1.27 प्रतिशत गिरकर 24,450 पर आ गया था। विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक मध्य पूर्व में तनाव कम नहीं होता और कच्चे तेल की कीमतों में स्थिरता नहीं आती, तब तक वैश्विक बाजारों में उतार-चढ़ाव बना रह सकता है। निवेशकों के लिए यह समय सावधानी बरतने और बाजार की दिशा पर नजर बनाए रखने का है।


