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इजरायल और ईरान के बीच तनाव से 100 डॉलर पार कच्चा तेल, भारत-पाक-बांग्लादेश में बढ़ी चिंता

इजरायल और ईरान के बीच तनाव से 100 डॉलर पार कच्चा तेल, भारत-पाक-बांग्लादेश में बढ़ी चिंता

मिडिल ईस्ट में इजरायल और ईरान के बीच  तनाव अब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी असर डालने लगा है। दोनों देशों के बीच चल रहे संघर्ष को करीब दस दिन हो चुके हैं और इसका सीधा प्रभाव अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर दिखाई दे रहा है। कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ते हुए वर्ष 2022 के बाद पहली बार 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस वृद्धि के पीछे सबसे बड़ा कारण होर्मुज स्ट्रेट को लेकर बनी अनिश्चितता है। यह समुद्री मार्ग दुनिया में कच्चे तेल की आपूर्ति का एक बड़ा केंद्र माना जाता है। युद्ध की स्थिति के कारण इस क्षेत्र से सप्लाई प्रभावित होने की आशंका ने बाजार में अस्थिरता बढ़ा दी है।

होर्मुज स्ट्रेट का वैश्विक सप्लाई में बड़ा महत्व

ऊर्जा विशेषज्ञों के अनुसार होर्मुज स्ट्रेट वैश्विक तेल आपूर्ति का एक बेहद महत्वपूर्ण मार्ग है। दुनिया में समुद्री रास्ते से भेजे जाने वाले कच्चे तेल का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी मार्ग से गुजरता है। यदि किसी कारण से यह मार्ग बाधित होता है तो वैश्विक बाजार में तेल की उपलब्धता तुरंत प्रभावित हो सकती है। इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के कारण निवेशकों और ऊर्जा कंपनियों के बीच अनिश्चितता बढ़ गई है। इसका परिणाम यह हुआ कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी देखने को मिली।

भारत में फिलहाल स्थिर हैं कीमतें

भारत दुनिया के सबसे बड़े कच्चे तेल आयातकों में शामिल है और अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों में होने वाला उतार-चढ़ाव सीधे तौर पर देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है।

हालांकि फिलहाल भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में कोई बड़ा बदलाव देखने को नहीं मिला है। इसके बावजूद ऊर्जा बाजार पर नजर रखने वाले विशेषज्ञों का कहना है कि यदि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो इसका असर घरेलू बाजार पर भी पड़ सकता है। पिछले सप्ताह घरेलू स्तर पर एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में वृद्धि जरूर देखी गई थी, जिससे आम उपभोक्ताओं के बीच चिंता बढ़ी है।

सरकार वैकल्पिक रास्ते तलाश रही

ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े जानकारों के अनुसार भारत संभावित संकट से निपटने के लिए वैकल्पिक रणनीतियों पर काम कर रहा है। सरकार और तेल कंपनियां ऐसे नए स्रोतों की तलाश कर रही हैं जहां से कच्चे तेल की आपूर्ति सुनिश्चित की जा सके।

इसके साथ ही देश की रिफाइनरिंग कंपनियों को भी सप्लाई बढ़ाने और भंडारण को मजबूत करने के निर्देश दिए गए हैं। इन कदमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि वैश्विक स्तर पर संकट गहराता है तो भी घरेलू बाजार में ईंधन की कमी न हो। हालांकि विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि यदि युद्ध लंबा खिंचता है और सप्लाई प्रभावित होती है तो भविष्य में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

पाकिस्तान में ईंधन संकट गहराया

जहां भारत में फिलहाल स्थिति नियंत्रण में है, वहीं पाकिस्तान में हालात काफी कठिन होते जा रहे हैं। कच्चे तेल की वैश्विक कीमतों में आई तेजी का सीधा असर वहां पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर पड़ा है।

पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमत बढ़कर लगभग 336 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई है। वहीं हाई स्पीड डीजल की कीमत करीब 321 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर हो गई है। बढ़ती कीमतों और आयात पर अत्यधिक निर्भरता के कारण वहां ईंधन की कमी भी देखने को मिल रही है। कई शहरों में पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें लगने लगी हैं।

पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें

पाकिस्तान के कई हिस्सों से ऐसी खबरें सामने आ रही हैं कि पेट्रोल और डीजल की कमी के कारण कई पंप बंद पड़े हैं। जहां पंप खुले हैं, वहां लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ रहा है। कुछ स्थानों पर यह स्थिति भी देखने को मिल रही है कि जैसे ही किसी पेट्रोल पंप के खुलने की सूचना मिलती है, आधी रात से ही वाहन चालकों की लंबी कतारें लग जाती हैं। इससे आम नागरिकों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।

बांग्लादेश में लागू हुआ राशनिंग सिस्टम

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल का असर बांग्लादेश में भी दिखाई देने लगा है। स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए वहां की सरकार ने पेट्रोल और डीजल की बिक्री पर राशनिंग प्रणाली लागू कर दी है। इस व्यवस्था के तहत अब लोगों को निर्धारित सीमा के अनुसार ही ईंधन उपलब्ध कराया जा रहा है। सरकार का उद्देश्य मांग और आपूर्ति के बीच संतुलन बनाए रखना है, ताकि ईंधन की उपलब्धता बनी रहे।

आगे क्या हो सकते हैं असर

ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि मिडिल ईस्ट में तनाव कम नहीं हुआ और सप्लाई प्रभावित होती रही तो वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें और बढ़ सकती हैं। इसका असर दुनिया के कई देशों की अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर पड़ सकता है।

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