कोटा में आयोजित एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान राजस्थान के शिक्षा मंत्री मदन दिलावर ने गाय और भैंस के दूध को लेकर दिए गए अपने बयान से चर्चा छेड़ दी है। उन्होंने कहा कि गाय का दूध पीने वाला बच्चा बुद्धिमान और चंचल बनता है, जबकि भैंस का दूध पीने वाला बच्चा आलसी हो जाता है। उनका यह वक्तव्य चेचट तहसील के गांव खेड़ली में रविवार को आयोजित ‘गो संवर्धन एवं गोचरण परंपरा’ कार्यक्रम के शुभारंभ अवसर पर सामने आया।
कार्यक्रम में मंत्री ने ग्रामीणों को संबोधित करते हुए गाय और भैंस के बच्चों के व्यवहार का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि गाय के बच्चे को बछड़ा कहा जाता है, जो बड़ा होने पर खेड़ा, फिर नाड़किया और अंत में बैल बनता है। इसके विपरीत भैंस के बच्चे को छोटे से बड़े होने तक पाड़ा ही कहा जाता है। मंत्री ने इस उदाहरण के माध्यम से यह संदेश देने की कोशिश की कि गाय का दूध पीने वाला बच्चा निरंतर प्रगति करता है।
मंत्री का मां पहचानने वाला उदाहरण
अपने संबोधन के दौरान मदन दिलावर ने एक प्रयोग का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि यदि 3-4 दिन पहले बच्चों को जन्म देने वाली कुछ गायों और भैंसों को अलग-अलग खड़ा कर दिया जाए और उनके बच्चों को एक साथ छोड़ दिया जाए, तो गाय का बछड़ा सीधे अपनी मां के पास पहुंच जाएगा और दूध पीने लगेगा, जबकि भैंस का पाड़ा अपनी मां को पहचानने में समय लेगा और इधर-उधर भटकेगा।
उन्होंने कहा कि इससे यह स्पष्ट होता है कि गाय का दूध पीने वाला बच्चा अधिक बुद्धिमान होता है। मंत्री ने आगे कहा कि यदि दोनों जानवरों के बच्चों को पेट भर दूध पिलाकर छोड़ दिया जाए तो गाय का बछड़ा उछल-कूद करेगा, जबकि भैंस का पाड़ा बैठकर ऊंघता रहेगा। इसी आधार पर उन्होंने लोगों से कहा कि यदि वे अपने बच्चों को चंचल और बुद्धिमान बनाना चाहते हैं तो उन्हें गाय का दूध पिलाना चाहिए।
गो संवर्धन कार्यक्रम में दिया गया संदेश
यह पूरा बयान ‘गो संवर्धन एवं गोचरण परंपरा’ कार्यक्रम के दौरान दिया गया, जिसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में गौ संरक्षण और परंपरागत पशुपालन को बढ़ावा देना था। मंत्री ने अपने भाषण में गोपालन की परंपरा को भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा बताते हुए कहा कि गाय का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से भी है।
कार्यक्रम में बड़ी संख्या में स्थानीय ग्रामीण और जनप्रतिनिधि मौजूद थे। मंत्री के इस बयान के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। कुछ लोग इसे पारंपरिक मान्यताओं के समर्थन के रूप में देख रहे हैं, जबकि कुछ ने इसे वैज्ञानिक दृष्टिकोण से जोड़कर बहस का विषय बना दिया है।
राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया
शिक्षा मंत्री के इस वक्तव्य को लेकर विभिन्न वर्गों में प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं। शिक्षा जैसे संवेदनशील विभाग से जुड़े मंत्री के बयान को लेकर विपक्षी दलों ने भी सवाल उठाए हैं। वहीं समर्थकों का कहना है कि मंत्री ने ग्रामीण संदर्भ में एक सांस्कृतिक उदाहरण दिया, जिसे विवाद का रूप नहीं दिया जाना चाहिए।
विशेषज्ञों का मानना है कि दूध की गुणवत्ता, पोषण तत्व और उसके प्रभाव पर वैज्ञानिक शोध उपलब्ध हैं, जिनमें गाय और भैंस दोनों के दूध के अपने-अपने पोषण गुण बताए गए हैं। ऐसे में मंत्री के बयान ने पोषण, परंपरा और विज्ञान के बीच एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
ग्रामीण संदर्भ और सांस्कृतिक विमर्श
राजस्थान सहित देश के कई हिस्सों में गौ पालन को विशेष महत्व दिया जाता है। ‘गो संवर्धन एवं गोचरण परंपरा’ जैसे कार्यक्रमों का उद्देश्य भी इसी परंपरा को मजबूत करना है। मंत्री ने अपने संबोधन में यह संदेश देने की कोशिश की कि गौ पालन केवल आर्थिक गतिविधि नहीं बल्कि सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है।


