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WhatsApp ने सुप्रीम कोर्ट में कहा- यूजर डेटा Meta कंपनियों से साझा नहीं

WhatsApp ने सुप्रीम कोर्ट में कहा- यूजर डेटा Meta कंपनियों से साझा नहीं

इंस्टैंट मैसेजिंग प्लेटफॉर्म WhatsApp ने सुप्रीम कोर्ट में स्पष्ट किया है कि यह आरोप सही नहीं है कि कंपनी यूजर्स का डेटा अन्य Meta कंपनियों के साथ साझा कर रही है। कंपनी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील Kapil Sibal ने अदालत को बताया कि प्लेटफॉर्म की तकनीकी संरचना पारदर्शी है और उपयोगकर्ताओं की निजता को प्राथमिकता दी जाती है। उनके अनुसार कानून के उल्लंघन का कोई प्रश्न ही नहीं उठता।

यह मामला तीन जजों की पीठ के समक्ष आया, जिसकी अगुवाई मुख्य न्यायाधीश Surya Kant कर रहे थे। सुनवाई के दौरान कंपनी ने यह भी दलील दी कि वर्ष 2023 में लागू डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून निजता से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिए पर्याप्त ढांचा प्रदान करता है।

213 करोड़ रुपये के जुर्माने पर कानूनी विवाद

यह पूरा विवाद 2021 की प्राइवेसी पॉलिसी से जुड़ा है। Competition Commission of India ने व्हाट्सएप पर 213.14 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया था। आयोग का आरोप था कि कंपनी ने अपनी नई प्राइवेसी पॉलिसी में ‘ले लो या छोड़ दो’ जैसी शर्तें रखकर अपने बाजार वर्चस्व का दुरुपयोग किया।

आयोग का मानना था कि डेटा शेयरिंग के लिए ली गई सहमति वास्तविक नहीं थी, बल्कि उपयोगकर्ताओं को मजबूरी में शर्तें स्वीकार करनी पड़ीं। इस निर्णय को बाद में National Company Law Appellate Tribunal ने भी बरकरार रखा। हालांकि ट्रिब्यूनल ने यह स्पष्ट किया कि मूल उद्देश्य उपभोक्ताओं को विकल्प प्रदान करना है, ताकि वे यह तय कर सकें कि उनका कौन-सा डेटा, किस उद्देश्य से और कितने समय तक इस्तेमाल किया जाएगा। ट्रिब्यूनल ने यह भी कहा कि गैर-जरूरी डेटा संग्रह या विज्ञापन के लिए डेटा का उपयोग केवल स्पष्ट और वापस ली जा सकने वाली सहमति के आधार पर ही संभव होना चाहिए।

DPDP Act 2023 का हवाला

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान व्हाट्सएप ने 2023 के डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून का हवाला देते हुए कहा कि यह कानून उपयोगकर्ताओं की निजता की रक्षा के लिए व्यापक प्रावधान प्रदान करता है। कंपनी के अनुसार, नया कानून डेटा प्रोसेसिंग, सहमति और उपयोगकर्ता अधिकारों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है। व्हाट्सएप ने यह भी कहा कि वह एनसीएलएटी के निर्देशों का पालन करेगा और 16 मार्च 2026 तक सहमति से जुड़े सभी प्रावधान लागू कर देगा। कंपनी का कहना है कि उपयोगकर्ताओं को पहले से ही ऑप्ट-इन और ऑप्ट-आउट का विकल्प दिया गया है, जिससे वे अपनी पसंद के अनुसार डेटा साझा करने का निर्णय ले सकते हैं।

विज्ञापन और डेटा उपयोग पर बहस

एनसीएलएटी ने सीसीआई द्वारा विज्ञापन के लिए डेटा शेयरिंग पर लगाए गए पांच वर्ष के प्रतिबंध को अनावश्यक बताया। ट्रिब्यूनल का तर्क था कि यदि उपयोगकर्ता को स्पष्ट विकल्प दिया गया है, तो पूर्ण प्रतिबंध की आवश्यकता नहीं है। दूसरी ओर, सीसीआई की ओर से पेश वकील ने अदालत में कहा कि यह मामला केवल निजता तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रतिस्पर्धा कानून से भी जुड़ा है। उनके अनुसार डेटा शेयरिंग से बाजार संरचना और उपभोक्ता हित प्रभावित हो सकते हैं।

निजता बनाम प्रतिस्पर्धा का प्रश्न

अदालत ने पिछली सुनवाई में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि लाखों भारतीय उपभोक्ताओं की निजता से समझौता नहीं होने दिया जाएगा। यहां तक कि निजी डेटा के व्यावसायिक उपयोग की तुलना सभ्य तरीके से चोरी से भी की गई थी। यह मामला अब केवल एक कंपनी की प्राइवेसी पॉलिसी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह डिजिटल अर्थव्यवस्था में डेटा, प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता अधिकारों के बीच संतुलन का बड़ा प्रश्न बन गया है।

आगे की दिशा

सुप्रीम कोर्ट में चल रही यह कानूनी लड़ाई डिजिटल प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही और डेटा संरक्षण के भविष्य को प्रभावित कर सकती है। यदि अदालत सीसीआई के रुख को सही ठहराती है, तो बड़ी टेक कंपनियों के लिए डेटा उपयोग और सहमति संबंधी नियम और सख्त हो सकते हैं। वहीं यदि व्हाट्सएप की दलीलें स्वीकार की जाती हैं, तो यह डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन कानून की प्रभावशीलता पर भी एक महत्वपूर्ण टिप्पणी होगी।

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